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हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और नमरूद का वाकया || Story of Hazrat Ibrahim Alaihis Salam and Namrood

     हिंदी

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम आज़र था। उस ज़माने में नमरूद नाम का काफ़िर हुकूमत करता था। वह अपनी जनता के साथ इन्साफ़ करता सख़ी दाता जैसी उसकी बड़ी ख़ूबी थी।

    एक ज़माने के बाद वह शैतान के फंदे में आ गया। गन्दे विचार उसके मन में बैठ गये। हुकूमत करते-करते वह ख़ुदाई का दावेदार हो गया। अपने बुत बनवाकर इबादतखानों में रखवा दिये। जनता को आर्डर दे दिया कि वह उसके आगे अपना माथा टेके। एक दिन नुजूमियों ने सितारों पर नज़र करके नमरूद से यह अर्ज़ किया कि इस साल इस शहर में एक ऐसा लड़का पैदा होगा जो तेरे देश और धर्म को तबाह करके रख देगा। नमरूद ने बेचैन होकर हुक्म दिया कि जितने लड़के भी इस जगह पैदा हों, उन्हें क़त्ल कर दिया जाये।

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    जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मां को हमल हुआ तो वह सबके जान जाने के डर से वह घर से बाहर निकल खड़ी हुई। जब वह जंगल में एक सूखी नहर पहुँचीं तो एक लड़के ने जन्म लिया। लड़का बहुत ख़ूबसूरत था, मां की ममता जागी और वह उसे सीने से लगाये इधर-उधर जाने लगीं। नहर के पास एक खोह था, लोगें की पहुँच वहाँ तक नहीं हो सकती थी। लड़के को एक कपड़े में लपेटा और रोती हुयी आंखों के साथ उसे छोड़ वह घर की तरफ़ चल पड़ीं। अपने इस लड़के को देखने के लिए वह खोह में आर्ती, और उनको ज़िदा देखतीं तो आंखें डबडबा पड़तीं। वह देखतीं कि हज़रत इब्राहीम अलै. एक अंगूठे से दूध और एक से शहद पीते हैं और असली हिफ़ाज़त करने वाले अल्लाह की पनाह में बराबर जी रहे हैं।

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    ऐसी अजीब हालत को देख वह दांतों तले उंगली दबा लेतीं। फिर बच्चे को गले लगात, दूध पिलातीं और रोती हुई घर को वापस आ जातीं। इस तरह जब फुर्सत पातीं तो उनको दूध पिलाकर वापस लौट आतीं। जब कभी उनके पहुँचने में देर हो जाती तो हज़रत इब्राहीम अपने अंगूठे ही चूसकर अपना पेट भर लेते। सच तो यह हैं कि मां का दूध पिलाना तो सिर्फ़ एक बहाना था, वरना जिसने पैदा किया था वही उन्हें अपनी निगरानी में खिला-पिला रहा था।

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    हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) की रिवायत है कि हज़रत इब्राहीम एक दिन में इतना बढ़ते थे कि दूसरे लड़के उतना ही एक हफ़्ता में बढ़ पाते हैं और वह एक हफ़्ते में इतना बढ़ जाते कि दूसरे लड़के उतना ही एक महीना में बढ़ पाते और एक महीना में वह इतना बढ़ जाते कि दूसरे एक साल में बढ़ पाते। इस तरह दूध पीने की मुद्दत भी गुज़र गयी। हजरत इब्राहीम में कुछ सूझ-बूझ पैदा हुई तो एक दिन रात में उनकी मां उन्हें देखने आयी।

    हज़रत इब्राहीम ने अपनी मा से पूछा-

    "इस अंधेरे घर के सिवा और भी कोई दुनिया है?"

    'दुश्मनों के डर से तुम्हें यहां छिपा दिया है। मां ने जवाब दिया और बताया, "यहां पर तुम्हें रखने का मक्र्सद इसके अलावा और कुछ नहीं है कि तुम्हारी जान बची रहे और तुम्हें अपनी निगरानी में पाला-पोसा जा सके। वैसे अल्लाह की बनायी दुनिया बहुत लम्बी-चौड़ी है।"

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    हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया-

    'अब तो मुझे इस खोह में आराम नहीं महसूस होता, न मैं अपने रहने लायक़ इस जगह को पाता हूँ। फिर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम खोह से बार निकल आये। आसमान पर चमकते सितारे को देखा, बोले-

    'यही मेरा रब है!' लेकिन जब वह डूब गया तो फ़रमाया, "मैं डूबने वाले को अपना रब

    नहीं बनाता।"

    फिर जब चमकते चांद पर नज़र पड़ी और उसकी चांदनी में उन्हें मज़ा आया तो फ़रमाया-

    "यही मेरा रब है और इसी से मैं लौ लगाऊंगा!” लेकिन जब वह भी डूब गया तो उसके रब होने का यक़ीन भी ख़त्म हो गया।

    जब सुबह हुई और सूरज की किरणें फैल गयीं, तब बोले-

    "यही मेरा ख़ुदा है, यही सबसे बड़ा है। यह तो इसकी रौशनी और गर्मी से भी जाहिर है।"

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    लेकिन जब सूरज भी डूबने को हुआ तो हज़रत इब्राहीम फिर सोच मेंपड़ गये। बोले-

    "अलावा उस ख़ुदा के जो बे-मिसाल और बे-ज़वाल है, मैं किसी पर यक़ीन नहीं करता।”

    फिर हज़रत इब्राहीम को उनकी मां घर लायीं और तमाम बातें उनके बाप को सुनायीं ।

    आज़र अपने बेटे को देखकर बहुत ख़ुश हुआ करता। उसे इसकी भी ख़ुशी थी कि उसका बेटा बचा हुआ है।

    जब हज़रत इब्राहीम ने बुतों को बुरा कहना शुरू किया और उनके पूजने वालों पर लानत भेजनी शुरू की तो नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को बुलाया। हज़रत इब्राहीम निडर होकर गए और क़ायदे के मुताबिक़ नमरूद को सज्दा नहीं किया।

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    नमरूद ने बहुत गुस्से से कहा, “तूने मुझको सज्दा क्यों नहीं किया?”

    हज़रत इब्राहीम ने कहा, "मैं परवरदिगार के सिवा किसी को सज्दा नहीं करता।”

    नमरूद ने कहा, "तेरा परवरदिगार कौन है और क्या कहता है?”

    हज़रत इब्राहीम ने जवाब दिया, "वह सबको पैदा करनेवाला है। वही मारता है और वही जिलाता है।"

    नमरूद ने कहा, “मैं भी मार और जिला सकता हूँ, इसलिए इन सबका परवरदिगार हूँ।" फिर उसने दो ऐसे क़ैदियों को बुलवाया, जिन्हें सज़ा में क़त्ल करना था। उनमें से एक क़ैदी को उसने मरवा दिया और एक को आज़ाद कर दिया। फिर उसने कहा, "हमने भी एक को जिलाया और एक को मारा। हम हैं परवरदिगार और यही है काम हमारा।

    हज़रत इब्राहीम ने कहा, “मेरा पवरदिगार सुरज को पूरब से निकालता है। अगर तू सच्चा है तो पश्चिम की तरफ़ से निकाल ।"

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    नमरूद और उसके साथी इस जवाब से चुप और हैरान रह गए। बहुत-से लोग इस मामले को देखकर मुसलमान हुए। एक दिन हज़रत इब्राहीम ने आज़र से पूछा, “ऐ बाप, यह कैसी मूरतें हैं जिनकी तुम पूजा करते हो और रात-दिन जिनके आगे तुम सज्दे करते हो?"

