📜 पूरी सूरह यासीन शरीफ़ – 83 आयतें (अरबी + हिंदी तर्जुमा)
📝 तिलावत का तरीक़ा: क़ुरआन की तिलावत हमेशा
अरबी में करें — हिंदी तर्जुमा सिर्फ़ मतलब समझने के
लिए है। तिलावत से पहले वुज़ू करें और "अऊज़ुबिल्लाह..." पढ़ें।
﷽
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम — अल्लाह के नाम से शुरू जो बड़ा
मेहरबान, निहायत रहम वाला है।
رکوع ۱ — पहला रुकूअ (आयत 1–12) — नबी ﷺ की नुबुव्वत की
तस्दीक़
आयत 1
يٰسٓ
यासीन।
📌 ये हुरूफ़-ए-मुक़त्त'आत हैं — अल्लाह के रहस्यमय अक्षर। इनका असल
मतलब सिर्फ़ अल्लाह जानता है।
आयत 2
وَالْقُرْاٰنِ الْحَكِيْمِ ۙ
उस हिकमत वाले क़ुरआन की क़सम।
📌 अल्लाह क़ुरआन की क़सम खाकर नबी ﷺ की नुबुव्वत की तस्दीक़ फ़रमा
रहा है।
आयत 3
اِنَّكَ لَمِنَ الْمُرْسَلِيْنَ ۙ
बेशक आप (ऐ मुहम्मद ﷺ) पैग़ंबरों में से हैं।
📌 अल्लाह का सीधा ख़िताब नबी ﷺ से — यह इस सूरह की सबसे पहली
ख़ुशख़बरी है।
आयत 4
عَلٰى صِرَاطٍ مُّسْتَقِيْمٍ ۚ
सीधे रास्ते पर (हैं)।
📌 नबी ﷺ का रास्ता — इस्लाम — सीधा और बिल्कुल सही है।
आयत 5
تَنْزِيْلَ الْعَزِيْزِ الرَّحِيْمِ ۙ
यह (क़ुरआन) उस ज़बरदस्त, मेहरबान (अल्लाह) की तरफ़ से उतारा गया है।
📌 अल्लाह के दो नाम — "अज़ीज़" (ज़बरदस्त, ताक़तवर) और "रहीम"
(मेहरबान) — एक साथ। ताक़त भी, रहमत भी।
आयत 6
لِتُنْذِرَ قَوْمًا مَّاۤ اُنْذِرَ اٰبَآؤُهُمْ فَهُمْ غٰفِلُوْنَ
ताकि आप उन लोगों को डराएँ जिनके बाप-दादा को (भी) नहीं डराया गया
था, पस वे ग़ाफ़िल हैं।
📌 अरब के लोग लंबे अरसे से बिना नबी के थे — इसलिए वे ग़फ़लत में
थे। नबी ﷺ उन तक पहुँचने आए।
आयत 7
لَقَدْ حَقَّ الْقَوْلُ عَلٰۤى اَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُوْنَ
बेशक उनमें से अक्सर (लोगों) पर बात साबित हो चुकी है — पस वे ईमान
नहीं लाएंगे।
📌 जो लोग हक़ जानते हुए भी इनकार करते हैं, उन पर अल्लाह की हुज्जत
(दलील) पूरी हो जाती है।
आयत 8
اِنَّا جَعَلْنَا فِيْۤ اَعْنَاقِهِمْ اَغْلٰلًا فَهِيَ اِلَى
الْاَذْقَانِ فَهُمْ مُّقْمَحُوْنَ
बेशक हमने उनकी गर्दनों में बेड़ियाँ डाल दी हैं जो ठोड़ियों तक
पहुँची हुई हैं — पस वे ऊपर मुँह उठाए हुए हैं।
📌 यह तस्वीरी (Metaphorical) बयान है — इनकारियों की ज़िद और
तकब्बुर (घमंड) का बयान। वे इतने अकड़े हुए हैं जैसे गर्दन में
बेड़ियाँ हों।
आयत 9
وَجَعَلْنَا مِنْۢ بَيْنِ اَيْدِيْهِمْ سَدًّا وَّمِنْ خَلْفِهِمْ
سَدًّا فَاَغْشَيْنٰهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُوْنَ
और हमने उनके आगे एक दीवार खड़ी कर दी और उनके पीछे एक दीवार — और
हमने उन्हें ढाँप दिया — पस वे देख नहीं सकते।
📌 जो लोग हक़ से मुँह फेरते हैं, उन पर ग़फ़लत का पर्दा पड़ जाता है
— आगे भी हक़ नहीं दिखता, पीछे भी नहीं।
आयत 10
وَسَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَاَنْذَرْتَهُمْ اَمْ لَمْ تُنْذِرْهُمْ لَا
يُؤْمِنُوْنَ
और उनके लिए बराबर है — चाहे आप उन्हें डराएँ या न डराएँ — वे ईमान
नहीं लाएंगे।
📌 नबी ﷺ को तसल्ली — जो लोग ज़िद से इनकार करते हैं, उनके न मानने
से नबी ﷺ की ज़िम्मेदारी कम नहीं होती।
आयत 11
اِنَّمَا تُنْذِرُ مَنِ اتَّبَعَ الذِّكْرَ وَخَشِيَ الرَّحْمٰنَ
بِالْغَيْبِ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍ وَّاَجْرٍ كَرِيْمٍ
बस आप उसी को डरा सकते हैं जो नसीहत का पाबंद हो और ग़ैब में रहमान
से डरे — तो उसे मग़फ़िरत और इज़्ज़त वाले अज्र की ख़ुशख़बरी दो।
📌 जो लोग क़ुरआन सुनते हैं और अल्लाह से डरते हैं — उनके लिए
मग़फ़िरत और बड़ा अज्र (बदला) है।
आयत 12
اِنَّا نَحْنُ نُحْيِ الْمَوْتٰى وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوْا
وَاٰثَارَهُمْ ۗ وَكُلَّ شَيْءٍ اَحْصَيْنٰهُ فِيْۤ اِمَامٍ
مُّبِيْنٍ
बेशक हम ही मुर्दों को ज़िंदा करेंगे और हम लिखते हैं जो वे आगे
भेजते हैं और उनके निशान — और हर चीज़ को हमने एक रोशन किताब में गिन
