हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश
हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की पैदाइश रिवायत करने वाले बयान करते हैं कि जब अपनी ख़िलाफ़त (नायबी) के लिए अल्लाह का इरादा हुआ कि-
इन्नी जाअिलुन फ़िल अर्ज़ि ख़लीफ़ा.
मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूं।
तब हज़रत इज़राईल को हुक्म हुआ कि हर क़िस्म की लाल सफ़ेद और काली एक मुट्ठी रंगा-रंग मिट्टी जमा करके लाये और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ मक्का और तायफ़ के दर्मियान रखी गई। अल्लाह ने उस मिट्टी पर अपनी रहमत की बारिश की और उसी मिट्टी के ख़मीर से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का पुतला तैयार किया। 40 वर्ष तक वह पुतला बेजान पड़ा रहा।
जब अल्लाह ने चाहा कि हज़रत आदम (अलै.) का सितारा रौशन हो और आदम की औलाद (इंसान) का दर्जा पूरी दुनिया में बुलंद हो, तो रूह को हुक्म हुआ कि आदम के जिस्म में उतर। उस नर्म रूह ने सख़्त मिट्टी में जाने से इन्कार किया।
रब का हुक्म रूह को पहुँचा कि ऐ जान ! इस बदन में दाख़िल हो। फिर जब रूह आदम के सिर की तरफ़ से दाख़िल हुई तो जिस-जिस जगह पहुँचती जाती, पत्थर बना जिस्म मांस-हड्डी में बदलता चला गया। जब सीने तक पहुँची तो हज़रत आदम ने उठने का इरादा किया, वहीं ज़मीन पर गिर पड़े।
शायद इसी लिए कुरआन मजीद में फ़रमाया गया है
कि इंसान बड़ा जल्दबाज़ है। उसी हालत में हज़रत आदम ने छींका, अल्लाह की ओर से, इल्हाम हुआ और कहा ‘अल्हम्दु लिल्लाह' (तमाम तारीफें अल्लाह की हैं)।
उस करीम-रहीम ने अपनी रहमत से फ़रमाया 'यर्हमुकल्लाह (अल्लाह आप पर रहमत फ़रमाये)। यह अल्लाह की रहमत का पहला जल्वा था।
इसके बाद अल्लाह के हुक्म से एक फ़रिश्ता बहिश्त से सजा सजाया जोड़ा लाया, हज़रत को पहनाया और इज़्ज़त के साथ तख़्त पर बिठाया,
नक़ल है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की पैदाइश के वक़्त फ़रिश्ते आपस में कहते थे कि अल्लाह ख़ाक से पैदा कर के जिस हस्ती को ख़िलाफ़त की गद्दी पर बिठायेगा, तो वह ख़ुदा के नज़दीक हमसे ज़्यादा अज़ीज़ न होगा और गैब के जानने वाले के दरबार में हम जो दिन-रात रहते हैं, हमें उम्मीद है कि हमारा इल्म उससे ज़्यादा होगा।
फिर हक़ तआला ने तमाम चीज़ों के नाम हज़रत आदम को सिखला दिये। फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि अगर तुम सच्चे हो तो इन चीज़ों के नाम बताओ। फ़रिश्ते जवाब न दे सके। अपनी ग़लती मानते हुए बोले, पाक है तू, हम तो सिर्फ उतना ही जानते हैं, जितना तूने सिखाया, और तुझसे बढ़कर जानने वाला कौन है!
