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Muharram Me Ashura Ka Roza Kyun Aur Kaise Rakhein: Ek Simple Guide

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही हमारे मन में कई तरह के सवाल आते हैं। यह इस्लामी साल का पहला महीना है। इस महीने का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। कई लोग इस महीने को सिर्फ गम या मातम का महीना मानते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि मुहर्रम में रोज़ा रखने की भी एक खास अहमियत है? आज हम इस लेख में मुहर्रम के 10वें दिन यानी आशुरा के रोज़े के बारे में पूरी बात करेंगे। हम जानेंगे कि यह रोज़ा क्यों रखा जाता है और इसके साथ ही हम इसके सही तरीके को भी समझेंगे।

Muharram Me Ashura Ka Roza Kyun Aur Kaise Rakhein: Ek Simple Guide

बहुत से लोग मुहर्रम के इतिहास को पूरी तरह नहीं जानते हैं। वे सोचते हैं कि यह महीना केवल एक दुखद घटना से जुड़ा है। बेशक कर्बला की घटना इस्लाम के इतिहास की एक बहुत बड़ी और दर्दनाक घटना है। लेकिन मुहर्रम का इतिहास इससे भी पुराना है। अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद साहब ने इस महीने में रोज़ा रखने की बहुत ताकीद की है। अगर आप इस्लाम के बारे में और गहराई से जानना चाहते हैं, तो आप इस्लामिक ज्ञान और सीख के लिए हमारी वेबसाइट पर जा सकते हैं। वहां आपको कई तरह की जानकारियां मिलेंगी जो आपके ज्ञान को बढ़ाएंगी।

इस लेख को लिखने का मेरा मकसद यही है कि आपको मुहर्रम और आशुरा के रोज़े के बारे में सब कुछ आसान शब्दों में समझ आ जाए। हम किसी मुश्किल भाषा का इस्तेमाल नहीं करेंगे। हम सीधे और सरल तरीके से बात करेंगे। आइए, इस खास महीने की अहमियत को करीब से समझते हैं।

मुहर्रम क्या है और इसका क्या महत्व है?

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है। इसका मतलब है कि इसी महीने से नए इस्लामी साल की शुरुआत होती है। इस्लाम में चार महीनों को बहुत ही पाक और आदरणीय माना गया है। मुहर्रम भी उन्हीं चार पवित्र महीनों में से एक है। इन महीनों को अरबी में अशहुरुल हुरुम कहा जाता है। इन पवित्र महीनों में लड़ाई-झगड़ा करना सख्त मना होता है। अल्लाह ने इन महीनों को शांति और इबादत के लिए चुना है।

इस महीने का नाम मुहर्रम खुद इस बात का गवाह है कि यह कितना आदरणीय है। मुहर्रम शब्द का अर्थ होता है हराम किया गया या सम्मानित। इसका मतलब यह है कि इस महीने में बुरे कामों से बचना और भी ज्यादा ज़रूरी हो जाता है। हमें अपने गुस्से पर काबू रखना चाहिए। हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए। इस महीने में की गई इबादत का सवाब भी बहुत ज्यादा मिलता है।

कई लोग सोचते हैं कि मुहर्रम कोई त्योहार है। नहीं, मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है। यह एक ऐसा महीना है जो हमें सब्र, बलिदान और अल्लाह की राह पर चलने की याद दिलाता है। इस महीने में हमें अपने पिछले साल के गुनाहों की माफ़ी मांगनी चाहिए। हमें नए साल की शुरुआत अच्छे कामों से करनी चाहिए। यही इस महीने का असली संदेश है।

इस महीने के पहले दस दिन बहुत ही खास होते हैं। इन दिनों में लोग अल्लाह की इबादत में वक्त बिताते हैं। बहुत से लोग इन दिनों में रोज़े भी रखते हैं। इन दस दिनों में से 10वां दिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी 10वें दिन को आशुरा कहा जाता है। आइए अब हम आशुरा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

आशुरा का दिन क्या है और यह क्यों खास है?