रखा है।
📌 हर अमल लिखा जा रहा है — नेकी और बदी दोनों — लौह-ए-महफ़ूज़
(Preserved Tablet) में। यहाँ पहला "مُبِيْن" आया है।
رکوع ۲ — दूसरा रुकूअ (आयत 13–32) — अन्ताकिया और हबीब नज्जार की
क़िस्सा
आयत 13
وَاضْرِبْ لَهُمْ مَّثَلًا اَصْحٰبَ الْقَرْيَةِ ۘ اِذْ جَآءَهَا
الْمُرْسَلُوْنَ
और उनके सामने एक बस्ती वालों की मिसाल बयान करो — जब उनके पास रसूल
आए।
📌 यह बस्ती "अन्ताकिया" (Antioch) थी — जो आज तुर्की में है। यहाँ
से एक बड़ा सबक़ शुरू होता है।
आयत 14
اِذْ اَرْسَلْنَاۤ اِلَيْهِمُ اثْنَيْنِ فَكَذَّبُوْهُمَا
فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍ فَقَالُوْۤا اِنَّاۤ اِلَيْكُمْ
مُّرْسَلُوْنَ
जब हमने उनकी तरफ़ दो (रसूल) भेजे, तो उन्होंने दोनों को झुठला दिया
— तो हमने तीसरे से उनकी मदद की, तो उन्होंने कहा: "बेशक हम तुम्हारी
तरफ़ भेजे गए हैं।"
📌 अल्लाह ने एक के बाद एक मदद की — यह अल्लाह की रहमत है। इनकार के
बावजूद तीसरा रसूल भेजा।
आयत 15
قَالُوْا مَاۤ اَنْتُمْ اِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُنَا وَمَاۤ اَنْزَلَ
الرَّحْمٰنُ مِنْ شَيْءٍ ۙ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا تَكْذِبُوْنَ
वे बोले: "तुम तो हमारे जैसे इंसान ही हो, और रहमान ने कुछ भी नहीं
उतारा — तुम सिर्फ़ झूठ बोल रहे हो।"
📌 मुशरिकों का पुराना बहाना — "नबी तो इंसान है, फ़रिश्ता क्यों
नहीं?" — यह बहाना आज भी लोग देते हैं।
आयत 16
قَالُوْا رَبُّنَا يَعْلَمُ اِنَّاۤ اِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُوْنَ
रसूलों ने कहा: "हमारा रब जानता है कि हम तुम्हारी तरफ़ ज़रूर भेजे
गए हैं।"
📌 रसूलों का जवाब — ख़ामोश यक़ीन। सुबूत देने की ज़रूरत नहीं —
अल्लाह गवाह है।
आयत 17
وَمَا عَلَيْنَاۤ اِلَّا الْبَلٰغُ الْمُبِيْنُ
और हम पर तो सिर्फ़ साफ़-साफ़ पहुँचा देने का फ़र्ज़ है।
📌 यहाँ दूसरा "مُبِيْن" आया है। रसूलों की ज़िम्मेदारी — पहुँचाना,
मनाना नहीं। हिदायत देना अल्लाह का काम है।
आयत 18
قَالُوْۤا اِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۚ لَئِنْ لَّمْ تَنْتَهُوْا
لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُمْ مِّنَّا عَذَابٌ اَلِيْمٌ
वे बोले: "हम तुम्हें अपशकुन समझते हैं — अगर तुमने बाज़ न आए तो हम
तुम्हें ज़रूर संगसार करेंगे और हमारी तरफ़ से तुम पर दर्दनाक अज़ाब
आएगा।"
📌 धमकी — यह इनकारियों का आख़िरी हथियार होता है। जब दलील ख़त्म हो
जाए तो डराने लगते हैं।
आयत 19
قَالُوْا طَاۤئِرُكُمْ مَّعَكُمْ ۗ اَئِنْ ذُكِّرْتُمْ ۗ بَلْ
اَنْتُمْ قَوْمٌ مُّسْرِفُوْنَ
रसूलों ने कहा: "तुम्हारा अपशकुन तुम्हारे साथ ही है — क्या तुम्हें
नसीहत की गई तो (यह कहते हो)? बल्कि तुम हद से बढ़े हुए लोग हो।"
📌 रसूलों का निडर जवाब — हक़ की दावत देने वाले कभी धमकियों से नहीं
डरते।
आयत 20
وَجَآءَ مِنْ اَقْصَا الْمَدِيْنَةِ رَجُلٌ يَّسْعٰى قَالَ يٰقَوْمِ
اتَّبِعُوا الْمُرْسَلِيْنَ
और शहर के दूर-दराज़ से एक आदमी दौड़ता हुआ आया — उसने कहा: "ऐ मेरी
क़ौम! पैग़ंबरों की पैरवी करो।"
📌 यह शख़्स हबीब नज्जार थे — एक बढ़ई (نجّار) जो शहर के दूर कोने से
दौड़ते हुए आए। अकेले ख़ड़े हो गए हज़ारों के सामने।
आयत 21
اتَّبِعُوْا مَنْ لَّا يَسْـَٔلُكُمْ اَجْرًا وَّهُمْ مُّهْتَدُوْنَ
उनकी पैरवी करो जो तुमसे कोई मेहनताना नहीं माँगते और वे सीधे रास्ते
पर हैं।
📌 हबीब नज्जार की दावत का पहला सुबूत — "वो तुमसे कुछ नहीं माँगते।"
बे-ग़रज़ दावत सबसे असरदार होती है।
आयत 22
وَمَا لِيَ لَاۤ اَعْبُدُ الَّذِيْ فَطَرَنِيْ وَاِلَيْهِ
تُرْجَعُوْنَ
और मुझे क्या हो गया है कि मैं उसकी इबादत न करूँ जिसने मुझे पैदा
किया — और तुम सब उसी की तरफ़ लौटाए जाओगे।
📌 हबीब नज्जार का मज़बूत तर्क — "मैं उस अल्लाह की इबादत क्यों न
करूँ जिसने मुझे बनाया?"
