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आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का जीवन || Life of the last prophet Hazrat Mohammad SAW by Islamic creation

    आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

    आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम



    नबियों के सिलसिले के आख़िरी कड़ी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, जो मक्का शहर में 12 रबीउल अव्वल, मुताबिक़ 20 अप्रैल सन् 571 ई. को पैदा हुए। आपके वालिद का नाम अब्दुल्लाह और मां का नाम बीबी आमना था। पैदाइश से पहले ही आपके वालिद का इंतिक़ाल हो गया था।

    आप पैदा हुए तो आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आपका नाम मुहम्मद रखा। लोगों ने पूछा यह क्यों रखा ? बोले, मैं चाहता हूँ कि मेरे बेटे की सारी दुनिया तारीफ़ करे । अल्लाह ने उनकी तमन्ना पूरी की।

    बचपन का ज़माना

    उस ज़माने में अरब का यह रिवाज था कि शहर के बड़े लोग अपने बच्चों को दूध पिलवाने और पलने-बढ़ने के लिए देहात में भेज देते थे ताकि वहाँ की खुली हवा में रहकर खूब मोटे-ताज़े हो जायें। उस ज़माने में अरब के देहात की ज़बान शहरों से ज़्यादा साफ़-सुथरी और ज़ोरदार होती थी। देहात में रहकर बच्चों की ज़बान खूब अच्छी हो जाती थी। प्यारे नबी को भी इस रिवाज के मुताबिक़ हलीमा नाम की एक दाई को सौंप दिया गया। दाई हलीमा जिस क़बीले की थी, उसका नाम बनी साद था, इसलिए उनको हलीमा सादिया कहते हैं। आपकी मां ने भी आपको दूध पिलाया और और औरतों ने भी, मगर सबसे ज़्यादा दिनों तक दाई हलीमा ने आपको दूध पिलाया। आप हलीमा सादिया के पास लगभग चार साल रहे। आप हलीमा और उनके बच्चों को बहुत चाहते थे। नबी हुए तो हलीमा, उनके शौहर और बच्चे सब मुसलमान हो गए। चार साल की उम्र से मां के पास रहने लगे। सन् 575-76 में जब आप छ: साल के थे, वह आपको साथ लेकर मदीने गईं। वहाँ से वापसी में बीमार पड़ी और उनका इन्तिक़ाल हो गया। मक्का और मदीने के रास्ते में ‘अबवा' नाम की एक जगह है, वहीं दफ़न हुईं और आप यतीम हो गये। 'उम्मे ऐमन' आपकी खिलाई थीं। वहाँ से आपको दादा मियां के पास लाईं। उनको बहुत दुख हुआ, पर क्या करते। मरना-जीना ख़ुदा के हाथ में है। मरना सबको है। आई हुई घड़ी को कौन टाल सकता है। बड़े होने पर एक बार प्यारे नबी ‘अबवा' से गुज़रे । मां की क़ब्र देखकर आपका दिल भर आया। आपकी आंखों में आंसू देखकर साथी भी रोने लगे। दादा अब्दुल मुत्तलिब आपको बहुत प्यार करते थे। काबे की छांव में उनके लिए फ़र्श बिछाया जाता। उस पर अकेले वही बैठते, किसी दूसरे को इजाज़त न थी। प्यारे नबी छोटे थे, आकर उस पर बैठ जाते। लोग चाहते कि उठाकर अलग बिठा दें। अब्दुल मुत्तलिब रोक देते, कहते, बैठने दो। फिर सर और पीठ पर हाथ करते और पास ही बिठा लेते। आठ साल के थे कि अब्दुल मुत्तलिब का इंतिक़ाल हो गया। यह मक्के ही में सन् 578 की बात है। मरते वक़्त उन्होंने आपको चचा अबू तालिब  को सौंपा। वह आपके सगे चचा थे। एक मां से तीन भाई अबू तालिब, जुबैर और प्यारे नबी के वालिद अब्दुल्लाह थे। चचा अबू तालिब बहुत तंग हाल थे। उनके अपने भी बहुत से बच्चे थे। फिर भी वह अपने अच्छे भतीजे प्यारे नबी को बहुत प्यार करते थे। अपने पास सुलाते, जहां जाते, अपने साथ रखते। आपने बचपन में बकरियां चराईं। नबी होने पर एक बार आपके साथी  झरबैरियां तोड़ रहे थे। आपने कहा, “काली-काली तोड़ते जाओ। बड़ी मज़ेदार होती हैं।'' यह तब का तजुर्बा है जब मैं बकरियां चराता था। साथियों ने पूछा “ऐ अल्लाह के रसूल, आपने बकरियां भी चराई हैं?" बोले, “हां, मैंने बहुत थोड़ी मज़दूरी पर मक्केवालों की बकरियां चराई हैं।" बुरे बच्चों की तरह बेकार के खेल-तमाशों में आप अपना वक़्त बरबाद नहीं करते थे। ऐसे किसी जल्सा या सभा में जाना आपको पसन्द न था जहां बेशर्मी और फूहड़पन का ज़िक्र हो।

