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हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत - Hazrat Imam Hussain Karbla Ka Waqiat

ताजदारे करबला इमाम आली मक़ाम की शहादत

मैदान ए करबला में जुमा के दिन मुहर्रम की दस्वीं तारीख 61 हिजरी मुताबिक 680 ई0 को इमामे आली मक़ाम हजरत इमाम हुसैन رضي الله عنه के बेटों, भाईयों, भतीजों और जां निसार साथियों की शहादत के बाद अब जिगर पारए रसूल, शहजादए बतूल, अली के नूरे ऐन, मोमिनों के दिल के चैन, जन्नती नी जवानों के सरदार, मुजाहिदों के काफिलए सालार, इब्ने हैदरे कर्रार, शहंशाहे करबला, पैकरे सब्रो- रज़ा हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत का वक्त आ गया, जब आप ने मैदाने जंग में जाने का इरादा फरमाया तो हज़रत जैनुल आविदीन अपनी बीमारी की नक़ाहत और कमजोरी के बावजूद भेजा लिये हुए हज़रत इमाम की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया बाबा जान! पहले हमें मैदाने कार ज़ार में जाने और अपनी जान के निसार करने की इजाज़त दीजिये, मेरे होते हुए आप शहीद हो जाएं यह नहीं हो सकता, इमामे आली मक़ाम ने नूरे नज़र को अपनी आगोशे मुहब्बत में लिया, प्यार किया और फरमाया बेटा मैं तुम्हें कैसे इजाज़त दे दूं? अली अकबर भी शहीद हो गए, कासिम भी दुनिया से चले गए और तमाम अज़ीज़ व अकारिब जो हम्राह थे सब राहे हक में निसार हो चुके, मैं तुम्हें इजाज़त दे दूं तो ख़्वातीन अहले बैत का कोई महरम नहीं रह जाएगा, इन बेकस गरीबुल वतन को मदीना कौन पहुंचाएगा? तुम्हारी माओं बहनों की निगह दाश्त व ख़बर गीरी कौन करेगा? 

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मेरे प्यारे बेटे ! तुम्हें जिंदा रहना है, तुम्हें शहीद नहीं होना है, वरना मेरी नस्ल किस से चलेगी? हुसैनी सादात का सिलसिला किस से जारी होगा? मेरे जद व पिदर की जो अमानतें मेरे पास हैं वह किस के सुपुर्द की जायेंगी? मेरे लख्ते जिगर यह सारी उम्मीदें तुम्हारी जात से वाबस्ता हैं, देखो मेरी तरह सो इस्तिकामत से रहना, राहे हक में आनी वाली हर तकलीफ व मुसीबत को बर्दाश्त करना और हर हालत में अपने नाना जान सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की शरीअत और उनकी सुन्नत की पैरवी करना मेरे बाद तुम ही मेरे जा नशीन हो, तुम्हें मैदाने कार ज़ार में जाने की इजाज़त नहीं।

फिर इमामे आली. मक़ाम ने उन को लगाम ज़िम्मेदारियों का हामिल किया (साँपा), अपनी दस्तारे मुबारक उतार कर उन के सर पर रख दी और उन्हें बिस्तरे जलालत पर लिटा दिया। अब इमामे पाक अपने खेमा में तशरीफ लाए, संदूक खोला, कुबाए मिस्री जेबे तन फरमाई और तबर्रुकात में से अपने नाना जान सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अमामए मुबारक सर पर बांधा, सैय्यदुश शुहदा हज़रत अमीरे हमज़ा की ढाल पुश्त पर रखी, शेरे खुदा की तलवारे जुल-फिकार गले में हमाइल की (सटकाई) और जाफरे तैय्यार का नेजा हाथ में लिया, इस तरह ताजदारे करबला पैकरे सब्रो रजा सब कुछ राहे हक में कुर्बान करने के बाद अब अपनी जान नज़ करने के लिये तैयार हो गए, बीबियों ने जब इस मंज़र को देखा तो उन के चेहरों के रंग उड़ गए और आंखों से मोती टपकने लगे। हज़रते जैनब ने आंसू बहाते हुए कहा प्यारे भय्या ! बीवियों ने दर्द में डूबी हुई आवाज़ से कहा हमारे सरताज ! और हज़रते सकीना ने रोते हुए कहा बाबा जान! कहां जा रहे हो ? इस जंगल में हमें किस के सुपुर्द करके जा रहे हो? जो दरिन्दे नन्हे अली असगर पर रहम नहीं खाए वह हमारे साथ क्या सुलूक करेंगे, फरमाया अल्लाह तुम लोगों का हाफिज़ व निगहबान हैं। फिर आप ने तमाम अहले खेमा को सब्रो-शुक्र की वसिय्यत फरमाई और सब को अपना आखिरी दीदार दिखा कर घोड़े पर सवार हो गए।