आयत 23
ءَاَتَّخِذُ مِنْ دُوْنِهٖۤ اٰلِهَةً اِنْ يُّرِدْنِ الرَّحْمٰنُ
بِضُرٍّ لَّا تُغْنِ عَنِّيْ شَفَاعَتُهُمْ شَيْـًٔا وَّلَا
يُنْقِذُوْنَ
क्या मैं उसे छोड़कर और ख़ुदा बना लूँ? अगर रहमान मुझे कोई नुक़सान
पहुँचाना चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे किसी काम न आएगी और न वे मुझे
बचा सकेंगे।
📌 तौहीद का सबसे मज़बूत दलील — झूठे ख़ुदा मुसीबत में काम नहीं आते।
आयत 24
اِنِّيْۤ اِذًا لَّفِيْ ضَلٰلٍ مُّبِيْنٍ
तब तो मैं खुली गुमराही में होऊँगा।
📌 तीसरा "مُبِيْن" — हबीब नज्जार कह रहे हैं: "अगर मैं शिर्क करूँ
तो यह खुली गुमराही होगी।"
आयत 25
اِنِّيْۤ اٰمَنْتُ بِرَبِّكُمْ فَاسْمَعُوْنِ
बेशक मैं तुम्हारे रब पर ईमान ले आया — पस मेरी बात सुनो।
📌 हबीब नज्जार का जुर्रत भरा ऐलान — हज़ारों दुश्मनों के सामने ईमान
का इज़हार।
आयत 26
قِيْلَ ادْخُلِ الْجَنَّةَ ۗ قَالَ يٰلَيْتَ قَوْمِيْ يَعْلَمُوْنَ
(उसे शहीद किया गया तो अल्लाह ने) कहा: "जन्नत में दाख़िल हो जा।"
उसने कहा: "काश! मेरी क़ौम जान लेती।"
📌 हबीब नज्जार को शहीद किया गया — फ़ौरन जन्नत। और जन्नत में भी
पहली बात — अपनी क़ौम की फ़िक्र। यह इख़्लास की इंतेहा है।
आयत 27
بِمَا غَفَرَ لِيْ رَبِّيْ وَجَعَلَنِيْ مِنَ الْمُكْرَمِيْنَ
"कि मेरे रब ने मुझे बख़्श दिया और मुझे इज़्ज़त वालों में शामिल कर
दिया।"
📌 क़ुरआन का यह मक़ाम — एक सच्चे ईमानदार का अंजाम — दोनों दुनिया
में इज़्ज़त।
आयत 28
وَمَاۤ اَنْزَلْنَا عَلٰى قَوْمِهٖ مِنْۢ بَعْدِهٖ مِنْ جُنْدٍ مِّنَ
السَّمَآءِ وَمَا كُنَّا مُنْزِلِيْنَ
और उसके बाद हमने उसकी क़ौम पर आसमान से कोई लश्कर नहीं उतारा, न
हमें उतारना था।
📌 अल्लाह को बड़े लश्करों की ज़रूरत नहीं — एक चीख़ काफ़ी थी।
आयत 29
اِنْ كَانَتْ اِلَّا صَيْحَةً وَّاحِدَةً فَاِذَا هُمْ خٰمِدُوْنَ
बस एक ही चीख़ थी — तो वे बुझ गए (हलाक हो गए)।
📌 पूरी बस्ती एक आवाज़ से तबाह — यह अल्लाह की क़ुदरत है।
आयत 30
يٰحَسْرَةً عَلَى الْعِبَادِ ۚ مَا يَاْتِيْهِمْ مِّنْ رَّسُوْلٍ
اِلَّا كَانُوْا بِهٖ يَسْتَهْزِءُوْنَ
हाय, अफ़सोस इन बंदों पर! कोई रसूल उनके पास नहीं आया मगर वे उसका
मज़ाक उड़ाते रहे।
📌 अल्लाह का अफ़सोस — यह उसकी रहमत की दलील है। अल्लाह चाहता है कि
सब बंदे हिदायत पाएँ।
आयत 31
اَلَمْ يَرَوْا كَمْ اَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِّنَ الْقُرُوْنِ
اَنَّهُمْ اِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُوْنَ
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनसे पहले कितनी क़ौमों को हलाक
किया — वे कभी नहीं लौटेंगे।
📌 तारीख़ की गवाही — इनकार करने वाली क़ौमें — क़ौमे-नूह, क़ौमे-आद,
क़ौमे-समूद — सब हलाक हो गईं।
आयत 32
وَاِنْ كُلٌّ لَّمَّا جَمِيْعٌ لَّدَيْنَا مُحْضَرُوْنَ
और ये सब के सब हमारे सामने हाज़िर किए जाएंगे।
📌 सब — पहले वाले और बाद वाले — क़यामत में हाज़िर होंगे। कोई नहीं
छूटेगा।
رکوع ۳ — तीसरा रुकूअ (आयत 33–50) — अल्लाह की क़ुदरत की
निशानियाँ
आयत 33
وَاٰيَةٌ لَّهُمُ الْاَرْضُ الْمَيْتَةُ ۖ اَحْيَيْنٰهَا
وَاَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّا فَمِنْهُ يَاْكُلُوْنَ
और उनके लिए एक निशानी मुर्दा ज़मीन है — हमने उसे ज़िंदा किया और
उससे अनाज निकाला तो वे उसे खाते हैं।
📌 मुर्दा ज़मीन का ज़िंदा होना — यह दोबारा ज़िंदगी (Resurrection)
की दलील है। जो मुर्दा ज़मीन को ज़िंदा कर सकता है, वो मुर्दा इंसान
को भी ज़िंदा कर सकता है।
आयत 34
وَجَعَلْنَا فِيْهَا جَنّٰتٍ مِّنْ نَّخِيْلٍ وَّاَعْنَابٍ