    नबी होने तक

    पन्द्रह साल के थे जब आपने फ़िजार की लड़ाई में हिस्सा लिया। इस नाम से कई लड़ाइयां हुई थीं। आख़िरी में आप भी मौजूद थे। आपने चचा लोगों को तीर उठा-उठा कर देते थे। नबी होने के बाद एक बार उस लड़ाई की बात करते हुए आपने फ़रमाया, “मैं आज भी नहीं सोचता कि मैं हिस्सा न लेता तो अच्छा था।" बात यह है कि इस बार जुल्म आपके ख़ानदान की तरफ़ से न था। फ़िजार की लड़ाई में बड़ी मारकाट हुई बहुत आदमी मारे गए। उसके कुछ दिन बाद कुछ लोग अब्दुल्लाहा बिन जुदआन नाम के एक आदमी के घर में इकट्ठा हुए, खाना-पीना हुआ। फिर सब लोग सिर जोड़कर बैठे और अह्द किया कि “हम सताए जानेवालों की मदद करेंगे। हक़दार को उसका हक़ दिलायेंगे। ग़रीबों का दिल रखेंगे, मुहताजों के काम आयेंगे।' अरब में यह अपने क़िसम की पहली अद थी। जहां लूट मार दिन रात का खेल हो, जहां अपनी नाक ऊंची रखने के लिए, झूठी लड़ाई के वास्ते सैकड़ों साल तक लड़ाइयां ठनी रहती हों, जहां कमज़ोरों को सताकर लोगों के दिल में नरमी की एक लहर भी न उठती हो, वहाँ नेकी-भलाई का ऐसा पाक और अच्छा अद। आप बाद में भी अक्सर फ़रमाया करते- “अब्दुल्लाह बिन जुदआन के घर पर जो अद्द किया गया था वैसा अह्द कोई आज भी करे तो मैं उसके साथ हूँ। उस अह्द के बदले अगर कोई मुझे सुर्ख ऊंट भी देता तो मैं ठुकरा देता।” सुर्ख ऊंट काफ़ी क़ीमती होते हैं। तारीख़ी अहद को हलफुल फुजूल' कहा जाता है। 

    बीबी ख़दीजा एक बड़ी अमीर औरत थीं। लोग उनकी बड़ी इज़्ज़त किया करते थे, उनका बड़ा व्यापार था। अपने रुपये से लोगों को तिजारती सफ़र पर भेजतीं। मुनाफ़ा में उनको भी साझी बनातीं। प्यारे नबी की सच्चाई की मक्का में बड़ी चर्चा थी। लोग आपको अमीन कहकर पुकारते थे। आपकी सच्चाई और ईमानदारी की चर्चा सुनी तो बीबी ख़दीजा ने ख़्वाहिश की कि आप उनका तिजारती माल लेकर सफ़र करें। पचीस साल के थे जब आप बीबी ख़दीजा के गुलाम 'मैसरा' के साथ सन् 595 ई. में शाम के सफ़र पर रवाना हुए। आपने ऐसी मेहनत, सूझबूझ और ईमानदारी से काम किया कि पहले से कहीं ज़्यादा मुनाफ़ा हुआ। बीबी ख़दीजा पर इसका बड़ा असर पड़ा। वह बहुत खुश हुईं। जितना तै हुआ था, उससे ज़्यादा आपको दिया शाम के सफ़र से लौटे। 'मैसरा' ने आपकी ईमानदारी, कारोबार में होशियारी, सच्चाई, हर एक के साथ हमदर्दी, प्रेम और इनसानियत का आंखों देखा हाल बयान किया। बीबी ख़दीजा ने विवाह का सन्देश भेजा। आप राज़ी हो गये। दिन और वक़्त तै हुआ। आप बीबी ख़दीजा के घर पहुँचे। चचा भी साथ थे। सादगी के साथ शादी हो गयी। कुरैश के बड़े-बड़े सरदार मौजूद थे। हज़रत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) भी उसमें शामिल थे। शादी के वक़्त आपकी उम्र पचीस साल थी और बीबी ख़दीजा की चालीस साल। उनकी दो शादियां पहले भी हो चुकी थीं। दोनों शौहर मर चुके थे।