आशुरा शब्द अरबी के अशरा से बना है जिसका मतलब दस होता है। मुहर्रम के 10वें दिन को ही यौम-ए-आशुरा या सिर्फ आशुरा कहा जाता है। यह दिन इस्लामी इतिहास में बहुत ही ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन कई बड़ी और ऐतिहासिक घटनाएं घटी हैं। यही वजह है कि इस दिन का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

सबसे पहली और बड़ी घटना हज़रत मूसा (अलैहिस सलाम) से जुड़ी है। सदियों पहले इसी दिन अल्लाह ने हज़रत मूसा और उनकी कौम यानी बनी इसराइल को फिरौन के ज़ुल्म से बचाया था। फिरौन एक बहुत ही क्रूर राजा था। वह खुद को भगवान कहता था। उसने हज़रत मूसा और उनकी कौम पर बहुत अत्याचार किए थे। अल्लाह के हुक्म से नील नदी में रास्ता बना और हज़रत मूसा अपनी कौम के साथ नदी पार कर गए। वहीं फिरौन और उसकी सेना उसी नदी में डूब कर मर गई।

इस महान जीत और आज़ादी के लिए हज़रत मूसा ने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने इस दिन रोज़ा रखकर अल्लाह का आभार जताया। जब हमारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना आए, तो उन्होंने देखा कि वहां के यहूदी भी इस दिन रोज़ा रखते थे। जब उन्होंने इसका कारण पूछा, तो यहूदियों ने बताया कि वे हज़रत मूसा की जीत की खुशी में रोज़ा रखते हैं।

हमारे प्यारे नबी ने तब फरमाया कि हज़रत मूसा पर हमारा हक यहूदियों से ज्यादा है। इसलिए उन्होंने खुद भी रोज़ा रखा और अपने साथियों को भी रोज़ा रखने का हुक्म दिया। इस तरह आशुरा का रोज़ा हमारी सुन्नत का हिस्सा बन गया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच की हमेशा जीत होती है और ज़ुल्म का अंत निश्चित है।

कुछ इस्लामी विद्वानों का यह भी मानना है कि इसी दिन हज़रत नूह (अलैहिस सलाम) की कश्ती भी तूफान से बचकर जूदी पहाड़ पर रुकी थी। यह इस बात का प्रतीक है कि जब पूरी दुनिया पानी में डूब रही थी, तब अल्लाह ने ईमान वालों को बचाया। इस तरह यह दिन सिर्फ एक घटना से नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से दी गई कई सफलताओं से जुड़ा हुआ है। यह दिन हमें सिखाता है कि अल्लाह की ताकत सबसे बड़ी है।

इसके अलावा आशुरा के दिन ही कर्बला का ऐतिहासिक वाकया भी हुआ था। हज़रत इमाम हुसैन जो हमारे नबी के प्यारे नवासे थे, उन्होंने यज़ीद के ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। उन्होंने इस्लाम की रक्षा के लिए अपने परिवार और साथियों के साथ अपनी जान कुर्बान कर दी थी। यह शहादत भी मुहर्रम की 10 तारीख को ही हुई थी। इसलिए यह दिन हमारे दिल में सब्र और वफादारी की भावना को भी जगाता है।

आशुरा का रोज़ा रखने के फायदे और नियम क्या हैं?

अब बात करते हैं कि इस दिन रोज़ा रखने का क्या सवाब मिलता है। हदीस में आता है कि आशुरा का रोज़ा रखने से पिछले एक साल के छोटे गुनाह माफ़ हो जाते हैं। सोचिए, सिर्फ एक दिन का रोज़ा रखने से हमारे पूरे साल के गुनाह धुल जाते हैं। यह अल्लाह की तरफ से हमारे लिए एक बहुत बड़ा तोहफा है। हमें इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।

लेकिन इस रोज़े को रखने का एक खास नियम है। हमारे नबी ने फरमाया था कि हमें यहूदियों से अलग तरीका अपनाना चाहिए। यहूदी सिर्फ 10 तारीख को रोज़ा रखते थे। इसलिए नबी करीम ने हुक्म दिया कि हम आशुरा के रोज़े के साथ एक और रोज़ा जोड़ें। यानी हमें या तो 9 और 10 मुहर्रम को रोज़ा रखना चाहिए या फिर 10 और 11 मुहर्रम को रोज़ा रखना चाहिए।

इस नियम के पीछे का मकसद यही है कि हमारी इबादत का तरीका दूसरों से अलग और खास हो। अगर कोई व्यक्ति किसी वजह से दो रोज़े नहीं रख पाता है, तो वह केवल 10 तारीख का रोज़ा भी रख सकता है। लेकिन बेहतर यही है कि आप दो रोज़े रखें। यह सुन्नत के ज्यादा करीब है और इससे सवाब भी ज्यादा मिलता है।

आशुरा के रोज़े की नीयत भी बहुत साफ़ होनी चाहिए। आपको केवल अल्लाह की रज़ा के लिए यह रोज़ा रखना है। सहरी और इफ्तार का समय वही होगा जो आम रोज़ों का होता है। सुबह सादिक से लेकर सूरज डूबने तक आपको खाने-पीने से बचना होगा। इसके साथ ही आपको अपनी जुबान और आंखों की भी हिफाज़त करनी होगी। तभी इस रोज़े का असली फायदा आपको मिल पाएगा।

मुहर्रम के दौरान लोग क्या गलतियां करते हैं?