    आज़र ने कहा, "ये हमारे ख़ुदा हैं।”

    हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया, “क्या तुम उनकी पूजा करते हो जिनके न कान हैं, न आंखें और जो न तुमको फ़ायदा पहुँचा सकते हैं, न नुक्सान।”

    आज़र ने लाजवाब होकर कहा, "अगर तू हमारे ख़ुदाओं को नहीं मानेगा तो सज़ा पाएगा और तुझ पर पत्थर बरसाए जायेंगे।"

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    इसके बाद हज़रत इब्राहीम ने यह पक्का इरादा कर लिया कि वह लोगों को बता देंगे कि बुतों को लोगों के अच्छे-बुरे की कुछ ख़बर नहीं और उनके पूजने में किसी को कुछ फ़ायदा नहीं।नमरूद की क़ौम की आदत थी कि जब ईद का दिन आता तो हर आदमी अच्छा लिबास पहनता था और उम्दा-उम्दा खाने पकाकर बुतों के सामने रखकर ईदगाह जाते थे और उधर से फिर कर इस खाने को अगले साल तक के लिए ज़्यादा रोज़ी होने का सबब जानते थे। जब ईद का दिन आया तो सबने हज़रत इब्राहीम को साथ चलने को कहा। हज़रत इब्राहीम ने सितारों की तरफ़ देखकर कहा, "मैं बीमार हूँ इसलिए तुम्हारे साथ नहीं चल सकता, और दिल में कहा, तुम्हारे बुतों से फ़रेब करूंगा और उनकी बेइज़्ज़ती करूंगा।"

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    जब सब लोग तहख़ाना ख़ाली करके ईदगाह पहुँचे, हज़रत इब्राहीम भी एकाएक पहुँचे और बुतों से मज़ाक़ में कहा, "ऐसा अच्छा खाना तुमने क्यों नहीं खाया ?"

    वे बुत भला क्या बोलते और क्या जवाब देते। फिर तो ख़ुदा के दोस्त इब्राहीम ने कुल्हाड़ी लेकर सबके सर उड़ा दिए, किसी के हाथ काटे और किसी का कान, मगर बड़े बुत को बचाकर कुल्हाड़ी उसी के गले में डाल दी और बुतख़ाने का दरवाज़ा बन्द करके बहुत जल्द वहाँ से निकल गए। लोग जब ईदगाह से लौटकर तहख़ाने में दाख़िल हुए और सभी छोटे-बड़े पुराने दस्तूर के मुताबिक़ वहाँ पहुँचे तो देखते क्या हैं कि न किसी का हाथ है, न किसी का कान। बड़ी ज़िल्लत की हालत में पड़े हैं, बिल्कुल मुर्दा ।

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    उसके मुंह से निकला, “किस ज़ालिम का यह सब किया-धरा है, और किसने हमारे माबूदों के सर तोड़कर हमें दिली तक्लीफ़ पहुँचाई है ?" हज़रत इब्राहीम हमेशा बुतों और बुतपरस्तों पर चोट किया करते थे और

    उनके शिर्क और बेईमानी को बुरा कहा करते थे। सबको यक़ीन हो गया कि यह सब हज़रत इब्राहीम ने ही किया है। सबको गुस्सा आया और वह उनका क़त्ल करने के लिए तैयार हो गए। पूरी क़ौम एक राह होकर नमरूद के पास पहुँची और फ़रियाद की कि इब्राहीम ने तहख़ाने की हुरमत को बर्बाद कर दिया। नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को बुलाने के लिए आदमी भेजा और बहुत ग़ज़ब और गुस्से से अपने पास बुलवाया।

    नमरूद और पूरी क़ौम ने कहा, "ऐ इब्राहीम ! माबूदों के साथ यह बर्ताव किसने किया है ?"

    हज़रत इब्राहीम ने कहा, “बड़े बुत ने। तुम इज़्ज़तवाले बड़े बुत से पूछो। वह तुमसे छिप नहीं पायेगा। वही तो तुम्हारा बड़ा माबूद है, क्या इतना भी पता न देगा।"

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    मुशरिक इस बात को सुनकर लाजवाब हो गए और उन्हें बड़ी शर्मिन्दगी हुई। इब्राहीम ने कहा, “तुम तो जानते हो कि यह बुत हर्गिज़ नहीं बोलते। यह अच्छा और बुरा अपने मुंह से कुछ नहीं कहते।'

    हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया ऐसे माबूदी की पूजा से क्या मिलता है। जो इन बेजुबानों को पूजे वह तो बड़ा ही जाहिल है, इससे बहुत-से लोग मुसलमान हुए और बहुत-से लोग ईमान लाये। नमरूद ने जब यह मामला देखा तो हुक्म दिया कि इब्राहीम को क़ैद किया जाए। काफ़िरों ने कहा कि इब्राहीम को आग में जलाओ, इसी तरह से हमारा गुस्सा ठंडा हो सकता है। कोह के दामन में एक सौ साठ गज़ का मकान बनाया। मुल्क की लकड़ियों को जमा करके उसमें आग लगाई। आग के शोले इतने बुलन्द हुए कि ऊपर से परिन्दे भी उड़ने की हिम्मत न कर सकते थे और न कोई आदमी उसके नज़दीक जा सकता था कि हज़रत इब्राहीम को आग में ले जाकर डाले।

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    फिर सब काफ़िर हैरान हुए और उनको आग में डालने की तदबीर सोचने लगे। शैतान ने सुझाया कि एक फ़लाख़न बनाओ और दो-तीन खंभे खड़े करो, झूले की तरह झुलाकर इब्राहीम को आग में डाल दो और इस तरह अपने अरमान पूरे करो। जब हज़रत इब्राहीम को तौक़ और जंज़ीर में बांधकर फ़लाख़न पर बिठाया गया तो आसमान और ज़मीन के फ़रिश्तों ने रो-रोकर फ़रियाद की कि ख़ुदावन्द, तेरे ख़लील के साथ यह कैसा मामला करते हैं। हम इस जुल्म को देखकर बहुत रंजीदा हैं। हमें इजाज़त हो तो उन्हें हम अभी छुड़ा लें और इस तरह तेरा दोस्त दुश्मनों से बच जाए। हुक्म हुआ कि अगर इब्राहीम तुमसे मदद चाहे तो बहुत बेहतर है, तुम जाकर उसका साथ दो। दो फ़रिश्ते जो हवा और पानी पर मुक़र्रर थे, हज़रत इब्राहीम के पास आए और कहा कि अगर आप हुक्म दें तो हवा और पानी इस आग को पल भर में बुझा दें। लेकिन हज़रत इब्राहीम ने इसे क़बूल नहीं किया। 

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    उनकी हालत देखकर फ़रिश्ते बहुत रजीदा हुए। जब हज़रत इब्राहीम फ़लाख़न से बाहर हुए, जिब्रील अमीन फ़ौरन फ़िज़ा से हाज़िर हुए और कहा, और तुम्हें इन शोलों से बचा लूँगा।" 

    हज़रत इब्राहीम ने कहा, “मुझे तुमसे कुछ काम नहीं। जो ख़ुदा की मर्जी है वह पूरी होकर रहेगी।"

    जिब्रील ने कहा, "फिर ख़ुदा ही से सवाल करो और अपनी मुसीबत उससे बयान करो।”

    हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया कि वह ख़ुदा जानता है, मेरे कहने से क्या की हासिल। इस तरह जब ख़ुदा-ए-बेनियाज़ ने देखा कि इब्राहीम तवक्कुल राह में क़ायम है तो फ़रमाया :-

    'या नारू कूनी बरदंव-व सलामन अला इब्रहीम'.