    आपकी अच्छी आदतों की मक्का में चर्चा थी। आप सदा सच बोलते थे। लोग अपनी अमानत आपके पास रख जाते, आप उनकी अमानत ज्यों की त्यों लौटाते। आपने कभी शराब न पी। बुतों की पूजा न की। मेलों-ठेलों और त्योहारों में न गए। बुरी बातों के पास कभी न फटके। बकरियां चराईं, तिजारत की। अपनी रोज़ी मेहनत और मशक़्क़त से कमाई। ख़ुदा का शुक्र अदा किया।

    5 मक्का के नज़्दीक 'हिरा' नाम की एक पहाड़ी है। आप घर से सत्तू-पानी लेते। उसी पहाड़ी की एक गुफ़ा में चले जाते। कई-कई दिन तक वहाँ रहते। अल्लाह की इबादत करते। फिर घर आते, सत्तू-पानी लेते और लौट जाते। एक दिन उसी गुफा में थे। अल्लाह ने अपना फ़रिश्ता भेजा, उस फ़रिश्ते का नाम जिब्रील है। जिब्रील अल्लाह का संदेश लाए। यह संदेशा क्या था-


    अल्लाह का कलाम 

    रमज़ान की सत्तरह तारीख़ थी, अंगेज़ी हिसाब से 6 अगस्त सन् 610 ईस्वी। आपकी उम्र उस वक़्त चालीस साल की थी। पहले वह सूर: उतरी जिसका पहला लफ़्ज़ ‘इक्रअ' है और जिसका नाम सूर: अलक़ है।

    कुरआन पाक क्या था, एक रौशनी थी सीधा रास्ता दिखाने के लिए, अच्छाई-बुराई पहचानने के लिये, दुनिया के सुधार का सामान करने के लिए, इंसानों को जिंदगी गुज़ारने का पूरा क़ानून देने के लिए। इस तरह आपको नुबूवत मिली। आप भटके हुओं को राह दिखाने लगे, अन्धेरे में उजाला फैलाने लगे। यह उजाला घरवालों के लिए भी था, बाहरवालों के लिए भी। अपने ख़ानदान और अपने ही देश नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए  था, सब इंसानों के लिए था

     नबी होने के बाद

    इस तरह आप तीन साल ख़ास-खास लोगों को समझाते रहे। पहले घर वालों को समझाया जिनसे कुछ लगाव था, उन तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाया, जिनको देखा नेकी-भलाई की खोज में हैं उनको मंज़िल का निशान बतलाया। इन कोशिशों से थोड़े से लोग मुसलमान हुए, जो पहाड़ की किसी घाटी में जमा होते, नमाज़ पढ़ते, अल्लाह की इबादत करते, दीन की चर्चा करते। कुछ दिनों के बाद ‘अरक़म' के घर जमा होने लगे, वहीं नमाज़ पढ़ते, दीन की बातें करते। यह घर ‘सफ़ा' पहाड़ की तली में था। आप लोगों को समझाते रहे। अलग-अलग, एक-एक से मिलते। कहते, “इबादत के लायक़ सिर्फ अल्लाह है। दिल से उसको मानो ज़बान से उसके मालिक होने का इक़रार करो।” काफ़िर हर घड़ी इसी फेर में रहते मुसलमानों को कैसे सताएँ, बहुत दुख देते, फिर भी जी न भरता। लेकिन दीन धीरे-धीरे फैलता रहा, काम आगे बढ़ता गया और मुसलमानों की तादाद चालीस हो गयी। चालीसवें हज़रत उमर (रज़िअल्लाहु अन्हु) थे।