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फातिमा के लाडले का आखिरी दीदार है
हश्र का हंगामा बरपा है मियाने अहलेबैत

गरीबुल वतन और बेकस मुसाफिरों का दुख रसीदा काफिला हंस्रत भरी निगाहों से आप को देखता रहा । पर्दा नशीनाने हरम -हस्ररतो-यास (हस्तो उम्मीद) की खामोश तस्वीरें बनी हुई खड़ी रहीं और सब की आंखों से अश्के ग़म के मोती टपकते रहे, मगर कोई चीज़ हज़रत इमाम के पांव की बेड़ी न बन सकी, आप ने सब को खुदा के  हवाले किया और दुश्मनों के सामने पहुंच गए। कई दिन के भूके प्यासे हैं और बेटों, भाईयों, भतीजों और जां निसार साथियों के गम से निढाल हैं, इस के बावजूद पहाड़ों की तरह जमी हुई फौजों के मुकाबले में शेर की तरह डट कर खड़े हो गए और एक वलवला अंगेज़ रज्ज़ पढ़ी जो. आप के नसब और ज़ाती फज़ाइल पर मुश्तमिल थी, फिर आप ने एक फसीह व बलीग़ तक़रीर की, उस में आप ने हम्दो - सलात के बाद

फरमाया ऐ लोगो तुम जिस रसूल का कलिमा पढ़ते हो उसी रसूत का इरशाद है कि जिस ने हसन व हुसैन से दुश्मनी की उस ने मुझ से दुश्मनी की और जिस ने मुझ से दुश्मनी की उस ने अल्लाह तआला से दुश्मनी की । तो ऐ यज़ीदियो! अल्लाह से डरो और मेरी दुश्मनी से बाज़ आओ, अगर वाकई खुदा व रसूल पर ईमान रखते हो तो सोचो उस खुदाए शहीद व बसीर को क्या जवाब दोगे? और रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को क्या मुंह दिखाओगे? 

बेवफाओ ! तुम ने मुझे खुतूत भेज कर बुलाया और जब मैं यहां आया तो तुम ने मेरे साथ ऐसा बुरा सुलूक किया कि मज़ालिम की इन्तहा कर दी, जालिमो तुम ने मेरे बेटों, भाइयों और भतीजों को खाको खून में तड़पाया चमने ज़हरा के एक-एक फूल को काट डाला, मेरे तमाम साथियों को शहीद कर दिया और अब मेरे ख़ून के प्यासे हो, अपने रसूल का घर वीरान करने वालो अंगर कियामत पर ईमान रखते हो तो अपने अंजाम पर गौर करो और अपनी आकिबत पर नज़र डालो, फिर यह भी सोचो कि मैं कौन हूं? किस का नवासा हूं? मेरे वालिद कौन हैं? मेरी वालिदा किस की लख़्ते जिगर हैं? मैं उन्हीं फातिमा ज़हरा का फर्जुन्द हूं कि जिन के पुलसिरात पर गुज़रते वक़्त अर्श से निदा की जाएगी कि ऐ अहले महशर ! अपने सरों को झुका लो और अपनी आंखें बन्द कर लो, हज़रत खातूने जन्नत सत्तर हज़ार हूरों के साथ गुज़रने वाली हैं। बे ग़ैरतो ! अब भी वक्त है, शर्म से काम लो और मेरे खून से अपने हाथों को रंगीन मत करो। हज़रत इमाम की तक़रीर सुन कर यज़ीदी लश्कर के बहुत से लोग मुतअस्सिर हो गए और उन की आंखों से आंसू जारी हो गए लेकिन शिमर वग़ैरा बद बख़्त खुबीसों ने कोई असर न लिया बल्कि जब उन्होंने लश्करियों पर हज़रत इमाम की तक़रीर का कुछ असर देखा तो शोरो-गुल मचाना शुरू कर दिया कि आप या तो यज़ीद की बेत कर लें और या तो जंग के लिये तैयार हो जायें, इस के अलावा हम कुछ सुनना नहीं चाहते। इमाम ने फरमाया ऐ बद बातिनो ! मुझे ख़ूब मालूम है कि तुम्हारे दिलों पर शकावत व बद बख़्ती की मोहर लग चुकी है। और तुम्हारी गैरते ईमानी मुर्दा हो चुकी है लेकिन मैं ने यह तक़रीर सिर्फ इतमामे हुज्जत के लिये की है ताकि तुम यह न कह सको कि हम ने हक और इमामे बरहक को नहीं पहचाना था । अल्हम्दु लिल्लाह ! मैं ने तुम्हारा यह उज़र (वाना) खत्म कर दिया। अब रहा यज़ीद की बैअत का सवाल ? तो यह मुझ से हरगिज़ नहीं हो सकता कि मैं बातिल के सामने सर झुका दू ।



