Ad Code

Ticker

6/recent/ticker-posts

मछलियां पकड़ने वाले काफिर और मुसलमान का वाकिया || Story of a fisherman and a Muslim by Islamic creation

 दो मछलियां पकड़ने वालों की हिकायत

हज़रते फ़क़ीह अबुल्लैस समर कन्दी (रहमतुल्लाह अलैह) नकल करते हैं

एक रिवायत में आया है कि गुज़श्ता ज़माने में एक मोमिन और एक काफ़िर, मछली का शिकार करने निकले, काफ़िर अपने झूटे मा' बूदों का नाम ले कर ख़ूब मछलियां पकड़ता रहा और मछलियों का ढेर लग गया। मोमिन अल्लाह पाक का नाम ले कर जाल फेंकता रहा, लेकिन हाथ कुछ न आया। शाम को सिर्फ एक मछली फंसी, वोह भी तड़पी, उछली और फुदक कर पानी में जा पड़ी । मोमिन पलटा तो खाली हाथ था और काफ़िर टोकरी भर कर लौटा ।

.

 मोमिन पर मामूर ( या' नी मुक़र्रर कर्दा ) फ़िरिश्ता अफ़सोस करने लगा, अल्लाह पाक ने उस फ़िरिश्ते को जन्नत में मोमिन का महल (और आलीशान मकाम) दिखाया तो वोह फ़िरिश्ता बे इख़्तियार पुकार उठा : खुदा की कसम ! इस अज़ीमुश्शान महल में दाख़िले के बा'द इस मुसल्मान मछेरे को मछलियों के शिकार में नाकामी वाली मुसीबत की बिल्कुल ही परवाह न होगी और फ़िरिश्ते को जब अल्लाह पाक ने जहन्नम में काफ़िर का ठिकाना दिखाया तो वोह बोला : खुदा की क़सम इस अज़ाब के मक़ाम पर जब येह पहुंचेगा तो इसे (ढेर सारी मछलियां हाथ आने वाली) दुन्या की (आरिज़ी) खुशी कोई फ़ाएदा नहीं देगी ।

islamic waqia, fisherman story, muslim and non muslim, islamic story, jannat, Muslim story, Islami khaniya, Muslim khaniya, Islami story, waqiyat

.

ना फ़रमान को पसन्दीदा चीजें मिलना ख़तरे की घन्टी है

प्यारे प्यारे इस्लामी भाइयो ! इस हिकायत से दर्स मिला कि गैर मुस्लिमों की दुन्यवी तरक्कियां और दौलत की फ़रावानियां (या'नी माल की कसरत) क़ाबिले रश्क नहीं, गरीब व तंगदस्त और दुखियारे मुसल्मानों की महशर में ईद होगी नेक मुसल्मान को अपनी ख़्वाहिश की अश्या न मिलने पर दिल बरदाश्ता नहीं होना चाहिये कि बे नमाज़ों और गुनाहों में डूबे रहने वालों की हर दुन्यवी आरज़ू पूरी होती चली जाना भलाई की दलील नहीं, ख़तरे की घन्टी है । जैसा कि हुज़रते उक़बा बिन आमिर ﺭﺿﯽ ﺍﻟﻠﮧ ﺗﻌﺎﻟٰﯽ ﻋﻨﮧ से रिवायत है, अल्लाह पाक के सच्चे नबी ﷺ का फ़रमाने इब्रत निशान है : जब तुम देखो कि अल्लाह पाक दुन्या में गुनाहगार बन्दे को वोह चीजें दे रहा है जो उसे पसन्द हैं तो येह उस की तरफ़ से ढील है ।

.

हुकूमत की तलब दिल में, न ख़्वाहिश ताजे शाही की नज़र में आशिकों के बस मदीना ही समाता है

( वसाइले बख्शिश, स. 312 )



हाथों हाथ सज़ा की हिक्मत

प्यारे प्यारे इस्लामी भाइयो ! रब्बुल अनाम के हर काम में हिक्मत होती है। गुरबत बल्कि हर तरह की दुन्यवी तक्लीफ़ व मुसीबत पर सब्र कर के अज्र हासिल करना चाहिये क्यूं कि आफ़ात व बलिय्यात (या'नी बलाएं और आफ़तें), कफ़्फ़ारए सय्यिआत (या'नी गुनाहों के कफ़्फ़ारे) और बाइसे तरक्क़ये दरजात होती हैं। चुनान्चे हुज़ूर सय्यदुल मुरसलीन ﷺ ने फ़रमाया : “अल्लाह पाक जब किसी बन्दे से भलाई काइ रादा करता है तो उस के गुनाह की सज़ा फ़ौरी तौर पर उसे दुन्या ही में दे देताहै  । "

.

हज़रते मौलना रूम (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं

(तू खुदा को भी चाहता है और ज़लील दुन्या को भी । तेरा येह ख़याल, जुनून या'नी पागल पन और मुहाल या 'नी ना मुम्किन बात है )


मुझ को 'दुन्या की दौलत न ज़र चाहिये शाहे कौसर की मीठी नज़र चाहिये

.


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Ad Code