    उस वक़्त अल्लाह का संदेश पहुँचाना आसान न था, मुसलमान होना तमाम लोगों से दुश्मनी मोल लेना था। मक्का बुत पूजने वालों का गढ़ था, काबा के मुजाविरों और मूर्तियों की हिफ़ाज़त करने वालों का मर्कज़ था। सारा अरब उनकी इज़्ज़त करता था। उनको बहुत मानता था। प्यारे रसूल ने उन लोगों से बातचीत की जिनमें धर्म से कुछ दिलचस्पी पाई, जिन्हें देखा हक़ की खोज में हैं। औरतों में सबसे पहल बीवी ख़दीजा, मर्दो में हज़रत अबू बक्र, लड़कों में हज़रत अली और गुलामों में हज़रत ज़ैद बिन हारिस (रज़ियल्लाहु अन्हुम) ने इस्लाम क़बूल किया और मुसलमान हुए।

    आप अल्लाह का दीन अब तक एक-एक आदमी के पास अलग अलग पहुँचाते थे। एक दिन आप सफ़ा पहाड़ पर चढ़ गये। वहाँ से पुकारा,

    “ऐ ग़ालिब की सन्तान', लोग दौड़ पड़े। पूछा, “क्या है ?” आपने कहा,

    "तुम लोग मुझे सच्चा समझते हो या झूठा?"

     सबने एक साथ जवाब दिया, “आप सच्चे हैं, अमानतदार हैं। हम आपको ‘सादिक़' (सदा सच बोलनेवाला) और 'अमीन (जो अमानत में खियानत न करे) कहते हैं।" 

    आप ने कहा, “देखो मैं ऊंचाई पर हूँ, दूसरी ओर भी देखता हूँ। तुम पहाड़ की तली में हो, तुमको दूसरी ओर की ख़बर नहीं। अगर मैं तुम से कहूँ कि एक फ़ौज ‘सफ़ा' पहाड़ के पीछे तुम्हारी ताक में है, तो तुम यक़ीन करोगे?"

    सब एक साथ बोले, “हां, क्यों नहीं, ज़रूर, ज़रूर, तुम सच्चे हो तुम कभी झूठ नहीं बोले।"

     आपने कहा, “तो फिर मैं ही तुमको बताता हूँ कि आनेवाले भारी अज़ाब से डरो। मरने के बाद पूछगछ होगी। मैं तुम्हें दुनिया में कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा सकता। मरने के बाद कोई हिस्सा नहीं दिला सकता। मरने के बाद और इस जिंदगी में छुटकारे की एक ही राह है, कहो : अल्लाह एक है, उसका कोई साझी नहीं, मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बन्दे और रसूल हैं।"

    यह पुकार थी या बिजली की कड़क, जिससे अरब की सारी ज़मीन हिल गई। दुश्मन अबू लहब बड़ा गुस्से से जल-भुन गया। बोला, तुमने इसलिये हम को पुकारा था। फिर आप बाज़ार में हक़ की तरफ़ बुलाते तो वह मक्कार पीछे-पीछे चलता। आप पर पथराव करता, इतना पथराव कि आपकी मुबारक एड़ियां घायल हो जातीं। मुग़ीरा का बेटा वलीद कुरैश क़बीले का एक बड़ा सरदार था। एक दिन लोग उसको घेरे बैठे थे। उसने कहा, “भाइयो हज के दिन आ रहे हैं, अरब के कोने-कोने से लोग यहां आएंगे। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को तुम जानते ही हो, यह उनमें जाएंगे और अपना दीन फैलाएंगे।

    कोई एक बात तै कर लो। उनको झुठलाने के लिए सब मिलकर वही बात कहो। ऐसा नहीं कि कोई कुछ कहे, कोई कुछ। और उनको झूठा साबित करने के बदले तुम ख़ुद झूठे बन जाओ।" लोगों ने कहा, “वलीद, तुम ही बतलाओ।” उसने कहा, “नहीं यह नहीं। पहले तुम लोग कोई बात तै करो। मैं सुनने के बाद कुछ राय दूंगा।