    “ऐ आग, तू इब्राहीम के लिए ठंडी हो जा और सलामती बन जा ।"

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    हज़रत इब्ने अब्बास से नक़ल है कि कलामे इलाही में लफ़्ज़ 'सलाम' न होता तो मारे ठंडक के इब्राहीम को चैन न मिलता। फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम का बाज़ू पकड़कर निहायत आराम से ज़मीन पर बिठाया ही था कि उसी वक़्त बहिश्त के रिज़वान ने ठाठदार कपड़े लाकर पहनाए और उनके आसपास बीस-बीस गज़ तक फूल, सब्ज़े, कलियों और ख़ुश्बूदार फूलों से अजीब बाग़ बना दिया। एक मीठा सोता भी वहाँ जारी हो गया। हज़रत इब्राहीम पर ख़ुदा का बड़ा फ़ज़्ल हुआ कि लज़ीज़ खाना सुबह-शाम पहुँचाया करे, ताकि मेरा प्यारा ख़ुशी और बेफ़िक्री के साथ खाए। जब सात रोज़ इस तरह गुज़र गए तो नमरूदियों ने चाहा कि देखें कि आग बुझी है या नहीं। नमरूद भी एक ऊंचे महल पर चढ़कर हमेशा देखता रहता था। उसे डर था कि कहीं इब्राहीम ज़िंदा न रह जाए इसलिए कि अगर वह सही-सलामत आएगा तो मुझ पर और मेरे मुल्क पर बड़ी ही आफ़त लाएगा। 

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    जब कभी वह अपने दिल की बात अपने मुसाहिबों के सामने कहता तो फिर हरेक की तसल्ली के लिए साथ ही यह भी कह देता कि इंसान क्या है कि जलकर राख न हो जाए, इस आग में तो अगर संगख़ारा भी डाल दिया जाये तो वह भी पिघलकर बह जायेगा। एक दिन नमरूद ने बहुत ग़ौर से अपने महल से देखा। इब्राहीम के चारों तरफ़ तो गुलो-रेहान हैं और आग की लपटों की बजाय बाग़ दिखाई देता है और मीठे पानी का सोता बह रहा है और हर दम वहाँ ऐशो-आराम ही है, तो वह बहुत हैरान और परेशान हुआ। बोला, “ऐ इब्राहीम, तू ऐसी तेज़ आग से किस तरह बच सका ? और यह बाग़ और नेमत किसने फ़राहम किए।”

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    ख़ुदा की क़ुदरत का हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया "यह तो बेमिसाल छोटा-सा करिश्मा है। उसका फ़ज़्ल और इनायत हो तो ऐसा काम नामुम्किन नहीं।'

    नमरूद बोला “जिसकी क़ुदरत की यह अदना निशानी है, वह सच में बड़ा परवरदिगार है।"

    हज़रत इब्राहीम राख के पहाड़ों से निकलकर बाहर तशरीफ़ लाए और नए सिरे से नमरूद को नसीहत करने लगे। नमरूद ने थोड़े दिन की मुहलत मांगी और मामले पर सोचने का वादा किया। उसने हामान से जो उसका वज़ीर था सलाह ली और ईमान लाने का इरादा ज़ाहिर किया। 

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    उस मलऊन हामान ने कहा, “इतने ज़माने तक तो आपने ख़ुदाई की, अब बंदगी इख़्तियार करेंगे और दुनिया भर में अपने को रुस्वा करेंगे।” जब हज़रत इब्राहीम ने मोहलत गुज़र जाने के बाद ईमान लाने की मांग की तो नमरूद ने निहायत चापलूसी और नरमी से कहा, 'ईमान लाना तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है, मगर हाँ तेरे परवरदिगार के लिए एक बड़ी क़ुरबानी देने के लिए मैं तैयार हूँ।'

    हजरत इब्राहीम ने फ़रमाया, "बग़ैर ईमान के कोई क़ुरबानी ख़ुदा दरबार में क़बूल नहीं होती।”

    नमरूद ने चार हज़ार गायें और बहुत-सी बकरियों और ऊंटों को एक बड़े मैदान में क़ुर्बान किया, लेकिन हामान की शैतानी की वजह से उसका ठिकाना दोज़ख़ ही हुआ।

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    नमरूद की तबाही

    हज़रत इब्राहीम ने नमरूद से कहा कि तू बुरे काम छोड़ दे और पशेमान होकर ख़ुदा के आगे आजा। ख़ुदा-ए-तआला ने तुझे चार सौ साल से बादशाहत दे रखी है और इसी तरह उसने मुझे ऐसे मोजज़े दिए जो दीन हक़ पर गवाह हैं और तू है कि अब तक अपने कुफ्र से बाज़ न आया और अपनी नादानी और हठधर्मी से ख़ुदाई का दावा किए चला जा रहा है। जान ले यह ख़ुदा का लश्कर इतना ज़्यादा है कि अन्दाज़ा नहीं कर सकते और तुझे तो ग़ारत करने के लिए एक अदना लश्कर काफ़ी है। नमरूद ने कहा मैं नहीं समझता कि ज़मीन पर मेरे सिवा कोई दूसरा बादशाह है और मेरी बारगाह के सिवा कोई दूसरी बारगाह है। अगर आसमानी बादशाह की फ़ौज है तो उससे कहो कि वह मुझ पर भेजे और फिर मेरी लड़ाई और ताक़त का तमाशा देखे ।

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    हज़रत इब्राहीम ने दुआ की।

    हज़रत जिब्रील नाज़िल हुए और कहा कि नमरूद से कहो कि हमारी फ़ौज आ पहुँची, तू तैयार हो जा। और अपनी फ़ौज लेकर मैदान में जंग कर। तीन रोज़ की मोहलत में नमरूद की फ़ौज बुला ली गई। एक मैदान में सब जमा हुए। चौथे रोज़ नमरूद की फ़ौज के मुक़ाबले में तन्हा हज़रत इब्राहीम सामने आए। उन्हें अकेला देखकर लोगों ने कहा, "इब्राहीम, वह फ़ौजे आसमानी कहां है ? अब तुझ पर आफ़त आने में कुछ भी देर नहीं।" अभी बातचीत हो ही रही थी कि एकाएक मच्छरों की फ़ौज ज़ाहिर हुई जिसकी वजह से सूरज की रौशनी छिप-सी गई। नमरूद घबरा गया। लश्कर पर भी हैरत तारी हो गई। नमरूद ने हुक्म दिया, 'नक़्क़ार बजाकर मच्छरों को भगा दें।'

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    जब मच्छरों की आवाज़ कानों में आई, लोगों के होश गुम हो गए। तमाम फ़ौज घबरा गई। एक गूंज थी, एक शोर था जो उभरा आ रहा था। छोटा था या बड़ा हरेक हैबते-इलाही से डर गया। एक-एक आदमी पर लाखों मच्छर पिल पड़े। मच्छर क्या थे एक काली बला थी जो सर से पांव तक चिमट रही थी। लोगों के बदन पर गोश्त और ख़ून तक नहीं छोड़ रही थी। हज़ारों आदमी और जानवर तबाह हुए। नमरूद अपने महल में भागकर औरतों में जा छिपा। इतने में एक लंगड़ा मच्छर आया जिसे नमरूद ने अपनी औरतों को दिखाया भी। मच्छर तेज़ी से नाक की राह से नमरूद के दिमाग़ तक जा पहुँचा और अपनी सूंड को उसके भेजे में चुभा दिया। नमरूद का सोना और आराम करना सब रुख़्सत हो गया। वह दिन-रात अपना सर पीटता रहता, जब तक लोग उसके सर को कूटते, कुछ दर्द में कमी महसूस होती और बग़ैर कूटे चैन न मिला।