तब अल्लाह तआला ने आदम को ज़ाहिरी और बातिनी कमाल से आरास्ता (सुसज्जित) किया और उसकी इज़्ज़त को बढ़ाने के लिए फ़रिश्तों को, जो हज़रत आदम (अलै.) के तख़्त के चारों तरफ़ लाइनों में अदब के साथ खड़े थे, हुक्म दिया कि आदम को सज्दा करो। तमाम फ़रिश्तों ने हज़रत आदम को सज्दा किया, मगर इब्लीस ने इंकार कर दिया और बोला कि मैं आदम से बेहतर हूँ, इसलिए कि मुझे आग से और आदम को मिट्टी से पैदा किया गया है। इब्लीस के इस इंकार से उस पर फिटकार पड़ी और उसे फ़रिश्तों के साथ से अलग कर दिया गया। हज़रत आदम बहिश्त में रहने लगे।
तबीयत में आया कि कोई उनका साथी हो, जिंदगी का साथी । हज़रत पर ख़्वाब ने ग़लबा किया। इसी बीच अल्लाह ने अपनी कुदरत से आदम (अलै.) के पहलू से हज़रत हव्वा को पैदा कर दिया। जब वह जागे तो देखा कि एक पाक-साफ़ औरत बैठी है, बहुत खुश हुए। पूछा कि तू कौन है ? हज़रत हव्वा ने कहा कि मैं तेरे बदन का हिस्सा हूँ। अल्लाह तआला ने तेरी पसली से मुझे पैदा किया है कहा जाता है कि हज़रत हव्वा बहुत ही खूबसूरत थीं हज़रत की ख़ुशी का ठिकाना न था। हज़रत हव्वा को पाकर सज्द-ए-शुक्र अदा किया।
अल्लाह तआला की तरफ़ से अर्श के उठाने वाले और आसमानी फ़रिश्तों के सामने इन दोनों का निकाह हुआ, फिर इन दोनों को हुक्म हुआ कि तुम सब इसी बहिश्त में रहो, जो चाहो खाओ, मगर उस पेड़ के नज़दीक मत जाना । इशारा गेहूँ के पौधे की तरफ़ था।
इब्लीस ने आदम को सज्दा नहीं किया था और वह निकाल दिया गया था, इसलिए उसे हज़रत आदम से ख़ास तौर से जलन हो गयी थी। वह हमेशा ऐसे उपाय सोचता कि किसी तरह आदम को बहिश्त से निकाले। इसके लिए पहले वह मोर के पास गया, उससे दोस्ती की और कहा, मेरी दोस्ती के हक़ तुझ पर साबित हैं, हम-तुम एक मकान में रहते भी थे, मेरी दर्खास्त तुमसे यह है कि मुझे अपने बाजू पर बिठाकर बहिश्त में पहुँचा दो ताकि मैं अपने दुश्मन से बदला ले सकूँ। मोर ने इस काम के करने से इंकार कर दिया और कहा कि तू यह बात सांप से कह। तब शैतान साँप के पास गया और उसको अपने जाल में फँसा ही लिया। सांप उसको मुंह में रखकर बहिश्त में ले गया। फिर हज़रत आदम और हव्वा के पास गया और रोना शुरू कर दिया।
पूछा, क्यों रोता है ? उन्होंने शैतान को पहचाना नहीं था शैतान ने कहा, मैं तुमको नसीहत करता हूँ, मुझको तो तुम्हारे हाल पर रोना आता है कि तुम इस बहिश्त से निकाले जाओगे और ये बहिश्त की नेमतें तुमसे सब की सब ले ली जायेंगी और जिंदगी की लज़्ज़त के बजाय मौत के दर्द का मज़ा चखोगे। दोनों ने शैतान की जब ये बातें सुनीं तो बड़ा ग़म हुआ। इब्लीस ने कहा, अगर तुम मेरा कहना मानो तो तुम को एक पेड़ बताऊँ, अगर थोड़ा फल उसका खाओगे तो हमेशा जिंदा रहोगे और मौत की शक्ल कभी न देखोगे।
हज़रत आदम ने पूछा, वह कौन-सा है ? शैतान ने कहा, वही पेड़ है जिसके खाने से अल्लाह तआला ने मना किया है। हज़रत आदम ने इस बात को क़बूल नहीं किया कि मैं ख़ुदा की कभी नाफ़रमानी न करूंगा। जब शैतान ने क़सम खाई कि मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ, तो भी वह इस नाफ़रमानी के लिए तैयार न हुए और उठकर चले गये।