    एक ने कहा, “हम कहेंगे यह ‘काहिन' हैं, जैसे पाखंडी लोग होते हैं, लोगों की क़िस्मत अनाप-शनाप बतलाते हैं, पैसे लेते हैं।" वलीद ने “यह बात जमेगी नहीं। मैंने काहिनों को देखा है। वे मिनमिनाते हैं, उनके जुमलों का बहुत से मतलब देते हैं। वे टुकड़े-टुकड़े करके बोलते हैं। इनकी बात का वह ढंग नहीं।" दूसरा बोला, “हम कहेंगे कि इनका दिमाग़ ख़राब है, (तौबा, तौबा) पागल हैं। इनकी बात पर ध्यान न दो।" वलीद ने कहा, 'उनकी बातों को दीवानों की बात साबित करना कठिन है, यह बात भी झूठी पड़ जाएगी।" तीसरे ने कहा, “अच्छा, तो हम कहेंगे यह शायर है, शायरों का क्या ठिकाना।” वलीद ने इस राय की भी मुखालफ़त की। चौथा बोला, “अच्छा, तो हम कहेंगे यह जादूगर है, इनकी बात में न जाओ।" वलीद ने कहा, “यह भी ग़लत, वे झाड़-फूंक, गंडा तावीज़ करते ही नहीं।” सब ऊब कर सब एक साथ बोले, "तो फिर आप ही बतलाइये। हमारी तो अक़्ल काम नहीं करती।" वलीद ने कहा, 'ख़ुदा की क़सम, उनके कलाम में अनोखी मिठास है। उनका कलाम ऐसे भारी भरकम पेड़ की तरह है, जिसकी जड़ें ज़मीन में दूर-दूर तक फैली हों और जिसकी शाखाएं फलदार हों। उनके आगे तुम्हारी एक न चलेगी। मेरी समझ में तो आता है कि तुम लोग कहो, ये जादूगर हैं, अपनी बातों से मियां-बीवी में फूट डालते हैं, बाप-बेटे में बैर पैदा कर देते हैं। रिश्तेदार-ख़ानदानियों को एक-दूसरे से बिछड़ा देते हैं।" यह तय हो गया। हज के मौके पर ये लोग हरेक से यही कहते फिरते। लेकिन हक़ की बात कौन मार सका है। नतीजा उल्टा हो रहा था।

    आपके एक दोस्त थे, ज़िमाद बिन सालबा। नबी होने से पहले उनसे बड़ी दोस्त थी। उनसे लोगों ने कहा, “तुम्हारे दोस्त को पागलपन हो गया है, उनका हाल मालूम करो। वह कुछ झाड़-फूंक करते थे। आपके पास आये, बोले, “तुम्हें क्या हो गया है? कहो तो कुछ फूंक डाल दूं।” 