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     जो भी उसकी मजलिस में आता तो ज़मीनबोसी के बदले उसके सर पर धौल लगाता । इस तरह नमरूद को ख़ुदा के ग़ज़ब ने जकड़ लिया। चालीस दिन के बाद वह इसी दर्द की वजह से हलाक हुआ। इसके बाद हज़रत इब्राहीम ने ख़ुदा के हुक्म से मुल्क शाम की तरफ़ हिजरत की। लोगों की नाफ़रमानी की वजह से उन्हें यह हिजरत करनी पड़ी। मिस्र में उन्होंने हज़रत सारा को अपने साथ लिया। लोगों ने मिस्र के हाकिम को ख़बर दी कि हज़रत सारा बहुत हसीन व जमील हैं और अपने हुस्न व जमाल में यक्ता और बेमिसाल हैं। मिस्र के बादशाह ने हज़रत इब्राहीम से पूछा कि मैं इस औरत को हासिल करना चाहता हूँ। तेरा इस औरत से क्या रिश्ता है।

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    हज़रत इब्राहीम ने सोचा कि अगर मैं कहता हूँ कि यह मेरी बीवी है तो वह मुझे मारना चाहेगा। इसलिए हज़रत इब्राहीम ने फ़रमाया, "यह मेरी बहन है (दीन के रिश्ते से)”। इस तरह उनकी जान बची। जब उस मरदूद ने हज़रत सारा को अपने सामने बुलाया तो उन्हें देखते ही उसके होश गुम हो गये। उस बे-अदब ने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाना चाहा तो हज़रत सारा की दुआ से उसके दोनों हाथ शल हो गये और दर्द की वजह से उसका सारा जिस्म बेकल हो गया। उसने कहा, “ऐ औरत मुझ पर यह क्या जादू कर दिया।”

    हज़रत सारा ने फ़रमाया, "तेरी बदनीयती की वजह से ख़ुदा ने तुझे सज़ा दी है ?"

    उस मलऊन ने कहा, "अगर मैं तेरी दुआ से तंदुरुस्त हो गया तो हरगिज़ तुझ पर बदनीयती से हाथ न डालूंगा।'

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    हज़रत सारा ने ख़ुदा की बारगाह में दुआ की। ख़ुदा ने उसको अच्छा कर दिया, लेकिन उसकी नीयत फिर ख़राब हो गई। ख़ुदा ने उसके दोनों हाथ अपाहिज कर दिए। वह बड़ी मिन्नत से गिड़गिड़ाने लगा। हज़रत सारा की दुआ से उसकी तक्लीफ़ दूर हुई। नमरूद की नीयत तीन बार ख़राब हुई और उसके हाथ शलय हुए मगर हज़रत सारा की दुआ से उसको तंदुरुस्ती हासिल हुई। आख़िर में सच्चे दिल से वह बुराई से दस्तबरदार हो गया और हाजरा नामी ख़ातून को नज़ किया। यही हज़रत हाजरा हैं जिनसे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम पैदा हुए। वहाँ से हज़रत इब्राहीम ने मुल्क शाम का इरादा किया और फ़लिस्तीन में दमिश्क़ के इलाक़े में क़ियाम फ़रमाया।

    रोज़े की क़ज़ा कैसे करें 

    रोजा कब नहीं टूटता है

    रोज़ा कब टूट जाता है

    रोजे की नियत की दुआ और रोजे की फजीलत

    आयतल कुर्सी हिंदी में तर्जुमा के साथ वह आयतल कुर्सी की फजीलत तफसीर और हदीस में बयान

    रमजान का चांद देखने की दुआ और चांद देखने के बारे में जरूरी मालूमात

    रोजे का काफ्फारा कैसे अदा करें।

    रोज़ा मकरूह कब होता हैं

    عربي 

    حضرة ابراهيم عليحص سلام

    اسم والد حضرة ابراهيم علييه سلام عازار. في ذلك الوقت كان كافر اسمه نمرود يحكم. لقد أنصف شعبه ، مثل مانح جيد ، كان يتمتع بجودة عالية.

    بعد فترة سقط في فخ الشيطان. استقرت الأفكار القذرة في ذهنه. أثناء حكمه ، أصبح مدعيًا لله. صنع أصنامه وحفظها في دور الصلاة. أمر الجمهور بأن يحني رأسه أمامه. ذات يوم ، طلب النجوم ، وهم ينظرون إلى النجوم ، من نمرود أن يولد هذا العام صبي في هذه المدينة سيدمر بلدك ودينك. شعر نمرود بالقلق وأمر بقتل جميع الأولاد الذين ولدوا في هذا المكان.

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    عندما هوجمت والدة حضرة إبراهيم علي الحصس سلام ، وقفت خارج المنزل خوفا من فقدان حياة الجميع. عندما وصلت إلى قناة جافة في الغابة ، وُلد صبي. كان الولد جميلًا جدًا ، نشأ حب الأم وبدأت تتحرك هنا وهناك ، وهي تعانقه على صدره. كان هناك خندق بالقرب من القناة ، ولم يتمكن الناس من الوصول إليه. لف الصبي بقطعة قماش وتركته بعيون تبكي ، وتوجهت نحو المنزل. لرؤية هذا الفتى من بلدها ، آرتي في العرين ، وإذا رأته حياً ، لكانت عيناها قد ارتجفت. رأت أن حضرة إبراهيم علي. يشربون اللبن بإبهام واحد والعسل بالإبهام ، والحامي الحقيقي يسكن بالتساوي في ملجأ الله.

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    عند رؤية مثل هذه الحالة الغريبة ، كانت تضغط بإصبعها تحت أسنانها. ثم تعانق الطفل وتطعمه حليبها وتعود إلى المنزل وهي تبكي. وبهذه الطريقة ، عندما تحصل على وقت فراغ ، تعود بعد إرضاعهم الحليب. كلما تأخر في الوصول ، كان حضرة إبراهيم يملأ بطنه بمص إبهامه. والحقيقة أن إطعام حليب الأم ما هو إلا عذراً ، وإلا كان من ولدها يرضعها تحت إشرافه.

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    يروي حضرة ابن عباس (ر. كان ينمو كثيرًا في شهر واحد بحيث يمكن للآخرين النمو في غضون عام. وبهذه الطريقة أيضًا مرت مشكلة شرب الحليب. عندما ظهرت بعض المعلومات الاستخبارية في حضرة إبراهيم ، ذات يوم في الليل جاءت والدته لرؤيته.

    سأل حضرة إبراهيم والدته: "هل هناك أي عالم آخر غير هذا المنزل المظلم؟" لقد أخفيتكم هنا خوفا من الأعداء. فأجابت الأم قائلة: "إن الغرض من بقائك هنا ما هو إلا حفظ حياتك وتربيتك تحت إشرافه. حسنًا ، إن العالم الذي خلقه الله واسع جدًا".

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    قال حضرة إبراهيم - "الآن لا أشعر بالراحة في هذا المخبأ ، ولا أجد هذا المكان لأعيش فيه. ثم خرج حضرة إبراهيم من مغارة عليحيس سلام. عند رؤية النجم الساطع في السماء ، قال - "هذا ربي!" ولكن لما غرق قال: لا أغرق ربي. ثم عندما رأى القمر الساطع واستمتع به في ضوء القمر ، قال - "هذا ربي ، وبهذا أشعل اللهب!" ولكن عندما غرق هو أيضًا ، انتهى أيضًا إيمان كونه ربه. ولما جاء الصباح وانتشرت أشعة الشمس ، قال - "هذا إلهي ، هذا أعظم. هذا واضح من نورها وحرارتها".