وَّفَجَّرْنَا فِيْهَا مِنَ الْعُيُوْنِ
और हमने उसमें खजूर और अंगूर के बाग़ लगाए और उसमें चश्मे जारी किए।
📌 खजूर और अंगूर — अरब के दो सबसे ज़रूरी फल — अल्लाह की नेमत।
आयत 35
لِيَاْكُلُوْا مِنْ ثَمَرِهٖ وَمَا عَمِلَتْهُ اَيْدِيْهِمْ ۗ
اَفَلَا يَشْكُرُوْنَ
ताकि वे इसके फलों में से खाएँ — जो उनके हाथों ने नहीं बनाया। तो
क्या वे शुक्र नहीं करते?
📌 इंसान ने ये फल नहीं बनाए — बस उगाए। बनाया अल्लाह ने। तो शुक्र
भी अल्लाह का होना चाहिए।
आयत 36
سُبْحٰنَ الَّذِيْ خَلَقَ الْاَزْوَاجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنْۢبِتُ
الْاَرْضُ وَمِنْ اَنْفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُوْنَ
पाक है वो जिसने सब जोड़े बनाए — ज़मीन से जो उगती है, ख़ुद उनकी
जानों से, और उन चीज़ों से जिन्हें वे नहीं जानते।
📌 "जोड़े" — नर-मादा, रात-दिन, ज़मीन-आसमान — और वो चीज़ें जो हम
अभी नहीं जानते (जैसे Antimatter जो बाद में दरयाफ़्त हुई)।
आयत 37
وَاٰيَةٌ لَّهُمُ الَّيْلُ ۖ نَسْلَخُ مِنْهُ النَّهَارَ فَاِذَا
هُمْ مُّظْلِمُوْنَ
और उनके लिए एक निशानी रात है — हम उससे दिन को खींच लेते हैं तो वे
अँधेरे में रह जाते हैं।
📌 "نَسْلَخُ" — खींचना, उतारना — जैसे खाल उतारते हैं। दिन से रात
का आना इतना ज़रूरी है जितना साँस।
आयत 38
وَالشَّمْسُ تَجْرِيْ لِمُسْتَقَرٍّ لَّهَا ۗ ذٰلِكَ تَقْدِيْرُ
الْعَزِيْزِ الْعَلِيْمِ
और सूरज अपने ठिकाने की तरफ़ चला जा रहा है — यह ज़बरदस्त, जाननेवाले
(अल्लाह) का बाँधा हुआ अंदाज़ा है।
📌 विज्ञान ने बाद में साबित किया कि सूरज हमारी Galaxy के केंद्र की
तरफ़ सफ़र कर रहा है — 1400 साल पहले यह आयत नाज़िल हुई।
आयत 39
وَالْقَمَرَ قَدَّرْنٰهُ مَنَازِلَ حَتّٰى عَادَ كَالْعُرْجُوْنِ
الْقَدِيْمِ
और चाँद — हमने उसके लिए मंज़िलें मुक़र्रर की हैं, यहाँ तक कि वह
पुरानी खजूर की टहनी की तरह हो जाता है।
📌 चाँद की 28 मंज़िलें (Lunar Mansions) और उसका हिलाल से बदरकामिल
तक का सफ़र। "खजूर की पुरानी टहनी" — ख़मीदा, पतली — बिल्कुल सही
तस्वीर।
आयत 40
لَا الشَّمْسُ يَنْۢبَغِيْ لَهَاۤ اَنْ تُدْرِكَ الْقَمَرَ وَلَا
الَّيْلُ سَابِقُ النَّهَارِ وَكُلٌّ فِيْ فَلَكٍ يَّسْبَحُوْنَ
न सूरज के लिए यह मुमकिन है कि वह चाँद को पकड़े और न रात दिन से आगे
निकल सकती है — और सब एक-एक मदार में तैर रहे हैं।
📌 Modern Astronomy की सबसे बड़ी दलील क़ुरआन में — सूरज और चाँद के
अलग-अलग Orbits। "فَلَكٍ" — गोल मदार — यही आज का Orbital Path है।
आयत 41
وَاٰيَةٌ لَّهُمْ اَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِي الْفُلْكِ
الْمَشْحُوْنِ
और उनके लिए एक निशानी यह है कि हमने उनकी नस्ल को भरी हुई कश्ती
(जहाज़) में सवार किया।
📌 हज़रत नूह ﷺ की कश्ती का इशारा — जिसमें हर जानदार की नस्ल थी।
आयत 42
وَخَلَقْنَا لَهُمْ مِّنْ مِّثْلِهٖ مَا يَرْكَبُوْنَ
और हमने उनके लिए उसी जैसी और सवारियाँ बनाई हैं जिन पर वे सवार होते
हैं।
📌 समुद्री जहाज़, जानवर, आज की गाड़ियाँ और जहाज़ — सब अल्लाह की दी
हुई नेमत।
आयत 43
وَاِنْ نَّشَاْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيْخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ
يُنْقَذُوْنَ
और अगर हम चाहें तो उन्हें डुबो दें — फिर न उनके लिए कोई फ़रियाद
करने वाला होगा और न वे बचाए जाएंगे।
📌 अल्लाह की ताक़त का बयान — वो चाहे तो पल में तबाह कर सकता है।
लेकिन रहमत से छोड़ता है।
आयत 44
اِلَّا رَحْمَةً مِّنَّا وَمَتَاعًا اِلٰى حِيْنٍ