हमारे समाज में मुहर्रम को लेकर कई तरह की गलतफहमियां फैल गई हैं। बहुत से लोग इस महीने को मनहूस मानने लगते हैं। वे सोचते हैं कि इस महीने में कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि इस महीने में शादी-ब्याह करना गलत है। यह सब केवल मनगढ़ंत बातें हैं। इस्लाम में कोई भी दिन या महीना मनहूस नहीं होता है। अल्लाह ने सभी दिनों को खूबसूरत बनाया है।

दूसरी बड़ी गलती यह है कि लोग इस महीने में केवल रोने-धोने और मातम करने को ही सब कुछ मान लेते हैं। कर्बला का वाकया हमें सब्र और बहादुरी सिखाता है। रोना और दुख होना एक स्वाभाविक मानवीय भावना है। लेकिन अपनी छाती पीटना, खुद को चोट पहुंचाना या इस्लाम के खिलाफ बातें करना सही नहीं है। हमारे नबी ने मातम करने और ज़ोर-ज़ोर से रोने से मना किया है।

तीसरी गलती यह है कि लोग इस महीने में तरह-तरह के नए रीति-रिवाज शुरू कर देते हैं। जैसे ताज़िया बनाना और उसके सामने मन्नतें मांगना। इस्लाम में केवल अल्लाह से ही मन्नत मांगी जा सकती है। किसी भी कब्र या ताज़िये के सामने झुकना या उससे मदद मांगना शिर्क के दायरे में आ सकता है। हमें इन सब बातों से बचना चाहिए और अपनी इबादत को शुद्ध रखना चाहिए।

जिस तरह मुहर्रम हमें सही रास्ते पर चलने की सीख देता है, उसी तरह हमारे लिए अपनी कमाई को भी पाक रखना ज़रूरी है। अगर आप हलाल तरीके से पैसे कमाने और निवेश करने के बारे में जानना चाहते हैं, तो हमारा लेख Islamic Finance: Halal Share Market Me Invest Kaise Karein ज़रूर पढ़ें। यह आपको अपनी आर्थिक जिंदगी को भी सही रास्ते पर लाने में मदद करेगा।

मुहर्रम को सही तरीके से कैसे मनाएं?

तो फिर सवाल उठता है कि हमें मुहर्रम को सही तरीके से कैसे बिताना चाहिए? इसका जवाब बहुत ही सरल है। हमें इस महीने में ज्यादा से ज्यादा इबादत करनी चाहिए। हमें पांचों वक्त की नमाज़ पाबंदी से पढ़नी चाहिए। कुरान की तिलावत करनी चाहिए। अपने गुनाहों की माफ़ी मांगनी चाहिए। यह महीना खुद को सुधारने का एक बेहतरीन मौका है।

इसके साथ ही हमें आशुरा का रोज़ा ज़रूर रखना चाहिए। जैसा कि मैंने पहले बताया, आप 9 और 10 तारीख का रोज़ा रख सकते हैं। अपने परिवार के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करें। बच्चों को मुहर्रम और आशुरा का इतिहास बताएं। उन्हें बताएं कि हज़रत मूसा को कैसे जीत मिली थी। उन्हें हज़रत इमाम हुसैन की बहादुरी और सब्र की कहानी सुनाएं। इससे उनका ईमान मज़बूत होगा।

इस महीने में दान-पुण्य यानी सदका करना भी बहुत अच्छा माना जाता है। गरीबों को खाना खिलाएं। ज़रूरतमंदों की मदद करें। अपने पड़ोसियों का ख्याल रखें। इमाम हुसैन और उनके साथियों को प्यासा शहीद किया गया था। इसलिए इस महीने में लोगों को पानी पिलाना, सबील लगाना बहुत ही सवाब का काम है। लेकिन ध्यान रहे कि इसमें कोई दिखावा न हो।

अपने घर में शांति का माहौल बनाए रखें। लड़ाई-झगड़ों से दूर रहें। किसी का दिल न दुखाएं। याद रखें कि मुहर्रम का महीना हमें खुद को बदलने का संदेश देता है। अगर हम इस महीने में खुद को बेहतर इंसान नहीं बना पाए, तो हमारा रोज़ा और इबादत केवल एक रस्म बनकर रह जाएंगे। इसलिए दिल से अल्लाह की तरफ लौटें।