फिर शैतान ने हज़रत हव्वा की ख़िदमत में जाकर इस तरह उनके दिल में भी वसवसे डाले और सांप ने शैतान के कहने पर गवाही दी। हज़रत हव्वा ने हज़रत आदम से फ़रमाया कि सांप तो बहिश्त का ख़ादिम है और वह शैतान के हक़ में गवाही दे रहा है, तो मैं पहले इस पेड़ का फल खाती हूँ अगर कोई बात पड़े तो मेरे वास्ते ख़ुदा से माफ़ी मांग लेना और नहीं तो तुम भी खाओ कि हम तुम दोनों तमाम उम्र बहिश्त की नेमतों को चैन से खाया करें।
जन्नत से निकाले गये
कहा जाता है कि अल्लाह ने शुरू ही में तै कर दिया था कि आदम की फ़र्माबरदार औलाद बहिश्त में और नाफ़रमान औलाद दोज़ख़ में जाएगी, अगर सबको जन्नत ही में रखना होता तो दोज़ख़ कैसे भरी जाती और आमाल का हिसाब-किताब ही क्यों होता। गेहूँ का पौधा भी इसी आज़माइश के लिए रखा गया था, जो उनके बहिश्त के निकाले जाने की वजह बना। उलमा ने लिखा है कि जब हज़रत हव्वा ने थोड़े से गेहूँ के फल खा लिए और उनके कहने से हज़रत आदम ने भी कुछ खा लिए तो अभी तक हज़रत आदम के मेदे में गेहूँ पूरी तरह हज़म भी नहीं हुआ था कि बहिश्त का लिबास जिस्म से गिर पड़ा, जिस्म नंगा हो गया। मजबूर होकर इंजीर के पत्तों से जल्दी-जल्दी जिस्म ढांका।
हुक्म हुआ कि ऐ आदम ! तेरे नंगे होने की वजह क्या है ? कहाँ, अल्लाह ! इसकी वजह यह है कि तेरी मर्जी पर अमल न किया, उस मना किये हुए पेड़ का फल खा लिया। फिर आदम ने यह भी अर्ज़ किया कि यह ग़लती सांप और मोर के बहकाने और क़सम खाने से हुई है, जबकि ये बहिश्त के अमीन और रखवाले हैं। कहा जाता है कि उस वक़्त सांप शक्ल व सूरत के एतिबार से बहुत ही खुबसूरत था, इस जैसा बहिश्त में कोई जानवर भी न था अल्लाह तआला ने इस गुनाह की वजह से उसका चेहरा बिगाड़ दिया। मिट्टी-धूल को उसका खाना बना दिया और पेट-सीने के बल ज़मीन को रगड़ना और छाती को छीलना मुक़द्दर हो गया। इसी जुर्म के अज़ाब के तौर पर हज़रत हव्वा और उनकी बेटियों को जनने का दर्द दिया, हैज़ (माहवारी) की गंदगी दी और ख़ाविंदों के हुक्म में रहना और उनकी ताबेदारी करना तै कर दिया।
मोर को भी सज़ा मिली, उसकी भी शक्ल बदल गयी, चुनांचे पांव तो बद-सूरती के लिए मशहूर ही है। फिर हुक्म हुआ कि सबके सब बहिश्त से निकलो और ज़मीन पर उतरो और आपस में एक-दूसरे के दुश्मन बने रहो। इस तरह आदम, हव्वा, शैतान, सांप और मोर, सभी जन्नत से ज़मीन पर ज़िल्लत और रुसवाई के साथ पहुंचे और सज़ा के तौर पर सब-के-सब अलग रखे गये। रिवायत में है कि हज़रत आदम सरानदीप में, हज़रत हव्वा जद्दा में, शैतान सीसतान में, सांप अस्फ़हान में और मोर काबुल में उतारा गया। इसी तरह इब्लीस और आदम की औलाद में हमेशा-हमेशा के लिए दुश्मनी पैदा हो गयी और क़ियामत तक रहेगी।
इस वाक़िया के बाद हज़रत आदम ने चालीस दिन तक न खाना खाया, न पानी पिया, हज़रत हव्वा की जुदाई से तड़पते रहे। तीन सौ वर्ष तक रोते रहे और तौबा व इस्तिफ़ार करते रहे। फिर सबसे बड़े रहीम अल्लाह ने अपनी मेहरबानी से हज़रत आदम के दिल में ये कुछ कलिमे उतारे-
रब्बना ज़लम्ना अन्फु-स-न व इल्लम तरिफ़र लना व तहम्ना ल-न कूनन्न मिनल् ख़ासिरीन.