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मर्दे हक बातिल से हरगिज़ खौफ खा सकता नहीं

सर कटा सकता है लेकिन सर झुका सकता नहीं

इमामे आली मक़ाम ने जब देखा कि यह बद बख़्त मेरे कुल का वबाल अपनी गर्दन पर ज़रूर लेंगे और मेरा खून बहाने से किसी तरह बाज़ नहीं आयेंगे तो आप ने फरमाया अब तुम लोग जो इरादा रखते पूरा करो और जिसे मेरे मुकाबला के लिये भेजना चाहते हो भेजो । बड़े बड़े मशहूर बहादुर जो शेरे ख़ुदा के शेर से मुकाबला के लिये महफूज़ रखे गए थे, उन में से इब्ने सअद ने सब से पहले तमीम बिन कहतबा

को हज़रत इमाम से जंग करने के लिये भेजा, जो मुल्के शाम का नामी गरामी पहलवान था, वह गुरूर व तम्किनत ( घमन्ड) से हाथी की तरह झूमता हुआ और अपनी बहादुरी की डींगें मारता हुआ हज़रत के सामने आया और पहुंचते ही आप पर हमला करना चाहा, अभी उस का हाथ उठा ही था कि शेरे ख़ुदा के शेर ने जुलफिकारे हैदरी से ऐसा जंचा तुला वार किया कि उस का सर जिस्म से उड़ा दिया और उसके घमन्ड को ख़ाक में मिला दिया ।

फिर यजीद अबतही बड़े करों-फर के साथ आगे बढ़ा और चाहा कि इमाम के मुकाबिल बहादुरी का जौहर दिखा कर यज़ीदियों की जमाअत में अपनी शाबाशी हासिल करे और इनाम व इकराम का मुस्तहिक बने । आप के सामने पहुंच एक नारा मारा और कहा कि शाम व इराक के बहादुराने कोह शिकन में मेरी बहादुरी का गुलगुला (चर्चा) है, मैं रूम व मिस्र में शोहरए आफाक हूं बड़े-बड़े बहादुरों को आंख झपकते मौत के घाट उतारता हूं, सारी दुनिया के लोग मेरी शुजाअत व बहादुरी का लोहा मानते हैं और मेरे सामने भेड़ बकरी की तरह भागते हैं, किसी में मुझ से मुकाबला की ताकत नहीं, आज तुम मेरी कुव्वत और मेरे दाव पेच को देखो । इमामे आली मक़ाम ने फरमाया तू मुझे जानता नहीं, मैं अपनी रगों में हाशिमी खून रखता हूं, फातिहे खैबर, शेरे ख़ुदा, अली मुश्किल कुशा का शेरे नर हूं तुम जैसे ना मर्दों की मेरी निगाह में कोई हक़ीकत नहीं, मेरे नज़दीक मक्खी और मच्छर से ज्यादा तेरी हैसियत नहीं, शामी जवान यह सुन कर आग बगूला हो गया और फौरन घोड़ा कुदा कर आप पर तलवार का वार कर दिया, हज़रत इमाम ने उस के वार को बेकार कर दिया और फिर झपट कर उस की कमर पर ऐसी तलवार मारी कि वह खीरे की तरह कट कर दो टुकड़े हो गया और मुंह के बल ज़मीन पर गिर पड़ा। गिरा फौलाद का टुकड़ा ज़मीं पर सर निगूं होकर तकब्बुर बह गया ज़ख़्मों के रस्ते मौजे खुं होकर बदर बिन सुहैल यमनी इस मंज़र को देख कर गुस्से से लाल पीला हो गया और इब्ने सअद से कहा तुम ने किन गंवारों को हुसैन के मुकाबला में भेज दिया जो दो हाथ भी जम कर मुकाबला नहीं कर सके, मेरे चारों बेटों में से किसी एक को भेज दें, फिर देख अभी मिंटों में हुसैन का सर काट कर लाते हैं, इब्ने सअद ने उस के बड़े बेटे को इशारा किया वह घोड़ा कुदाता हुआ इमाम आली मकाम के सामने पहुंच गया, आप ने फरमाया बेहतर होता कि तेरा बाप मुकाबला में आता ताकि वह तुझें ख़ाको ख़ून में तड़पता हुआ न देखता। फिर आपने जुलफिकारे हैदरी से एक ही बार में उस का काम तमाम करके जहन्नम में पहुंचा दिया ।