इस महीने में अपने परिवार के साथ बैठकर दीन की बातें करें। अक्सर हमारे घरों में बच्चे बाहरी दुनिया की बातों में उलझे रहते हैं। मुहर्रम का समय उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने का सबसे अच्छा समय है। उन्हें बताएं कि इस्लाम शांति और भाईचारे का संदेश देता है। किसी भी तरह की नफरत या हिंसा का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है।

यदि संभव हो, तो इस महीने में कुछ समय निकालकर दीन की किताबें पढ़ें। आप हमारे नबी की जीवनी या सहाबा के जीवन की कहानियां पढ़ सकते हैं। इससे आपको अपने जीवन के फैसले लेने में मदद मिलेगी। जब हम अच्छे लोगों के बारे में पढ़ते हैं, तो हमारे अंदर भी वैसा बनने की इच्छा जागती है।

आशुरा के रोज़े के बारे में कुछ ज़रूरी सवाल और जवाब

बहुत से लोगों के मन में आशुरा के रोज़े को लेकर कुछ छोटे-छोटे सवाल होते हैं। आइए हम यहां कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब आसान शब्दों में देने की कोशिश करते हैं। इससे आपके मन की सारी उलझनें दूर हो जाएंगी।

Muharram Me Ashura Ka Roza Kyun Aur Kaise Rakhein: Ek Simple Guide

क्या कज़ा रोज़ा होने पर भी आशुरा का रोज़ा रख सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल रख सकते हैं। अगर आपके रमज़ान के कुछ रोज़े छूट गए थे और आपने अभी तक उनकी कज़ा नहीं की है, तो भी आप आशुरा का नफ़्ल रोज़ा रख सकते हैं। हालांकि बेहतर यही होता है कि पहले फ़र्ज़ रोज़ों की कज़ा की जाए। लेकिन आशुरा का दिन साल में एक ही बार आता है। इसलिए आप इस दिन का रोज़ा रख सकते हैं और कज़ा रोज़े बाद में भी पूरे कर सकते हैं।

क्या केवल 10 मुहर्रम का एक ही रोज़ा रखना सही है?

जैसा कि मैंने ऊपर बताया, हमारे नबी ने यहूदियों से अलग दिखने के लिए दो रोज़े रखने की सलाह दी थी। इसलिए दो रोज़े रखना सुन्नत है। लेकिन अगर कोई बीमार है या किसी मज़बूरी की वजह से दो रोज़े नहीं रख सकता, तो वह केवल एक रोज़ा भी रख सकता है। उसका रोज़ा भी कबूल होगा और उसे सवाब मिलेगा। अल्लाह हमारी नीयत देखता है और हमारी मज़बूरी को समझता है।

क्या आशुरा के दिन घर में विशेष खाना बनाना ज़रूरी है?

हमारे देश में आशुरा के दिन खिचड़ा या हलीम बनाने का बहुत रिवाज़ है। लोग सोचते हैं कि इस दिन यह खाना बनाना ज़रूरी है। सच तो यह है कि इस्लाम में ऐसा कोई नियम नहीं है। आप अपनी पसंद का कोई भी सादा खाना बना सकते हैं। हाँ, इस दिन अपने परिवार के लिए अच्छा खाना बनाना और उन पर दिल खोलकर खर्च करना एक अच्छी बात मानी गई है। लेकिन इसे कोई धार्मिक फर्ज नहीं समझना चाहिए।

क्या इस दिन सफर करना मना है?

कुछ लोग सोचते हैं कि मुहर्रम या आशुरा के दिन सफर करने से कोई नुकसान हो सकता है। यह केवल एक अंधविश्वास है। आप इस दिन भी वैसे ही सफर कर सकते हैं जैसे किसी और दिन करते हैं। इस्लाम हमें किसी भी दिन को बुरा या अशुभ मानने की इजाज़त नहीं देता है। अल्लाह पर भरोसा रखें और अपने काम पूरे करें।

आशुरा के दिन की दुआएं और इबादत का सही तरीका

आशुरा के दिन हमें सुबह से ही अपने समय का सही इस्तेमाल करना चाहिए। रोज़ा रखने के साथ-साथ हमें अपनी ज़ुबान को अल्लाह के ज़िक्र में लगाए रखना चाहिए। इस दिन किसी की बुराई या गीबत करने से बचें। अपने घर में शांत माहौल रखें ताकि आप शांति से इबादत कर सकें।