मगर हमारी रहमत से और एक वक़्त तक फ़ायदा उठाने के लिए।
📌 इंसान की पूरी ज़िंदगी — अल्लाह की रहमत और मोहलत का नाम है।
आयत 45
وَاِذَا قِيْلَ لَهُمُ اتَّقُوْا مَا بَيْنَ اَيْدِيْكُمْ وَمَا
خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُوْنَ
और जब उनसे कहा जाता है: "डरो उससे जो तुम्हारे आगे है और जो
तुम्हारे पीछे है — ताकि तुम पर रहम किया जाए।"
📌 "आगे" — दुनिया के आज़माइश, "पीछे" — गुज़री हुई ग़लतियाँ। दोनों
से सीखो।
आयत 46
وَمَا تَاْتِيْهِمْ مِّنْ اٰيَةٍ مِّنْ اٰيٰتِ رَبِّهِمْ اِلَّا
كَانُوْا عَنْهَا مُعْرِضِيْنَ
और उनके पास अपने रब की निशानियों में से कोई निशानी नहीं आती मगर वे
उससे मुँह फेर लेते हैं।
📌 इनकारियों की आदत — निशानी आए, मुँह फेर लें। यह आज भी देखने को
मिलता है।
आयत 47
وَاِذَا قِيْلَ لَهُمْ اَنْفِقُوْا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللّٰهُ قَالَ
الَّذِيْنَ كَفَرُوْا لِلَّذِيْنَ اٰمَنُوْۤا اَنُطْعِمُ مَنْ لَّوْ
يَشَآءُ اللّٰهُ اَطْعَمَهٗ اِنْ اَنْتُمْ اِلَّا فِيْ ضَلٰلٍ
مُّبِيْنٍ
और जब उनसे कहा जाता है: "अल्लाह ने तुम्हें जो रिज़्क़ दिया है
उसमें से ख़र्च करो।" तो काफ़िर मुसलमानों से कहते हैं: "क्या हम उसे
खिलाएँ जिसे अगर अल्लाह चाहता तो ख़ुद खिला देता? — तुम सिर्फ़ खुली
गुमराही में हो।"
📌 चौथा "مُبِيْن" — काफ़िरों का बहाना। लेकिन रिज़्क़ देना अल्लाह
का काम है, ख़र्च करना इंसान की ज़िम्मेदारी।
आयत 48
وَيَقُوْلُوْنَ مَتٰى هٰذَا الْوَعْدُ اِنْ كُنْتُمْ صٰدِقِيْنَ
और वे कहते हैं: "यह वादा (क़यामत) कब पूरा होगा — अगर तुम सच्चे
हो?"
📌 मज़ाक़ में पूछते हैं — लेकिन जवाब अगली आयत में आता है: "एक चीख़
आएगी।"
आयत 49
مَا يَنْظُرُوْنَ اِلَّا صَيْحَةً وَّاحِدَةً تَاْخُذُهُمْ وَهُمْ
يَخِصِّمُوْنَ
वे सिर्फ़ एक चीख़ का इंतज़ार कर रहे हैं जो उन्हें आ पकड़ेगी जब वे
(आपस में) झगड़ रहे होंगे।
📌 क़यामत अचानक आएगी — लोग बाज़ार में, लड़ाई में, ज़िंदगी में
मसरूफ़ होंगे — एक चीख़ सब ख़त्म।
आयत 50
فَلَا يَسْتَطِيْعُوْنَ تَوْصِيَةً وَّلَاۤ اِلٰۤى اَهْلِهِمْ
يَرْجِعُوْنَ
तो न वे वसीयत कर सकेंगे और न अपने घर वालों की तरफ़ लौट सकेंगे।
📌 इतनी अचानक — वसीयत का भी मौक़ा नहीं। घर वाले याद रह जाएंगे
लेकिन लौटना नहीं होगा।
رکوع ۴ — चौथा रुकूअ (आयत 51–67) — क़यामत का दिन
आयत 51
وَنُفِخَ فِي الصُّوْرِ فَاِذَا هُمْ مِّنَ الْاَجْدَاثِ اِلٰى
رَبِّهِمْ يَنْسِلُوْنَ
और सूर में फूँक मारी जाएगी — तो वे क़ब्रों से अपने रब की तरफ़ दौड़
पड़ेंगे।
📌 दूसरा सूर — मुर्दे ज़िंदा होंगे। पहले सूर से सब मरेंगे, दूसरे
से उठेंगे।
आयत 52
قَالُوْا يٰوَيْلَنَا مَنْۢ بَعَثَنَا مِنْ مَّرْقَدِنَا ۗ هٰذَا مَا
وَعَدَ الرَّحْمٰنُ وَصَدَقَ الْمُرْسَلُوْنَ
वे कहेंगे: "हाय हमारी बदबख़्ती! हमें हमारी सोने की जगह से किसने
उठाया?" (जवाब दिया जाएगा:) "यही वह है जिसका रहमान ने वादा किया था
और पैग़ंबरों ने सच कहा था।"
📌 क़ब्र को "नींद की जगह" कहा — क्योंकि मुर्दे को महसूस होता है
जैसे सो रहे थे। लेकिन जागेंगे तो हिसाब के लिए।
आयत 53
اِنْ كَانَتْ اِلَّا صَيْحَةً وَّاحِدَةً فَاِذَا هُمْ جَمِيْعٌ
لَّدَيْنَا مُحْضَرُوْنَ
बस एक ही चीख़ होगी — तो वे सब के सब हमारे सामने हाज़िर कर दिए
जाएंगे।
📌 अरबों-खरबों इंसान — एक पल में — अल्लाह के सामने। यह अल्लाह की
क़ुदरत है।
आयत 54
فَالْيَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْـًٔا وَّلَا تُجْزَوْنَ اِلَّا