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    ولكن عندما كانت الشمس على وشك الغروب ، فكر حضرة إبراهيم مرة أخرى. قال: لا أؤمن إلا بالله الجاهل الجاهل. ثم أحضرت والدته حضرة إبراهيم إلى المنزل وروى كل شيء لأبيه. كان عازار سعيدًا جدًا برؤية ابنه. كان سعيدًا أيضًا لأن ابنه كان على قيد الحياة. عندما بدأ حضرة إبراهيم في وصف الأصنام بالسوء وبدأ في إرسال الشتائم إلى عبادهم ، دعا نمرود حضرة إبراهيم. ذهب حضرة إبراهيم بلا خوف ولم يسجد لنمرود حسب القانون.

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    قال نمرود بغضب: لماذا لم تسجد لي؟ قال حضرة إبراهيم: لا أسجد لأحد إلا الرب. قال نمرود: من ربك وماذا يقول؟ أجاب حضرة إبراهيم: هو خالق الكل يقتل ويحيي. قال نمرود: أنا أيضاً أستطيع أن أقتل وأحيي ، فأنا ربهم جميعاً ، ثم دعا اثنين من هؤلاء السجناء الذين كان من المقرر إعدامهم عقاباً ، قتل أحدهما وأطلق سراح أحدهما. ، "لقد أحيا أيضًا واحدًا وقتلناه. نحن الرب وهذا عملنا. قال حضرة إبراهيم: ربي أخرج الشمس من المشرق. إذا كنتم صادقين ، فابتعدوا عن الغرب ".

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    ظل نمرود ورفاقه صامتين وفاجأوا بهذا الجواب. أسلم كثير من الناس بعد رؤية هذا الأمر. ذات يوم سأل حضرة إبراهيم عازار ، "أبي ، أي نوع من الأصنام تعبدون وأمامهم تسجدون ليلاً ونهاراً؟" قال عازار: هو إلهنا. قال حضرة إبراهيم: "أعبد من ليس له آذان ولا عيون ولا ينفعك ولا يؤذيك". قال عازار برهبة: "إن لم تطع إلهنا تعاقب وترشق عليك بالحجارة".

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    بعد هذا جعل حضرة إبراهيم نية راسخة بأنه سيقول للناس أن الأصنام ليس لديهم معلومات عن خير الناس وشرهم ولا فائدة لأحد في عبادتهم ، لذلك اعتاد كل رجل على ارتداء ملابس جيدة وبعد الطهي. الطعام الجيد وإبقائه أمام الأصنام ، كان يذهب إلى يدقه وبعد أن يفعل ذلك مرة أخرى من هناك ، مع العلم أن هذا الطعام سيكون أكثر رزقًا حتى العام المقبل. عندما جاء يوم العيد ، طلب الجميع من حضرة إبراهيم الذهاب معه. نظر حضرة إبراهيم إلى النجوم وقال: أنا مريض فلا أستطيع أن أمشي معك ، وقال في قلبي ، سأخدع أصنامك وأهينهم.

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    عندما غادر الجميع القبو ووصلوا إلى إدجة ، وصل حضرة إبراهيم أيضًا فجأة وقال مازحا للأصنام ، "لماذا لم تأكلوا مثل هذا الطعام الجيد؟" ماذا سيقولون وماذا سيجيبون. ثم أخذ إبراهيم صديق الله فأسًا ونفخ رؤوس الجميع ، وقطع يد أحدهم وأذنه ، ولكن أنقذ الصنم الكبير ، وضع الفأس حول رقبته وأغلق باب ستوبا وغادر قريبًا. فلما عاد الناس من يدغاه ودخلوا القبو ووصل كل كبير وصغير إلى هناك حسب العادة القديمة ، فماذا يرون أن لا أحد له يد ولا أحد له أذن. إنهم يرقدون في حالة محنة كبيرة ، وماتوا تمامًا.

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    خرج من فمه: "من فعل كل هذا ، ومن جرحنا بكسر رؤوسنا؟" كان الجميع مقتنعين أن كل هذا قام به حضرة إبراهيم. غضب الجميع ووافقوا على قتله. الكل وصل الناس إلى نمرود بطريقة واحدة وتذرعوا بأن إبراهيم قد دمر ترتيب القبو. أرسل نمرود رجلاً للاتصال بحضرة إبراهيم وبغضب شديد وغضب نادى عليه. قال نمرود والمجتمع كله ، "يا إبراهيم! من فعل هذا للمعبود؟" قال حضرة إبراهيم: "الصنم العظيم. أنت تسأل الوثن الكبير المحترم. لن يكون قادرًا على الاختباء منك. إنه صديقك العظيم ، ألا يمكنه أن يخبرنا بهذا القدر؟

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    أصيب مشرك بالصدمة لسماع ذلك وشعر بالخجل الشديد. قال إبراهيم ، "أنت تعلم أن هؤلاء الأصنام لا يتكلمون أبدًا. هؤلاء الخير والشر لا يتفوهون بأي شيء. قال حضرة إبراهيم ما يكسبه عبادة مثل هذا المابودي. من يعبد هؤلاء الذين لا صوت لهم هو جاهل جدا ، لأن هذا كثير من الناس أصبحوا مسلمين وصدقه كثير من الناس. عندما رأى نمرود الأمر ، أمر بسجن إبراهيم. قال الكفار ، أحرقوا إبراهيم في النار ، بهذه الطريقة يمكن أن يبرد غضبنا. بنى بيتا من مائة وستين ياردة بيد كوه. يجمعون حطب البلاد ويضرمون النار فيها. اشتعلت ألسنة اللهب لدرجة أن الطيور من الأعلى لم تجرؤ على الطيران ، ولم يستطع أحد الاقتراب منه ليأخذ حضرة إبراهيم في النار.

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    ثم تفاجأ جميع الكفار وراحوا يفكرون في رميهم في النار. اقترح الشيطان أن تصنع قاعدة وأن تبني عمودين أو ثلاثة أعمدة ، تتأرجح مثل الأرجوحة وأن ترمي إبراهيم في النار وبالتالي تحقق رغباتك. عندما جلس حضرة إبراهيم على صقر مقيد بسلسلة مشدودة ، صرخت ملائكة السماء والأرض وسألوا يا رب ما بك خليل. نحن سعداء للغاية لرؤية هذا العمل الوحشي. إذا سمح لنا ، فإننا نتخلص منهم الآن وبهذه الطريقة سيتم إنقاذ صديقك من الأعداء. لقد أُمر أنه إذا أراد إبراهيم المساعدة منك ، فمن الأفضل أن تذهب وتدعمه. جاء اثنان من الملائكة تم ترسيمهما على الهواء والماء إلى حضرة إبراهيم وقالا إنه إذا أمرت ، يجب أن يطفئ الهواء والماء هذه النار في لحظة. لكن حضرة إبراهيم لم يقبلها

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    فرح الملائكة جدا بحالته. عندما خرج حضرة إبراهيم من فلكان ، ظهر جبريل أمين على الفور من فيزا وقال: "وسأنقذك من هذه المياه الضحلة". قال حضرة إبراهيم: لا علاقة لي بك. مهما كانت مشيئة الله ، سيتم ذلك ". فقال جبريل: فاسأل الله وأخبره بمشاكلك.