    आपने  जवाब दिया, “सारी तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है। हम उसी का गुन गाते हैं और उसी से मदद चाहते हैं। जिसको अल्लाह सीधा रास्ता दिखला दे, उसे कोई गुमराह नहीं कर सकता और वह जिसे गुमराह कर दे, उसे कोई सीधा रास्ता नहीं दिखला सकता, और मैं इस बात का गवाह हूँ कि एक अल्लाह के अलावा कोई इलाह' नहीं, और मैं इस बात का भी गवाह हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं।” इसके बाद आगे कुछ कहने ही वाले थे कि ज़िमाद ने कहा, “फिर पढ़िए।" आप ने तीन बार यही लफ़्ज़ दुहराए, वह सुनते रहे, फिर बोले, “मैंने काहिनों को देखा है। पागलों तथा कवियों से भी पाला पड़ा है। इस क़िस्म के लफ़्ज़ किसी से नहीं सुने। तुम तो समुन्दर की गहराइयों तक पहुँच गए, हक़ीक़त को पा चुके हो। हाथ बढ़ाओ मैं मुसलमान होता हूँ।" आपने हाथ बढ़ा दिया, ज़िमाद मुसलमान हो गए। अल्लाह का दीन धीरे-धीरे फैल रहा था। काफ़िर परेशान थे, क्या करें, कैसे हक़ की राह रोकें? प्यारे रसूल अकेले हैं, थोड़े से साथी हैं, उनके पास कोई ताक़त नहीं, देखने में बेबस हैं, मजबूर हैं, फिर भी उनकी बात है कि मन में समा जाती है। बाप-दादा का धर्म मिटा रहा है। 'लात' और 'उज़्ज़ा' की खुदाई को ख़तरा है। कुछ काफ़िरों ने सोचा, चलो अबू तालिब के पास चलें, धर्म तो उनका भी वही है, जो हमारा है। इन मूर्तियों की इज़्ज़त का, खानदान की आन-बान का कुछ न कुछ ध्यान उनको भी होगा। फिर क्या था, साथ मिलकर अबू तालिब के पास आए। बोले, “भतीजे को रोकिए, सारे अरब की इज़्ज़त मिट्टी में मिल रही है। हमारे-आपके देवी-देवता झुठलाए जा रहे हैं। आपके भतीजे का कहना है कि हम सब बेवकूफ़ हैं, नादान हैं। ‘लात' और 'उज़्ज़ा' की पूजा करते हैं, इबादत के क़ाबिल तो सिर्फ़ अल्लाह है। उसका कोई साझी नहीं। हम आपसे लात' और 'मनात' के नाम पर कहते हैं, उनको समझाइए, अब पानी सिर से ऊंचा हो चुका है।" अबू तालिब ने किसी तरह उनसे पीछा छुड़ाया, भतीजे से कुछ न कहा। प्यारे रसूल अपना काम करते रहे और दीन फैलता रहा। दुश्मन एक बार फिर आये। बहुत कहा सुना, इस बार धमकी भी दी, जान का डर दिला गए। अबू तालिब सोच में पड़ गए, अब क्या करें। भतीजे को बुलाया, पास बिठाया, फिर बोले, बेटा मुझ पर इतना बोझ न डालो कि सहारना मुश्किल हो जाए। प्यारे नबी समझे, चचा साथ छोड़ रहे हैं। यह काम तो अल्लाह का था। उसी के भरोसे हो रहा था। बोले, “चचा जान, ये लोग मेरे एक हाथ में सूरज और दूसरे हाथ में चांद लाकर रख दें, तब भी इस काम को नहीं छोड़गा, या तो अल्लाह अपने दीन को ग़ालिब करेगा या इस राह में मर-खप जाऊंगा।" यह कह रहे थे और आपकी आंखों से आंसू बह रहे थे। फिर उठे और बाहर जाने लगे। चचा ने रोका, वापस बुलाया

    और कहा, “भतीजे, जाओ अपना काम जारी रखो। अबू तालिब तुम्हें इन

    ज़ालिमों के चंगुल में नहीं देगा।” बड़े चक्कर में थे, देख-रेख की लाज,

    इन्सानियत की मांग, और प्यारे नबी की जिंदगी का हर हिस्सा उनके सामने

    था जो जादू की तरह दिल व दिमाग़ पर छा गया था।

    ये लोग फिर आए। इस बार अपने साथ वलीद के बेटे अमारा को भी

    लेते आये और अबू तालिब से कहा, “देखिए, यह अमारा है, वलीद का

    बेटा, सुन्दर, नौजवान, आप इसको अपना बेटा बना लीजिए और अपने

    भतीजे को हमारे सुपुर्द कीजिए। वह हमारे और आपके धर्म को

    झुठलाता है। बाप-दादा जिस रास्ते पर चलते रहे हैं, उससे सारे कुरैश ही नहीं, सारे अरब, सारी दुनिया, सब इन्सानों को फेरने की धुन में है। बेटे के बदले बेटा लो, झगड़ा ख़त्म करो।”

     अबू तालिब का मुंह लाल हो गया। गुस्से में बोले, "अमारा को मैं ले लूं, खिला-पिला कर मोटा करूं। अपना प्यारा बेटा तुमको दे दूं ताकि तुम उसको क़त्ल कर डालो। अच्छे आये कहीं के, जाओ, जो तुमसे बने करो। मैं इन चालों में आनेवाला नहीं। अब क्या था। दुश्मनों के गुस्सा का पारा चढ़ गया। जुल्म व सितम की चक्की चल पड़ी। हर क़बीला इस पर तुल गया कि उसमें जो लोग मुसलमान हुए हैं, उनको पीसकर रख दिया जाय। सिर्फ़ ‘बनी हाशिम' ने अपने सरदार अबू तालिब का साथ दिया।