مَا كُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ
तो आज किसी पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं होगा और तुम्हें वही बदला दिया
जाएगा जो तुम करते थे।
📌 क़यामत का अदालत — पूरी इन्साफ़। दुनिया में जो ज़ुल्म हुआ वो
वहाँ नहीं होगा।
आयत 55
اِنَّ اَصْحٰبَ الْجَنَّةِ الْيَوْمَ فِيْ شُغُلٍ فٰكِهُوْنَ
बेशक जन्नत वाले आज मश्ग़ूल (व्यस्त) होंगे — ख़ुश और मसरूर।
📌 जन्नत वाले इतने ख़ुश होंगे कि दुनिया की कोई याद न होगी — सिर्फ़
ख़ुशी।
आयत 56
هُمْ وَاَزْوَاجُهُمْ فِيْ ظِلٰلٍ عَلَى الْاَرَآئِكِ مُتَّكِـُٔوْنَ
वे और उनके जोड़े छाँव में तख़्तों पर टेक लगाए बैठे होंगे।
📌 जन्नत की तस्वीर — छाँव, आराम, और अपना परिवार साथ। दुनिया की
सबसे बड़ी नेमत यही है।
आयत 57
لَهُمْ فِيْهَا فَاكِهَةٌ وَّلَهُمْ مَّا يَدَّعُوْنَ
उनके लिए वहाँ फल होंगे और जो वे माँगेंगे (वो मिलेगा)।
📌 जन्नत में दिल की हर ख़्वाहिश पूरी होगी — बिना माँगे भी और
माँगने पर भी।
आयत 58
سَلٰمٌ ۗ قَوْلًا مِّنْ رَّبٍّ رَّحِيْمٍ
मेहरबान रब की तरफ़ से "सलाम" (का कलाम) होगा।
📌 अल्लाह ख़ुद जन्नतियों को "सलाम" कहेगा — यह सबसे बड़ी इज़्ज़त
है। दुनिया की कोई इज़्ज़त इससे बड़ी नहीं।
आयत 59
وَامْتَازُوا الْيَوْمَ اَيُّهَا الْمُجْرِمُوْنَ
और (कहा जाएगा): "ऐ गुनाहगारो! आज अलग हो जाओ।"
📌 क़यामत में जन्नती और दोज़ख़ी अलग कर दिए जाएंगे — उस दिन कोई
ग़लती नहीं होगी।
आयत 60
اَلَمْ اَعْهَدْ اِلَيْكُمْ يٰبَنِيْۤ اٰدَمَ اَنْ لَّا تَعْبُدُوا
الشَّيْطٰنَ ۚ اِنَّهٗ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِيْنٌ
ऐ आदम की औलाद! क्या मैंने तुमसे यह अहद नहीं लिया था कि शैतान की
इबादत मत करो — बेशक वो तुम्हारा खुला दुश्मन है?
📌 पाँचवाँ "مُبِيْن" — शैतान का "खुला दुश्मन" होना। यह अहद फ़ितरत
में हर इंसान के साथ हुआ।
आयत 61
وَاَنِ اعْبُدُوْنِيْ ۗ هٰذَا صِرَاطٌ مُّسْتَقِيْمٌ
और यह कि मेरी इबादत करो — यही सीधा रास्ता है।
📌 अल्लाह का एकमात्र तरीक़ा — उसकी इबादत। यही सीधा रास्ता है।
आयत 62
وَلَقَدْ اَضَلَّ مِنْكُمْ جِبِلًّا كَثِيْرًا ۗ اَفَلَمْ
تَكُوْنُوْا تَعْقِلُوْنَ
और बेशक उसने तुममें से बहुत से लोगों को गुमराह किया — क्या तुम
अक़्ल नहीं रखते थे?
📌 शैतान ने अरबों लोगों को गुमराह किया — यह अल्लाह का हिसाब नहीं,
शैतान का ख़ुद का ऐलान था।
आयत 63
هٰذِهٖ جَهَنَّمُ الَّتِيْ كُنْتُمْ تُوْعَدُوْنَ
यह वही जहन्नम है जिसका तुमसे वादा किया जाता था।
📌 दुनिया में जो जहन्नम की बात सुनते थे — आज आँखों के सामने है।
आयत 64
اِصْلَوْهَا الْيَوْمَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُوْنَ
आज इसमें जलो — उस कुफ़्र की वजह से जो तुम करते थे।
📌 जहन्नम — कुफ़्र और गुनाहों का नतीजा। यह ज़ुल्म नहीं — इन्साफ़
है।
आयत 65
اَلْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلٰۤى اَفْوَاهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَاۤ
اَيْدِيْهِمْ وَتَشْهَدُ اَرْجُلُهُمْ بِمَا كَانُوْا يَكْسِبُوْنَ
आज हम उनके मुँहों पर मुहर लगा देंगे — उनके हाथ हमसे बात करेंगे और
उनके पाँव गवाही देंगे उन कामों की जो वे करते थे।
📌 सबसे हैरतअंगेज़ आयत — मुँह बंद, हाथ-पाँव बोलेंगे। आज के DNA
Evidence और CCTV कुछ भी नहीं — ख़ुद अपना जिस्म गवाह होगा।
आयत 66
وَلَوْ نَشَآءُ لَطَمَسْنَا عَلٰۤى اَعْيُنِهِمْ فَاسْتَبَقُوا
الصِّرَاطَ فَاَنّٰى يُبْصِرُوْنَ
और अगर हम चाहते तो उनकी आँखें मिटा देते — फिर वे रास्ते की तरफ़
दौड़ते — तो कैसे देखते?