    قال حضرة إبراهيم إن الله أعلم ما تحقق بقوله لي. فلما رأى الله بنيياز أن إبراهيم واقف على طريق توكل قال: "يا نارو كوني بارداوان وسلامان على إبراهيم". "يا نار ، تبرد ، وآمن لإبراهيم".

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    من المقلد عن حضرة ابن عباس أنه لولا كلمة "سلام" في كلام الله لما عفى إبراهيم من بروده. جعلته الملائكة ، ممسكين بذراع إبراهيم ، يجلس على الأرض بشكل مريح للغاية ، وفي نفس الوقت أحضر رضوان البهشت ملابس فاخرة وصنع حوله حديقة غريبة لمدة عشرين ياردة بها أزهار وخضروات وبراعم وأزهار معطرة. كما تم إطلاق نافورة حلوة هناك. لقد كان امتيازًا عظيمًا من الله على حضرة إبراهيم أن يقدم طعامًا لذيذًا في الصباح والمساء ، حتى يأكل حبيبي بفرح وخالي من الهموم. عندما مرت الأيام السبعة على هذا النحو ، أراد نمروديون معرفة ما إذا كان الحريق قد تم إخماده. نامرود أيضًا ظل يراقب دائمًا من خلال تسلق قصر عالٍ. كان يخشى أن يبقى إبراهيم على قيد الحياة ، لأنه إذا جاء بأمان ، فسوف يجلب مشاكل كبيرة لي ولبلدي.

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    كلما كان يتحدث عن قلبه أمام رفاقه ، ثم من أجل إرضاء الجميع ، كان يقول أيضًا أن ما هو إنسان حتى لا يحترق إلى رماد ، حتى لو تم وضع سنجاخارا في هذه النار ، إذن هذا أيضا سوف يذوب ، وسوف يتدفق ذات يوم نظر نمرود بحذر شديد من قصره. إبراهيم محاط بالزهور وبدلاً من اللهب يرى حديقة وينبوع ماء عذب يتدفق وكل لحظة هناك رفاهية ، لذلك كان متفاجئًا ومضطربًا للغاية. قال: "يا إبراهيم كيف تفلت من مثل هذه النار الشرسة؟ ومن بارك هذه الجنة وباركها ".

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    قال حضرة إبراهيم عن طبيعة الله: "هذه معجزة صغيرة لا مثيل لها. إذا كانت هناك نعمة ونعمة ، فإن هذه المهمة ليست مستحيلة". قال نمرود: الذي طبيعته آية رائعة ، هو حقاً رب عظيم. خرج حضرة إبراهيم من جبال الرماد ، وأخرج التشريف وبدأ في تقديم المشورة لنمرود من جديد. طلب نمرود سماح بضعة أيام ووعد بالنظر في الأمر. استشار وزيره هامان ، وأبدى نيته في الإيمان.

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    قال هامان اللعين ، "لقد انتهيت من الحفر لفترة طويلة ، والآن ستفتخر وستفتخر بنفسك في جميع أنحاء العالم." عندما سعى حضرة إبراهيم إلى الاعتقاد بعد انقضاء الفترة ، قال نمرود بأقصى درجات الإطراء والنعومة ، "من الصعب جدًا بالنسبة لي أن أصدق ، لكن نعم أنا مستعد لتقديم تضحية كبيرة من أجل ربك". قال حضرة إبراهيم: "بغير إيمان لا تقبل التضحية في بلاط الله". وذبح نمرود أربعة آلاف بقرة وكثير من المعز والإبل في حقل كبير ، ولكن بسبب شر هامان خرب مكانه.

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    تدمير نمرود.

    قال حضرة إبراهيم لنمرود: يجب أن تتخلى عن السيئات وأن تأتي أمام الله على عجل. لقد أعطاك الله تعالى المملكة لمدة أربعمائة عام وبنفس الطريقة أعطاني مثل هذه الجلباب التي هي شاهد على المتواضع وأنك لم تبتعد بعد عن خيانتك وتدعي أنك تقوى بسبب غبائك وتعصبك .. يتم القيام به. اعلم أن جيش الله هذا كثير لدرجة أنه لا يمكن تخيله وأن جيشًا واحدًا يكفي لمضايقتك. قال نمرود إنني لا أعتقد أن هناك أي ملك آخر على الأرض سواي وهناك أي برجة أخرى غير برغتي. إذا كان لملك السماء جيش ، فاطلب منه أن يرسله لي ثم شاهد مشهد قتالي وقوتي.

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    صلى حضرة إبراهيم

    ظهر حضرة جبريل وقال لنمرود أن جيشنا قد وصل ، فاستعد. وخذ جيشك وقاتل في الميدان. تم استدعاء جيش نمرود في غضون ثلاثة أيام. اجتمع الجميع في حقل. في اليوم الرابع ظهر حضرة إبراهيم وحيدًا في مواجهة جيش نمرود. فلما رأوه وحده قالوا: يا إبراهيم أين الجيش في السماء؟الآن لم يفت الأوان على الوقوع في ورطة. "وبينما كانت المحادثة لا تزال جارية ، ظهر فجأة جيش من البعوض ، بسبب إخفاء ضوء الشمس. شعر نمرود بالرعب. لقد دهشت عسكر طيبة أيضًا. قال نمرود إنه أمر ، "من خلال لعب النقار لطرد البعوض".

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    عندما دخل صوت البعوض في الأذنين فقد الناس حواسهم. خاف الجيش كله. كان هناك صدى ، ضجيج كان يتصاعد. سواء كانت صغيرة أو كبيرة ، كان الجميع يخافون من حبت إلهي. كانت الملايين من البعوض تتغذى على كل شخص. ما هو البعوض كان هناك ثور أسود يرتعش من رأسه إلى أخمص قدميه. لم تكن حتى تترك اللحم والدم على أجساد الناس. تم تدمير الآلاف من الرجال والحيوانات. هرب نمرود إلى قصره واختبأ بين النساء. في غضون ذلك ، جاءت بعوضة عرجاء ، أظهرها نمرود لنسائه أيضًا. سرعان ما وصلت البعوضة إلى دماغ نمرود من خلال الأنف وخزت جذعها في المرسل. تم التخلي عن نوم نامرود وراحته. ظل يضرب رأسه ليلاً ونهارًا ، حتى دق الناس رأسه ، وشعروا ببعض الألم ، ولا يمكن أن يجدوا السلام دون لدغة.

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    من جاء إلى مجلسه ، كان سيضع الغبار على رأسه مقابل زامينبوسي. وبهذه الطريقة وقع غضب الله على نمرود. وبعد أربعين يوما مات بسبب هذا الألم. بعد هذا هاجر حضرة إبراهيم إلى البلاد في المساء بأمر من الله. كان عليه أن يؤدي هذه الهجرة بسبب معصية الناس. في مصر ، أخذ معه حضرة سارة. أبلغ الناس الحاكم المصري أن حضرة سارة كانت جميلة جدًا ومتألقة ، وكانت فاضلة ولا مثيل لها في جمالها وموهبتها. طلب ملك مصر من حضرة إبراهيم أنني أريد الحصول على هذه المرأة. ما علاقتك بهذه المرأة؟

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    اعتقد حضرة إبراهيم أنه إذا قلت أن هذه زوجتي فسوف يريد قتلي. لهذا قال حضرة إبراهيم: "هذه أختي (من علاقة الدين)". وبهذه الطريقة أنقذت حياته. وعندما أراد أن يمد يده إليها ، خدرت يديه بسبب صلاة حضرة سارة. وبسبب الألم أصبح جسده كله لا يطاق ، فقال: يا امرأة ، ما السحر الذي فعلته بي. قال حضرة سارة: "هل عاقبك الله لسوء نيتك؟" قال مالون ، "إذا شفيت بصلواتك ، فلن أضع يدي عليك بأي حال من الأحوال بطريقة سيئة."