बदर ने जब अपने मशहूर शहसवार बेटे को इस तरह ज़िल्लत के साथ कुल्ल होता हुआ देखा तो गैजो ग़ज़ब का पुतला बन कर दांत पीसते हुए थोड़ा दौड़ा कर इमाम के सामने आया और पहुंचते ही नेजा से वार किया, आप ने उस के नेज़ा को कलम कर दिया, उस ने फौरन तलवार संभाली और कहा हुसैन देखना में वह शमशीर मारता हूं कि अगर पहाड़ पर मारूं तो वह सुर्गा बन जाए, वह कहते हुए इमाम पर तलवार चला दी। आप ने उस के वार को खाली कर दिया और उस पर जुलफिकार का ऐसा भरपूर हाथ मारा कि बदर का सर कट कर गेंद की तरह दूर जाकर गिरा। इस तरह शाम व इराक के एक से एक बहादुर हज़रते इमाम के मुकाबिल आते रहे मगर जो भी सामने आया आप ने उसे मौत के घाट उतार दिया, कोई उन में से जिंदा बच कर वापस नहीं गया। शेरे खुदा के शेर ने तीन दिन का भूका प्यासा होने के बावजूद शुजाअत व बहादुरी के वह जौहर दिखाए कि ज़मीने करबला में बहादुराने कूफा व -शाम का खेत बो दिया। किसी के सीने में नेज़ा मारा और पार निकाल दिया, किसी को नेज़ा की अनी (नोक) पर उठा कर ज़मीन पर पटक दिया, उस की हड्डियां टूट गयीं, किसी का पटका पकड़ कर ज़मीन पर गिरा दिया और घोड़े की टापों से उसको रौंद डाला, किसी की कमर पर तलवार मारी तो वह दो टुकड़े होकर ज़मीन पर गिरा, किसी की गर्दन पर जुलफिकारे हैदरी चलाई तो उस का सर बेल की तरह लढ़कता हुआ चला गया और किसी के सर पर तलवारे आबदार मारी तो जीन तक कट गया।

गुरज़ कि इमामे आली मक़ाम ने दुश्मनों की लाशों का अंबार लगा दिया । बहादुराने शाम व इराक़ के ख़ूनों से करबाला के प्यासे रेगिस्तान को सैराब कर दिया। बड़े-बड़े सफ शिकन बहादुर काम आ गए और मशहूर जंग जू पहलवान मौत के घाट उतर गए, आप की हैवत व शुजाअत से दुश्मनों के दिल थर्रा गए और बड़े-बड़े घमंडियों के छक्के छूट गए, दुश्मनों के लश्कर में शोर बरपा हो गया कि जंग का यह अंदाज रहा तो हमारी जमाअत का एक सिपाठी पंच कर नहीं जा सकेगा, सबकी औरतें बेवा हो जायेंगी और सारे बच्चे यतीम हो जायेंगे। लिहाजा अब मौका मत दो और चारों तरफ से घेर कर हमला करो। रूवाह सिफत यज़ीदी जब दस्त बंदस्त की जंग में बुरी तरह शिकस्त खाए तो उन्हों ने यही तरीका इख़्तियार किया कि हज़ारों ने चारों तरफ से घेर कर हमला करना शुरू कर दिया।

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वो गुल एज़ारे फातिमा ख़ारों में घिर गया

तन्हा अली का लाल हज़ारों में घिर गया


अब सैकड़ों तलवारें बयक वक्त चमकने लगीं, पचासों ने आपस में टकराने लगे और दुश्मन बढ़ बढ़ कर इमाम पर वार करने लगे। इधर आप की तलवार जलाले हैदरी की तस्वीर और सा सैफ इस्ला जुलफिकार की तफ्सीर बनी हुई थी, आप तेंगे आबदार (चमचमाती हुई तलवार) के जौहर दिखा रहे थे, जिस तरफ हमला करते परे के परे काट डालते और दुश्मनों के सरों को इस तरह उड़ाते जैसे बादे खजां के झोंके पत्ते गिराते हैं। इब्ने सऊद को जब इस तरह की जंग में भी कामयाबी की उम्मीद नज़र न आई तो उस ने हुक्म दिया कि चारों तरफ से तीरों का मह बरसाया जाए और जब खूब जख्मी हो जायें तब नेजों से हमला किया जाए, तीर अंदाज़ों ने आप को चारों तरफ से घेर लिया और बंयक वक्त हज़ारों तीर कमानों से छूटने लगे और तीरों की बारिश शुरू हो गई, घोड़ा इस कदर ज़ख़्मी हो गया कि उस में काम करने की ताकत न रही, मजबूरन हज़रत इमाम को एक जगह ठहरना पड़ा, हर तरफ से वीर आ रहे हैं और इमाम मज़लूम का जिसमे सक्दस तीरों का निशाना बना हुआ है, तने नाज़नीन जख्मों से चूर और लहूलुहान हो रहा है।