ला इला-ह इल्ला अन्त सुब्हान- क व बिहम्दि-क अमिलतु सूअन व जलम्तु नम्सी फ़रिफ़रली।
“ऐ हमारे रब ! हमने अपने आप पर जुल्म किया है और अगर तूने
बख़्शा नहीं और रहम न किया तो हम ज़रूर ही घाटा उठानेवालों
में हो जायेंगे। तेरे अलावा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तू पाक है
हर ग़लती से, और तेरी हर पहलू से तारीफ़ है। मैं ने एक ख़ता की
और मैंने अपने आप पर जुल्म किया, तो तू मुझे माफ़ कर दे।"
इन कलिमों के पढ़ने के बाद हज़रत जिबील आये और गुनाह की माफ़ी की ख़ुशख़बरी लाये। हज़रत आदम बहुत खुश हुए। इस ख़ुशी में, अल्लाह का इशारा पाकर, उन्होंने चांद की तरह-चौदह-पन्द्रह तारीखों के रोज़े रखे। इन रोज़ों से उनके क़ल्ब को इत्मीनान हुआ और जिस्म को राहत मिली। इस दुआ और रोज़ों की इसी बरकत की वजह से कहा जाता है कि आदम की औलाद में से जो भी इस दुआ को पढ़ेगा और इन तीन रोज़ों की हर महीने में आदत रखेगा, उसके गुनाह माफ़ हो जायेंगे और उसका दिल जो गुनाहों की मुसीबत में स्याह हो रहा है, साफ़ और रौशन हो जाएगा।
इसके बाद हज़रत आदम को हुक्म हुआ कि ख़ान-ए-काबा की बुनियाद रखें। हज़रत आदम ने जिबील की तालीम से और फ़रिश्तों की मदद से काबे की बुनियाद रखी और हजरे अस्वद को, जिसे वह अपने साथ बहिश्त से लाये थे और उसमें अहदनामा और क़ौल व क़रार रोज़े अलस्ते ( इन्सानी रूहों को पैदा करके शुरू में अल्लाह ने अपने हाकिम व परवरदिगार होने को मनवाया था और फ़रमांबरदारी का वचन लिया था, इसी को क़ौल व क़रार रोज़े अलस्त कहते हैं। ) का ख़ुदा ने रखा था, काबे में एक तरफ़ जमाया। काबा तैयार होने के बाद हज़रत जिबरील ने हज और तवाफ़ के तरीके बताये।
हज़रत आदम इन सबसे छुट्टी पाकर हज़रत जिबील के कहने से अरफ़ात पहाड़ पर चढ़े। हज़रत हव्वा भी हज़रत आदम के लिए परेशान थीं, घूमती-फिरती वह अरफ़ात पहुँच गयी थीं। धूप और गर्मी से उनका रंग भी बदल गया था। दोनों एक-दूसरे को न पहचान सके। हज़रत जिबील ने एक-दूसरे को पहचनवाया। दोनों का मिलना हुआ। फिर दोनों अल्लाह की मर्जी के मुताबिक़ सरानदीप को आये। हज़रत जिब्रील ने गेहूँ, रोटी और लकड़ी पहुँचायी, खेती करना सिखाया, दो बैल भेजे और दोनों मेहनत-मशक़्क़त, और सुकून के साथ रोटी खाने-कमाने लगे।
हाबील और क़ाबील
अब हज़रत आदम और हव्वा मिलकर रहने लगे। दोनों से मिलकर इंसानी नस्ल का सिलसिला शुरू हुआ। हज़रत हव्वा को जब भी हमल होता, दो जुड़वां बच्चे जन्म लेते- एक लड़की, एक लड़का। क़ाबील का जन्म हुआ तो साथ में उनकी बहन अक़लीया भी पैदा हुई, इसी तरह हाबील