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    صلى حضرة سارة في برقة الله. جعله الله صالحًا ، لكن نواياه ساءت مرة أخرى. شل الله يديه. بدأ يتوسل بجدية. تمت إزالة متاعبه من خلال صلاة حضرة سارة. لقد أفسدت نوايا نمرود ثلاث مرات وقطعت يديه ، ولكن ببركة حضرة سارة ، تعافى. في النهاية ، بقلب صادق ، استسلم للشر وحدق في خاتون ، حضرة مشهور. حضرة حضرة الذي ولد منه حضرة إسماعيل. من هناك ، استعد حضرة إبراهيم لقضاء أمسية الريف وأبحر في منطقة دمشق بفلسطين.

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    English


    Hazrat Ibrahim Alaihis Salam

    The name of the father of Hazrat Ibrahim Alaihis Salam was Azar. At that time a kafir named Namrud used to rule. He had a great quality like a good giver, doing justice to his people.
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    After a time he fell into the trap of Satan. Dirty thoughts settled in his mind. While ruling, he became a claimant to God. He got his idols made and kept in the shrines of worship. that he lay his head before him. One day the Nujumis, looking at the stars, requested Namrood that this year a boy would be born in this city who would destroy your country and religion. Namrud got restless and ordered that all the boys born in this place should be killed.
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    When Hazrat Ibrahim Alaihis Salam's mother was attacked, she stood out of the house in fear of losing everyone's life. When she reached a dry canal in the forest, a boy was born. The boy was very beautiful, the mother's love arose and she started moving here and there, hugging him on the chest. There was a moat near the canal, people could not reach there. Wrapped the boy in a cloth and left him with weeping eyes, she went towards the house. To see this boy of hers, Aarti in the lair, and if she saw him alive, her eyes would have quivered. She saw that Hazrat Ibrahim Alai. They drink milk with one thumb and honey with the other, and the real Protector lives equally in the shelter of Allah.

    Seeing such a strange condition, she would press her finger under her teeth. Then she would hug the child, feed her milk and return home crying. In this way, when she had time, she would come back after feeding them milk. Whenever he was late in reaching him, Hazrat Ibrahim would have filled his stomach by sucking his thumb. The truth is that feeding the mother's milk was just an excuse, otherwise the one who had given birth was feeding them under his supervision.
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    Hazrat Ibn Abbas (R.A.) narrates that in a day, Hazrat Ibrahim grew so much that other boys could grow as much in a week and he would grow so much in a week that other boys could grow as much in a month and a year. He would grow so much in a month that others could grow in a year. In this way the problem of drinking milk also passed. When some intelligence arose in Hazrat Ibrahim, one day in the night his mother came to see him.

    Hazrat Ibrahim asked his mother- "Is there any other world other than this dark house?"
    'I have hid you here for fear of enemies. The mother replied and said, "The purpose of keeping you here is nothing but that your life may be saved and you can be brought up under her supervision. By the way, the world created by Allah is very wide."
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    Hazrat Ibrahim said- 'Now I do not feel comfortable in this lair, nor do I find this place to live in. Then Hazrat Ibrahim came out of the cave of Alaihis Salam. Seeing the shining star on the sky, said - 'This is my Lord!' But when he drowned, he said, "I do not make the drowning my Lord."

    Then when he saw the shining moon and enjoyed it in its moonlight, he said - "This is my Lord, and with this I will light a flame!" But when he too drowned, the faith of his being his Lord also ended. 
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    When morning came and the sun's rays spread, he said - "This is my God, this is the greatest. This is evident from its light and heat." But when the sun was about to set, Hazrat Ibrahim again fell into thought. He said, "I don't believe in anyone except that God who is ignorant and ignorant."
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    Then Hazrat Ibrahim was brought home by his mother and narrated all the things to his father. Azar would have been very happy to see his son. He was also glad that his son was alive. When Hazrat Ibrahim started calling the idols bad and started sending curses on their worshipers, Namrood called Hazrat Ibrahim. Hazrat Ibrahim went fearlessly and did not prostrate to Namrood as per the law.
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    Namrood said angrily, "Why didn't you prostrate me?" 
    Hazrat Ibrahim said, "I do not bow down to anyone except the Lord." 
    Namrood said, "Who is your Lord and what does he say?" 
    Hazrat Ibrahim replied, "He is the creator of all. He kills and he gives life."
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    Namrood said, "I too can kill and live, so I am the Lord of all of them." Then he called two such prisoners who were to be executed in punishment. One of them he killed and one of them freed. Then he said, "We have also revived one and killed one. We are the Lord and this is our work. Hazrat Ibrahim said, “My Lord brings out the sun from the east. If you are truthful, then drive out from the west."
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    Namrood and his companions were left silent and surprised by this answer. Many people became Muslims after seeing this matter. One day Hazrat Ibrahim asked Azar, "O Father, what kind of idols do you worship and in front of which you prostrate day and night?" Azar said, "He is our God." Hazrat Ibrahim said, "Do you worship those who have neither ears, nor eyes, and who can neither benefit you nor harm you." Azar said in awe, "If you do not obey our gods, you will be punished and stones will be thrown at you."
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    After this, Hazrat Ibrahim made it a firm intention that he would tell the people that idols have no information about the good and bad of the people and there is no benefit to anyone in worshiping them. So every man used to wear good clothes and after cooking good food and keeping it in front of idols, used to go to Idgah and after doing it again from there, knowing this food to be more sustenance till next year. When the day of Eid came, everyone asked Hazrat Ibrahim to accompany him. Hazrat Ibrahim looked up at the stars and said, "I am sick so I cannot walk with you, and said in my heart, I will deceive your idols and insult them."
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    When everyone left the cellar and reached the Idgah, Hazrat Ibrahim also reached suddenly and jokingly said to the idols, "Why didn't you eat such good food?" What would they say and what would they answer. Then God's friend Abraham took the ax and blew everyone's heads, cut off someone's hand and someone's ear, but saving the big idol, put the ax around his neck and closed the door of the stupa and left very soon. When people returned from the Idgah and entered the cellar and all the small and big reached there according to the old custom, then what do they see that no one has a hand, no one has an ear. They are lying in a state of great distress, absolutely dead.
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    It came out from his mouth, "Whose oppressor has done all this, and who has hurt us by breaking the heads of our idols?" Hazrat Ibrahim always used to attack idols and pagans and His shirk and dishonesty were called bad. Everyone was convinced that all this was done by Hazrat Ibrahim. Everyone got angry and he agreed to kill them. The whole people reached Namrud in one way and pleaded that Abraham had destroyed the order of the crypt. Namrud sent a man to call Hazrat Ibrahim and with great anger and anger called him to him. 
    Namrud and the whole community said, "O Ibrahim! Who has done this to the Maboods?" 
    Hazrat Ibrahim said, "The great idol. You ask the respectable big fetish. He won't be able to hide from you. He is your great friend, wouldn't he be able to know even this much?
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    Mushrik was shocked to hear this and felt very ashamed. Abraham said, “You know that these idols never speak. These good and bad do not say anything with their mouth.'
    Hazrat Ibrahim said what is gained by worshiping such a Maboodi. He who worships these voiceless people is very ignorant, because of this many people became Muslims and many people believed. When Namrud saw this matter, he ordered that Abraham should be imprisoned. The infidels said, burn Abraham in the fire, in this way our anger can be cooled. Built a house of one hundred and sixty yards in the hands of Koh. Collecting the wood of the country, set it on fire. The flames of the fire became so great that even birds from above could not dare to fly, and no man could go near him to take Hazrat Ibrahim into the fire. 
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    Then all the infidels were surprised and started thinking of throwing them into the fire. Satan suggested that make a pedestal and erect two or three pillars, swing like a swing and throw Abraham in the fire and thus fulfill your desires. When Hazrat Ibrahim was made to sit on a falcon, tied in a taut and a chain, the angels of heaven and earth cried out and asked, Lord, what is the matter with your Khalil. We are very happy to see this atrocity. If we are allowed, then we get rid of them now and in this way your friend will be saved from enemies. It was ordered that if Abraham wants help from you, it is much better, you go and support him. Two angels who were ordained on air and water came to Hazrat Ibrahim and said that if you command, air and water should extinguish this fire in an instant. But Hazrat Ibrahim did not accept it Seeing his condition, the angels were very pleased. 
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    When Hazrat Ibrahim came out of Falakhan, Jibril Amin immediately appeared from Fiza and said, "And I will save you from these shoals." 
    Hazrat Ibrahim said, "I have nothing to do with you. Whatever God's will is, it will be done." 
    Jibril said, "Then question God and tell him your troubles." 
    Hazrat Ibrahim said that God knows what has been achieved by saying me. Thus, when God-e-Beniyaz saw that Abraham was standing on the path of Tawakkul, he said:- O fire, be coolness and peace for Abraham,
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    It is imitated from Hazrat Ibn Abbas that if there had not been the word 'Salaam' in Kalame Ilahi, Abraham would not have been able to rest due to coldness. The angels had made Hazrat Ibrahim's arm sit very comfortably on the ground that at the same time Rizwan of Bahisht brought luxurious clothes and made a strange garden around him for twenty yards with flowers, vegetables, buds and fragrant flowers. A sweet fountain also continued there. 
    It was a great pleasure of God to Hazrat Ibrahim to provide delicious food morning and evening, so that my beloved may eat with joy and carefree. When seven days had passed like this, the Namrudis wanted to see if the fire was extinguished. Namrud also always kept watching by climbing a high palace. He was afraid that Abraham might be left alive, because if he came safely, he would bring great trouble to me and my country.
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    Whenever he would speak about his heart in front of his companions, then for the satisfaction of everyone, he would also say that what is a human being so that he does not get burnt to ashes, even if sangakhara is put in this fire, then that too will melt. It will flow. One day Namrud looked very carefully from his palace. Abraham is surrounded by flowers and instead of flames, he sees a garden and a spring of fresh water is flowing and every moment there is luxury, so he was very surprised and disturbed. He said, "O Abraham, how could you escape from such a fierce fire? And who blessed this garden and blessings."
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    Hazrat Ibrahim said of the nature of God, "This is an unmatched small miracle. If he has grace and grace, then such a task is not impossible." Namrood said, "Whose nature is a wonderful sign, he is indeed a great Lord." Hazrat Ibrahim came out of the mountains of ashes, brought out the tashreef and started advising Namrud anew. Namrood asked for a few days' grace and promised to look into the matter. He consulted Haman, his vizier, and expressed his intention to believe.
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    That damn Haman said, "You have done digging for so long, now you will take pride and make yourself proud all over the world." When Hazrat Ibrahim sought to believe after the period had passed, Namrood said with utmost flattery and softness, 'It is very difficult for me to believe, but yes I am ready to make a big sacrifice for your Lord. '
    Hazrat Ibrahim said, "Without faith no sacrifice is accepted in the court of God." Namrud sacrificed four thousand cows and many goats and camels in a large field, but because of Haman's wickedness, his whereabouts were ruined.
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    Namrood's destruction