बेवफा कूफियों ने जिगर पारए रसूल, फर्ज़न्दे बतूल को मेहमान बुला कर उन के साथ यह सुलूक किया, यहां तक कि ज़हर में बुझा हुआ एक तीर आप की उस मुक़द्दस पेशानी पर लगा जिसे रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने हज़ारों बार चूमा था, तीर लगते ही चेहरए अनवर पर खून का धारा बह निकला, आप गश खा कर घोड़े की ज़ीन से फर्शे ज़मीन पर आ गए, अब जालिमों ने नेज़ों से हमला किया, शैतान सिफत सनान ने एक ऐसा नेजा मारा जो तने अक्दस के पार हो गया । तीर और नेजा व शमशीर के 72 ज़ख़्म खाने के बाद आप सज्दे में गिरे और अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए वासिले बहक़ हो गए। 56 साल 5 माह 5 दिन की उम्र में; जुमा के दिन मुहर्रम की दस्वीं तारीख 61 हिजरी मुताबिक 680 ई0 को इमामे आली मक़ाम ने इस दारे फानी से रिहलत फरमाई । 

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन ।


यज़ीदियों ने समझा कि हम ने हुसैन का मार डाला और वह मर गए लेकिन ज़मीने करबला का जर्रा जर्रा ज़बाने हाल से हमेशा यह पुकारता रहेगा कि ऐ हुसैन !


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तू ज़िंदा है वल्लाह तू ज़िंदा है वल्लाह

मेरी चश्मे आलम से छुप जाने वाले


नज़र बिन खरशा आप के सरे मुबारक को तने अक्स से जुदा करने के लिये आगे बढ़ा मगर इमाम आली मकाम की हैबत से उस के हाथ कांप गए और तलवार छूट गई। फिर बद बख़्ते अज़ली खौली बिन यज़ीद, सनान बिन अनस, शिबल बिन यज़ीद या शिमर खुबीस ने आप के सरे अवदस को तने मुबारक से जुदा किया।


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शाह अस्त हुसैन बादशाह अस्त हुसैन:

दीन अस्त हुसैन दीने पाहत

सर दाद न दाद दस्त दर दस्ते यज़ीद

हक्का कि बिनाए ला इलाह अस्त हुसैन

रज़ियल्लाहु तआला अन्हु

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'कलिए तौहीद है तेरी शहादत ऐ हुसैन

तू न होता तो न रह जाती सदाकत ऐ हुसैन

तेरी कुर्बानी ने जिंदा कर दिया इस्लाम को

वो रहेगा ता अबद तेरी बदौलत ऐ हुसैन

ऐ हुसैन

कलिए तौहीद है तेरी शहादत ऐ हुसैन

तू न होता तो न रह जाती सदाकत ऐ हुसैन

तेरी कुर्बानी ने जिंदा कर दिया इस्लाम को

वो रहेगा ता अबद तेरी बदौलत ऐ हुसैन

तालिबाने मंज़िल अम्नो- सुकूं के वास्ते

तेरी कुर्बानी हुई शम्ए हिदायत ऐ हुसैन

मिल्लते इस्लाम को मिलता है एक दर्से हयात

कैसे भूलें हम तेरा यौमे शहादत ऐ हुसैन

एहतमाल आने का है फिर से यज़ीदियत का दौर

फिर जहाने नौ को है तेरी ज़रूरत ऐ हुसैन

हाल मेरा कुछ भी हो मेरा अकीदा है यही

बख़्शाएगी मुझे तेरी मुहब्बत ऐ हुसैन

रज़ियल्लाहु तआला अन्हु

  • बैकल बलराम पुरी

एक मर्तबा हम और आप सब लोग मिल कर मक्का के सरकार मदीना के ताजदार दो आलम के मुख्तार जनाब अहमदे मुज्तबा मुहम्मद, मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम और उन की आल व अस्हाब पर अकीदत व मुहब्बत के साथ दुरूदो सलाम की डालियां पेश करें ।


अल्लाहुम्मा सल्लि अला सैय्दिना व मौलाना मुहम्मदिवं व अला- आलि व अस्हाबही व अहलि बैतिही व बारिक्ं व सल्लिम् ।

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