का जन्म हुआ तो बहन यहूदा भी पैदा हुई। खुदाई हुक्म के मुताबिक़ हज़रत आदम की शरीअत में यह क़ानून भी मुक़र्रर था कि एक पेट की बेटी और दूसरे पेट का बेटा आपस में ब्याहे जाते थे, हज़रत आदम ने इसी क़ानून के मुताबिक़ इनकी आपस में शादी कर देनी चाही, लेकिन क़ाबील ने बाप का हुक्म न माना। हज़रत आदम ने हल यह निकाला कि दोनों बेटे कुर्बानी पेश करें, जिसकी कुर्बानी क़बूल हो, अक़लीया उसके निकाह में आये। उस ज़माने में कुर्बानी का दस्तूर यह बनाया गया था कि अगर दो आदमी आपस में झगड़ते तो दोनों अपनी-अपनी कुर्बानी पहाड़ पर रखते। फिर बिना धुंए की आग आसमान से उतरती और जो हक़ पर होता था उसकी कुर्बानी को क़बूल कर लेती। जब दोनों भाई राज़ी हुए तो हाबील ने एक मोटा-ताज़ा मेंढा अपने गले में से जुदा किया और काबील एक टोकरा गेहूँ का ले जाकर रख आया। जब ये दोनों पहाड़ पर अपनी कुर्बानी को रख आये, तो ख़ुदा की कुदरत से एक आग आसमान की तरफ़ से आयी और हाबील की कुर्बानी को क़बूल कर लिया।
क़ाबील जल उठा, बोला, “हाबील! मैं तुझको अब क़त्ल कर दुंगा। हाबील बोले, “अल्लाह तो परहेज़गारों की कुर्बानी क़बूल करता है, अगर तुम मुझ पर हाथ चलाओगे तो भी मैं तुझ पर हाथ न डालूंगा, मैं अल्लाह पर भरोसा रखूगा। लेकिन क़ाबील तो जलन का शिकार हो गया था। उस पत्थर दिल ने मौक़ा देखकर हाबील के सर पर ऐसा पत्थर मारा कि हाबील शहीद हो गये। क़ाबील ने बहुत बड़ा गुनाह किया था। हाबील के शहीद होने पर क़ाबील, जब होश में आया, तो परेशान हो उठा, भाई की लाश उठाये-उठाये फिरता रहा, समझ में न आता था कि क्या करे, किस तरह लाश को दूसरों की नज़र से छिपाये। फिर अल्लाह के हुक्म से दो कौए आये। वे भी आपस में लड़ने लगे। एक ने दूसरे को मारकर गिरा दिया और अपने पंजों से ज़मीन खोद कर उसको गाड़ दिया।
क़ाबील इस पूरे वाक़िए को अपनी आंखों से देख चुका था। मन ही मन सोचने लगा, अफ़सोस कि कौए से भी घटिया हूँ कि अपने भाई की लाश नहीं छिपा पाता। फिर उसने ज़मीन खोदी और भाई की लाश को ढाँक दिया। क़ाबील का यह जुर्म भयानक था। ख़ुदा ने हुक्म दिया कि सज़ा के तौर पर इसे भी क़त्ल करो। क़ाबील को मालूम हुआ तो वह भाग खड़ा हुआ और यमन देश पहुँचा। वहाँ वह आग की पूजा करने लगा।
हज़रत आदम हमेशा काबा को हज के वास्ते जाया करते थे। एक बार अरफ़ात पहाड़ पर गये। अल्लाह तआला ने उनकी पीठ से क़ियामत तक पैदा होने वाली तमाम नस्ल की रूहों को, जिनमें अच्छों को सीधी तरफ़ और बुरों को उल्टी तरफ़ ला खड़ा किया और उन सबसे पूछा-
अलस्तु बिरब्बिकुम (क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?) सब ने कहा, 'बला' (हाँ, तू हमारा रब है।)अल्लाह तआला ने उनके इस इक़रार पर फ़रिश्तों की गवाही ली और उसे हजरे अस्वद (काले लत्थर) में अमानत के तौर पर रख दी।
हज़रत अली (रजि.) इसी लिए रिवायत करते हैं कि जो कोई हज करेगा, तो हजरे अस्वद उसकी गवाही देगा।