    Hazrat Ibrahim said to Namrud that you should give up evil deeds and come before God in a hurry. God-e-Ta'ala has given you the kingdom for four hundred years and in the same way he has given me such robes which testify to the humble and you have not yet turned away from your infidelity and claim to godliness by your stupidity and fanaticism. is being done. Know that this God's army is so much that it cannot be imagined and a single army is enough to harass you. Namrood said that I do not think that there is any other king on the earth except me and there is any other bargah other than my bargah. If the king of heaven has an army, then ask him to send it on me and then see the spectacle of my fighting and strength.
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    Hazrat Ibrahim prayed

    Hazrat Jibril appeared and said that tell Namrood that our army has arrived, you get ready. And take your army and fight in the field. Namrood's army was called in three days' time. Everyone gathered in a field. On the fourth day, a lonely Hazrat Ibrahim appeared in the face of Namrood's army. Seeing him alone, the people said, "Abraham, where is that army in heaven? Now it's not too late for you to be in trouble." While conversation was still taking place, suddenly an army of mosquitoes appeared, due to which the sunlight was hidden. Namrood was terrified. Lashkar was also surprised. Namrood said He ordered, 'By playing Naqar, drive away the mosquitoes.'
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    When the sound of mosquitoes came in the ears, people lost their senses. The whole army got scared. There was an echo, a noise that was emerging. Whether small or big, everyone was afraid of Habte-Elahi. Millions of mosquitoes were feeding on every single person. What were the mosquitoes? There was a black bull that was twitching from head to toe. She was not even leaving meat and blood on people's bodies. Thousands of men and animals were destroyed. Namrood fled to his palace and hid among the women. In the meantime, a lame mosquito came, which Namrood showed his women too. The mosquito quickly reached Namrood's brain through the nose and pricked its trunk into his sent. Namrud's sleeping and resting were all abandoned. He kept beating his head day and night, till people pounded his head, felt some reduction in pain and could not find peace without a bite.
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    Whoever came to his Majlis, would have put dust on his head in exchange for Zaminbosi. In this way Namrud was caught by the wrath of God. After forty days he died because of this pain. After this Hazrat Ibrahim migrated towards the country in the evening by the order of God. He had to perform this Hijrat because of the disobedience of the people. In Egypt, he took Hazrat Sarah with him. The people informed the Egyptian ruler that Hazrat Sarah was very beautiful and brilliant, and she was virtuous and unmatched in her beauty and talent. The king of Egypt asked Hazrat Ibrahim that I want to get this woman. What is your relationship with this woman?
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    Hazrat Ibrahim thought that if I say that this is my wife then he will want to kill me. That's why Hazrat Ibrahim said, "This is my sister (from the relationship of Deen)". In this way his life was saved. When he wanted to extend his hand towards her, both his hands became numb due to the prayer of Hazrat Sara and because of the pain, his whole body became unbearable. He said, "O woman, what magic did you do on me." 
    Hazrat Sara said, "Has God punished you because of your bad intentions?" 
    The Malun said, "If I am cured by your prayer, I will by no means lay my hand on you in a bad manner.'
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    Hazrat Sara prayed in God's Bargah. God made him good, but his intentions went bad again. God crippled both his hands. He began to plead earnestly. His troubles were removed by the prayers of Hazrat Sara. Namrood's intentions got spoiled thrice and his hands were cut, but by the blessings of Hazrat Sara, he got well. In the end, with a sincere heart, he succumbed to evil and gazed at Khatoon, a well-known Hazra. It is Hazrat Hazra from whom Hazrat Ismail was born. From there, Hazrat Ibrahim intended for the country's evening and set sail in the area of ​​Damascus in Palestine.
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