📌 अल्लाह की क़ुदरत — पल में आँखें मिटा सकता है। फिर भी इंसान
शुक्र नहीं करता।
आयत 67
وَلَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنٰهُمْ عَلٰى مَكَانَتِهِمْ فَمَا
اسْتَطَاعُوْا مُضِيًّا وَّلَا يَرْجِعُوْنَ
और अगर हम चाहते तो उन्हें उनकी जगह पर मस्ख़ (रूप बदल) कर देते —
फिर न वे आगे जा सकते और न पीछे लौट सकते।
📌 मस्ख़ — शक्ल बदलना — अल्लाह ने कुछ उम्मतों को मस्ख़ किया (बंदर,
सुअर)। यह चेतावनी है।
رکوع ۵ — पाँचवाँ रुकूअ (आयत 68–83) — कुन फ़यकून तक
आयत 68
وَمَنْ نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِي الْخَلْقِ ۗ اَفَلَا
يَعْقِلُوْنَ
और जिसे हम लंबी उम्र देते हैं, हम उसे पैदाइश में उलट देते हैं
(यानी बुढ़ापे की कमज़ोरी की तरफ़) — क्या वे अक़्ल नहीं रखते?
📌 बुढ़ापा — बचपन की कमज़ोरी की तरफ़ लौटना। यह नसीहत है — वक़्त
गुज़रता है, नेकी करने की जल्दी करो।
आयत 69
وَمَا عَلَّمْنٰهُ الشِّعْرَ وَمَا يَنْۢبَغِيْ لَهٗ ۗ اِنْ هُوَ
اِلَّا ذِكْرٌ وَّقُرْاٰنٌ مُّبِيْنٌ
और हमने उन्हें (नबी ﷺ को) शायरी नहीं सिखाई और न यह उनके
शायान-ए-शान है — यह तो बस एक नसीहत और रोशन क़ुरआन है।
📌 छठा "مُبِيْن" — "रोशन क़ुरआन।" मुशरिकों ने नबी ﷺ पर शायर होने
का इल्ज़ाम लगाया था। अल्लाह ने रद्द किया।
आयत 70
لِيُنْذِرَ مَنْ كَانَ حَيًّا وَّيَحِقَّ الْقَوْلُ عَلَى
الْكٰفِرِيْنَ
ताकि वो उसे डराए जो ज़िंदा हो और काफ़िरों पर बात साबित हो जाए।
📌 "जो ज़िंदा हो" — दिल का ज़िंदा होना। जो दिल से सुने, उसे राह
मिलती है।
आयत 71
اَوَلَمْ يَرَوْا اَنَّا خَلَقْنَا لَهُمْ مِّمَّا عَمِلَتْ
اَيْدِيْنَاۤ اَنْعَامًا فَهُمْ لَهَا مٰلِكُوْنَ
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके लिए अपने हाथों से (मवेशी)
जानवर पैदा किए — और वे उनके मालिक हैं।
📌 ऊँट, गाय, बकरी, भेड़ — सब अल्लाह की नेमत। इंसान ने नहीं बनाए —
लेकिन मालिक बन गया।
आयत 72
وَذَلَّلْنٰهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوْبُهُمْ وَمِنْهَا
يَاْكُلُوْنَ
और हमने उन्हें उनके लिए वश में कर दिया — उनमें से कुछ उनकी सवारी
हैं और कुछ को वे खाते हैं।
📌 "वश में कर दिया" — ऊँट जैसा बड़ा जानवर एक बच्चा भी चला सकता है
— यह अल्लाह का करम है।
आयत 73
وَلَهُمْ فِيْهَا مَنَافِعُ وَمَشَارِبُ ۗ اَفَلَا يَشْكُرُوْنَ
और उनमें उनके लिए और भी फ़ायदे हैं और पीने की चीज़ें — तो क्या वे
शुक्र नहीं करते?