जब हज़रत आदम ने अपनी इतनी नस्ल को देखी तो ख़ुदा से अर्ज़ किया कि ख़ुदावंद ! इतने सारे लोग दुनिया में कहां समाएँगे? इर्शाद हुआ कि ये तमाम रूहें एक साथ दुनिया में नहीं आयेंगी, कुछ को ज़मीन पर रखूगा, कुछ मरने के बाद ज़मीन के नीचे होंगी, कुछ को बापों की पुश्त में और कुछ माओं के पेट में होंगी।
हज़रत आदम जब अर्ज़ कर रहे थे, उस वक़्त हज़रत आदम की सीधी तरफ़ एक हसीन नव जवान मौजूद था, वह रो रहा था। हज़रत आदम की नज़र उस पर पड़ी तो उन्होंने हज़रत जिबील से पूछा, यह कौन है ? उन्होंने बताया, यह तुम्हारी नस्ल ही का एक नौजवान है, जो अल्लाह का पैग़म्बर है, नाम दाऊद है। एक छोटी-सी ख़ता की वजह से वह रो रहा है। हज़रत आदम ने पूछा उम्र क्या है। बताया, साठ वर्ष, फिर हज़रत आदम ने क़िब्ले की तरफ़ मुंह करके दुआ की कि ख़दावंद ! मेरी उम्र तो तू ने एक हज़ार वर्ष की मुक़र्रर की है, मेरी इस उम्र में से तू इसको चालीस वर्ष दे दे। अल्लाह ने यह दुआ क़बूल कर ली। इस तरह जब हज़रत आदम 960 वर्ष के हो गये और इज्राईल अलैहिस्सलाम रूह क़ब्ज़ करने आये तो हज़रत आदम ने फ़रमाया, अभी तो उम्र के चालीस वर्ष बाक़ी हैं ? तो उन्होंने याद दिलाया कि ये चालीस वर्ष तो आपने मीसाक़ (वचन) के दिन हज़रत दऊद को दे दिये थे। हज़रत आदम को यह बात याद न रही थी, इसी लिए वह बराबर इंकार करते रहे। अल्लाह ने बहरहाल उनकी बात मान ली, लेकिन आइंदा के लिए यह हुक्म हो गया कि हर मामले को गवाहों के साथ लिख लिया जाया करे, ताकि कोई इंकार न कर सके।
हज़रत आदम बीमार हुए तो उनको बहिश्त के मेवों के खाने की ख़्वाहिश हुई। औलाद से कहा कि वह इसे हासिल करे। जब बाहर आये तो देखा कि जिब्रील और कई फ़रिश्ते कफ़न और ख़ुश्बू बहिश्त की लिए चले जा रहे हैं। उनसे हज़रत आदम की ख़्वाहिश का ज़िक्र किया। हज़रत जिब्रील ने बताया कि हम इसी लिए आये हैं कि उनको वहाँ पहुँचा दें, जहां वह अपनी ख़्वाहिश पूरी कर लेंगे। फ़िर हज़रत आदम ने अपनी बीवी और लड़कों से फ़रमाया कि तुम यहां से जाओ और मुझे ख़ुदा के फ़रिश्तों पर छोड़ दो। हज़रत आदम ख़ुदा की याद में लग गये, यहां तक कि फ़रिश्तों ने उनकी रूह क़ब्ज़ कर ली। हज़रत आदम की नमाज़े जनाज़ा, हज़रत शीस अलै. ने जिबील की तालीम के मुताबिक़ पढ़ाई और हज़रत आदम को दफ़्न कर दिया गया। क़ियामत तक आदम की नस्ल के लिए नमाज़े जनाज़ा की यह रस्म उसी वक़्त से चल रही है।
रोजे की नियत की दुआ और रोजे की फजीलत
आयतल कुर्सी हिंदी में तर्जुमा के साथ वह आयतल कुर्सी की फजीलत तफसीर और हदीस में बयान
रमजान का चांद देखने की दुआ और चांद देखने के बारे में जरूरी मालूमात
रोजे का काफ्फारा कैसे अदा करें।
the creation of adam |

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