    ये सब कुछ झेल गये

    बिलाल- 

    इनको कौन नहीं जानता! प्यारे नबी के 'मुअज़्ज़िन' (अज़ान देने वाले)। रहती दुनिया तक अज़ान की सदा गूंजेगी और रहती दुनिया तक उनका नाम रहेगा। यही थे आज़माइश की भट्ठी में तप कर ख़रा सोना साबित होने वाले। उनका मालिक दोपहर की चिलचिलाती धूप में उनको अरब की गर्म रेत पर लिटा देता, सीने पर बहुत भारी पत्थर रख देता। और कहता “मुहम्मद की बुराई करो, अल्लाह की इबादत से इनकार करो या फिर समझ लो इस भारी बोझ, इस तपती हुई रेत पर तुम्हारी जान निकल जाएगी, हम तुम्हें जिंदा न छोड़ेंगे। इस दर्द और तक्लीफ़ की हालत में भी पक्के इरादे और यक़ीन की मूर्ति उस मौत से खेलने वाले बहादुर के मुंह से निकलता- 'अहद', 'अहद' यानी अल्लाह एक है, अल्लाह एक है।"

    अम्मार-

     इनको ही नहीं इनके मां-बाप को भी वे ज़ालिम मैदान में घसीट ले जाते, फिर गर्म रेत पर खूब अच्छी तरह सताते, बड़ी तकलीफें पहुँचाते, लेकिन उनका यक़ीन, उनका ईमान किसी भी तक्लीफ़ की परवाह न करता। एक दिन प्यारे रसूल उधर से गुज़रे । मां-बेटे को देखा, अपने ईमान की क़ीमत अदा कर रहे हैं। दीन की राह में बहादुरी से जुल्म व सितम का सामना कर रहे हैं। अम्मार के वालिद का नाम यासिर था।

     आपने फ़रमाया, “ऐ यासिर की औलाद, हिम्मत बनाए रखो और हर हालत में अल्लाह का शुक्र ही अदा करते रहो। तुम्हारी जगह जन्नत में है।"

     यासिर यह जुल्म सहते -सहते जन्नत को सिधारे । उनकी बीवी 'सुमय्या' को अबू जहल ने भाला मार कर शहीद कर दिया। मां-बाप का इस राह में शहीद होना भी अम्मारा को राहे हक़ से न हटा सका।

    ख़ब्बाब-

     इनके कपड़े उतार कर इन्हें अंगारों पर लिटा देते। ऊपर से जलता हुआ पत्थर रख देते और उनको दबाए रहते कि उठने न पाएं। यहां तक कि दहकते अंगारे ठंडे पड़ जाते। मगर दहकते हुए अंगारों की गर्मी उस गर्मी से हार मान गई जो ख़ुदा और उसके रसूल पर ईमान ने उनके दिल में पैदा कर दी थी। काफ़िरों की भड़काई हुई आग बुझ गई, लेकिन ईमान का अंगारा भड़ता रहा। उसे कोई न बुझा सका

    सुहैब- 

    रूम के रहनेवाले थे, मक्का में आकर बस गए थे। तलवार की तिजारत करते थे। बड़े पैसे वाले थे। मदीने जाने लगे तो काफ़िरों ने कहा,

    “हक़-पसंद हो। अल्लाह और उसके रसूल से प्रेम का दम भरते हो। यह

    धन तो हमारे बीच कमाया है, इसे छोड़ जाओ, तो जाओ। 

     सुहैब मुस्कराये

    "मूर्यो, यह धन ! इसकी क्या क़ीमत है। यह हक़ का मोल हो सकता है! बड़े नासमझ हो। देने वाला कौन था? रख लो इसको अपने पास, मैं जाता हूँ। इसकी चिन्ता किसको है। यह सारी कायनात तो हक़ की क़ीमत हो ही नहीं सकती, ये कुछ ठीकरियां क्या चीज़ हैं !