📌 दूध, ऊन, खाल — हर जानवर से फ़ायदा। शुक्र करो — यही ईमान का
रास्ता है।
आयत 74
وَاتَّخَذُوْا مِنْ دُوْنِ اللّٰهِ اٰلِهَةً لَّعَلَّهُمْ
يُنْصَرُوْنَ
और उन्होंने अल्लाह के सिवा (और) ख़ुदा बना लिए — शायद उनकी मदद की
जाए।
📌 इंसान की सबसे बड़ी भूल — नेमत देने वाले को छोड़कर दूसरों से मदद
माँगना।
आयत 75
لَا يَسْتَطِيْعُوْنَ نَصْرَهُمْ وَهُمْ لَهُمْ جُنْدٌ مُّحْضَرُوْنَ
वे उनकी मदद करने में सक्षम नहीं — और वे ख़ुद उनके लिए हाज़िर किए
गए लश्कर हैं।
📌 झूठे ख़ुदा — न मदद कर सकते हैं, न बचा सकते हैं। बल्कि क़यामत
में उनके पूजने वाले उनके साथ दोज़ख़ में होंगे।
आयत 76
فَلَا يَحْزُنْكَ قَوْلُهُمْ ۘ اِنَّا نَعْلَمُ مَا يُسِرُّوْنَ
وَمَا يُعْلِنُوْنَ
पस उनकी बातें आपको ग़मगीन न करें — बेशक हम जानते हैं जो वे छुपाते
हैं और जो ज़ाहिर करते हैं।
📌 नबी ﷺ को अल्लाह की तसल्ली — "ग़म न करें, हम सब जानते हैं।" यह
आयत हर मोमिन के लिए दिलासा है।
आयत 77
اَوَلَمْ يَرَ الْاِنْسَانُ اَنَّا خَلَقْنٰهُ مِنْ نُّطْفَةٍ
فَاِذَا هُوَ خَصِيْمٌ مُّبِيْنٌ
क्या इंसान ने नहीं देखा कि हमने उसे एक नुत्फ़े (वीर्य) से पैदा
किया — फिर वो खुला झगड़ालू बन गया।
📌 सातवाँ "مُبِيْن" — इंसान "खुला झगड़ालू।" जो एक बूँद पानी से
पैदा हुआ — वो अल्लाह से झगड़ता है!
आयत 78
وَضَرَبَ لَنَا مَثَلًا وَّنَسِيَ خَلْقَهٗ ۗ قَالَ مَنْ يُّحْيِ
الْعِظَامَ وَهِيَ رَمِيْمٌ
और उसने हमारे बारे में मिसाल बयान की और अपनी पैदाइश भूल गया — कहने
लगा: "इन हड्डियों को कौन ज़िंदा करेगा जबकि वे सड़-गल गई हों?"
📌 यह "उबय्य बिन ख़लफ़" का क़िस्सा है — वो एक सड़ी हड्डी लाया और
नबी ﷺ को चिढ़ाने लगा — "यह कैसे ज़िंदा होगी?" जवाब अगली आयत में।
आयत 79
قُلْ يُحْيِيْهَا الَّذِيْۤ اَنْشَاَهَاۤ اَوَّلَ مَرَّةٍ ۗ وَهُوَ
بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيْمٌ
कहो: "उन्हें वही ज़िंदा करेगा जिसने उन्हें पहली बार बनाया — और वो
हर मख़्लूक़ को जानता है।"
📌 सबसे मज़बूत दलील — "जिसने पहली बार बनाया, वो दोबारा बना सकता
है।" पहली बार बनाना ज़्यादा मुश्किल था।
आयत 80
الَّذِيْ جَعَلَ لَكُمْ مِّنَ الشَّجَرِ الْاَخْضَرِ نَارًا فَاِذَاۤ
اَنْتُمْ مِّنْهُ تُوْقِدُوْنَ
जिसने तुम्हारे लिए हरे दरख़्त से आग पैदा की — तो तुम उससे आग जलाते
हो।
📌 "हरे दरख़्त से आग" — अरब में "मार्ख़" और "अफ़ार" नाम के दो
दरख़्त थे जिनकी लकड़ियाँ रगड़ने से आग जलती थी। आज की
Photosynthesis भी यही है।
आयत 81
اَوَلَيْسَ الَّذِيْ خَلَقَ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضَ بِقٰدِرٍ عَلٰۤى
اَنْ يَّخْلُقَ مِثْلَهُمْ ۗ بَلٰى وَهُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيْمُ
और क्या वो जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया, उनके जैसा (दोबारा)
पैदा करने पर सक्षम नहीं? क्यों नहीं! और वो बहुत बनाने वाला,
जाननेवाला है।
📌 आख़िरी दलील — "जिसने आसमान-ज़मीन बनाए, वो इंसान को दोबारा नहीं
बना सकता?" — यह सवाल ही जवाब है।
⭐ आयत 82 — सबसे मशहूर आयत — كُنْ فَيَكُوْنُ
اِنَّمَاۤ اَمْرُهٗۤ اِذَاۤ اَرَادَ شَيْـًٔا اَنْ يَّقُوْلَ لَهٗ
كُنْ فَيَكُوْنُ
उसका (अल्लाह का) हुक्म बस यही है — जब वो किसी चीज़ का इरादा करे तो
फ़रमाए:
"كُنْ" (हो जा) — تो "فَيَكُوْنُ" (हो जाती है)।"
📌 यह क़ुरआन की सबसे ताक़तवर आयतों में से एक है। "कुन फ़यकून" —
अल्लाह के लिए कुछ भी असंभव नहीं। बीमारी, तंगी, मुश्किल — सब "कुन"
से ख़त्म हो सकते हैं। यही वह आयत है जो मोमिन का दिल मज़बूत करती
है।
आयत 83
فَسُبْحٰنَ الَّذِيْ بِيَدِهٖ مَلَكُوْتُ كُلِّ شَيْءٍ وَّاِلَيْهِ
تُرْجَعُوْنَ
पस पाक है वो जिसके हाथ में हर चीज़ की सलतनत है — और उसी की तरफ़
तुम लौटाए जाओगे।
📌 सूरह का ख़ात्मा — "सब कुछ अल्लाह के हाथ में है" — और हम सब उसी
की तरफ़ लौटेंगे। यह हर इंसान की आख़िरी मंज़िल है।
— ختمِ سورۃ یٰسٓ —
✅ سورۃ یٰسٓ مُکمَّل
اَللّٰهُمَّ اجْعَلْنَا
مِنَ الَّذِيْنَ يَتْلُوْنَهَا وَيَعْمَلُوْنَ بِهَا — آمِيْن
ऐ अल्लाह! हमें उनमें से बना जो इसे पढ़ें और इस पर अमल करें —
आमीन
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