इस दिन कसरत से अस्तग़फ़ार पढ़ना चाहिए। अस्तग़फ़ार का मतलब है अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगना। हम जाने-अनजाने में हर दिन कई गलतियां करते हैं। यह दिन उन गलतियों को सुधारने और अल्लाह के करीब आने का एक बेहतरीन जरिया है। आप अस्तग़फ़िरुल्लाह का कसरत से जाप कर सकते हैं।

इसके साथ ही हमारे प्यारे नबी पर दरूद शरीफ भेजना भी इस दिन बहुत फलदायी होता है। दरूद शरीफ पढ़ने से हमारे दिलों को सुकून मिलता है और हमारी दुआएं जल्दी कबूल होती हैं। अपने बच्चों को भी साथ बैठाएं और उन्हें दरूद शरीफ पढ़ने की आदत डालें।

इस दिन कुरान शरीफ की तिलावत करना भी बहुत ज़रूरी है। अगर आप पूरा कुरान नहीं पढ़ सकते, तो कम से कम सूरह इखलास और सूरह यासीन जैसी खास सूरतों की तिलावत करें। कुरान के अनुवाद को समझकर पढ़ने की कोशिश करें। इससे आपको अल्लाह के संदेश को समझने में मदद मिलेगी।

कर्बला की सीख और हमारा आज का जीवन

मुहर्रम के ज़िक्र के बिना कर्बला की कहानी अधूरी है। लेकिन हमें इस कहानी को सिर्फ रोने के लिए नहीं सुनना चाहिए। हमें इससे सीख लेनी चाहिए। इमाम हुसैन ने हमें सिखाया कि जब बात हक और इंसाफ की हो, तो कभी भी पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे सामने कितनी भी बड़ी ताकत क्यों न खड़ी हो।

आज हमारे समाज में कई तरह की बुराइयां फैल चुकी हैं। झूठ बोलना, धोखा देना, किसी का हक मारना बहुत आम बात हो गई है। ऐसे समय में इमाम हुसैन का चरित्र हमें याद दिलाता है कि हमें हमेशा ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहिए। अपनी छोटी-छोटी स्वार्थ की चीजों के लिए अपने ईमान का सौदा नहीं करना चाहिए।

इमाम हुसैन ने आखिरी वक्त में भी नमाज़ नहीं छोड़ी। यह हमें सिखाता है कि नमाज़ हमारे जीवन का सबसे ज़रूरी हिस्सा होनी चाहिए। हम चाहे कितने भी व्यस्त हों, हमें अल्लाह की इबादत के लिए समय निकालना ही चाहिए। अगर हम खुद को उनका मानने वाला कहते हैं, तो हमें उनके बताए रास्ते पर भी चलना होगा।

इसलिए इस मुहर्रम में केवल उदास होने के बजाय अपने अंदर एक बदलाव लाने की कोशिश करें। अपनी pfांच वक्त की नमाज़ों को पाबंदी से पढ़ना शुरू करें। अपने माता-पिता की सेवा करें। दूसरों के काम आएं। यही इमाम हुसैन को हमारी तरफ से सबसे अच्छा नजराना होगा।

एक आखिरी सोच जो हमें बदल सकती है

मुहर्रम का यह पवित्र महीना हमें केवल इतिहास याद दिलाने के लिए नहीं आता। यह हमें अपने आज को सुधारने का मौका देता है। हज़रत इमाम हुसैन ने जो कुर्बानी दी, वह हमें सिखाती है कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यों न हो, हमें सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। हज़रत मूसा की कहानी हमें सिखाती है कि अल्लाह हमेशा अपने बंदों की मदद करता है, बस हमारा यकीन पक्का होना चाहिए।

इस मुहर्रम में आइए हम सब मिलकर एक वादा करें। हम केवल दिखावे के कामों से दूर रहेंगे। हम आशुरा का रोज़ा रखेंगे और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगेंगे। हम अपने जीवन में सच्चाई और सब्र को अपनाएंगे। अपने आसपास के लोगों के साथ प्यार और नरमी से पेश आएंगे। यही मुहर्रम का असली मकसद है।

मुझे उम्मीद है कि इस लेख से आपको मुहर्रम और आशुरा के रोज़े के बारे में सही और आसान जानकारी मिली होगी। इस जानकारी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी साझा करें ताकि वे भी इसका फायदा उठा सकें। अल्लाह हम सभी को सही रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

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