    लुबैना-

     हज़रत उमर की लौंडी थीं। आप मुसलमान न हुए थे। उनको मारते, बहुत मारते, थक जाते तो रुकते और कहते– “तुझ पर तरह नहीं खा रहा हूँ।" वे जवाब देती–“मुसलमान हो जाओ, नहीं तो अल्लाह तुमको इसी तरह अज़ाब में डालेगा।" हक़ पर निछावर होनेवाली इस बहादुर औरत की हिम्मत और जवाब का भी उस गर्मी के पैदा करने में हाथ रहा होगा, जिसकी वजह से बाद में हज़रत उमर फ़ारूक़ के दिल से ईमान का चश्मा फूट बहा।

    प्यारे रसूल भी- 

    जुल्म व सितम साथियों ही पर नहीं तोड़े जा रहे थे, प्यारे रसूल भी सताए जाते थे और बुरी तरह सताये जाते थे। कभी गले में फन्दा डाला गया, अबू बक्र सिद्दीक़ ने आकर छुड़ाया। कभी सिर पर पूरी ओझ लाकर डाल दी गई, प्यारे रसूल का सर सज्दे में था और पापी ठठे लगा रहे थे। आख़िर में आपकी चहेती बेटी हज़रत फातमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को इत्तिला मिली। वह दौड़ी हुई आयीं और आपके सर से ओझ हटा कर अलग फेंक दी। हंसनेवालों के लिए रोने का दिन भी आया। यह सब कुछ हुआ लेकिन आप अपनी जगह पर अडिग रहे। काम होता रहा और  दीन फैलता गया।


    नयी आज़माईश

    तेज़ी से दीन फैल रहा था। हर रुकावट से निमटती, हर पत्थर को राह से हटाती, जिस तरह पहाड़ी नदी चट्टानों को काटती, पत्थर को बराबर करती, अपनी राह बनाती बहती चली जाती है उसी तरह आपका पैग़ाम आम हो रहा था, फैल रहा था। काफ़िर बौखलाये हुए थे, उनकी मति मारी हुई थी। जो उपाय सोचते, उलटा पड़ता। हार गए, चालबाज़ियों से कुछ फ़ायदा न हुआ। पहले प्यारे नबी से किसी क़िस्म का ताल्लुक रखनेवाले लोग नए दीन में जा रहे थे, मजबूर, मुहताज, लौंडी, गुलामों और नर्म दिल के आदमियों ने इस पुकार की ओर क़दम बढ़ाया था, लेकिन अब-अब तो 'हमज़ा' जैसे बहादुर साथ छोड़ रहे थे, पत्थर पसीज गये, चट्टानों से सोत उबल पड़े। काफ़िर फिर जमा हुए और सब मिलकर आपके पास आये। उत्बा' नाम का एक काफ़िर आगे-आगे था। आते ही बोला, बड़े मीठे लहजे में, बड़ी नर्मी से, बड़ी चापलूसी के साथ-"मेरी सुनोगे? मैं तुमसे कुछ कहनेआया हूँ। मान जाओ तो बड़ा अच्छा है।" आपने जवाब दिया, “कहो अबुल वलीद, मैं सुनने को तैयार हूँ।” उसने कहा, “यह सब जो तुम करते हो, यही हमारे देवी-देवताओं की रुसवाई, नया दीन फैलाने के लिए दौड़-धूप, अगर तुम यह सब रुपये-पैसे, सोने-चांदी के लिए करते हो तो बेकार में हलकान होते हो। 'लात' और 'उज़्ज़ा' की बुराई करना छोड़ दो, बाप-दादा के धर्म के ख़िलाफ़ कुछ न कहो। हम धन का ढेर तुम्हारे क़दमों में लाकर डाल देते हैं, इतना धन कि मक्का में कोई बड़े-से-बड़ा धनवान भी तुम्हारी बराबरी न कर सकेगा। अगर धन नहीं चाहते, सरदार बनने की तमन्ना है तो इसके लिए भी हम सब राज़ी और तैयार हैं। आज से तुम हमारे सरदार नहीं, बल्कि राजा हो। लेकिन शर्त वही है, अपनी तब्लीग़ बन्द कर दो। लोगों से न कहो कि अल्लाह एक है, उसका कोई साझी नहीं। यह भी नहीं, किसी सुंदर, चांद जैसी खूबसूरत औरत से ब्याह करना चाहते हो तो यह भी मंजूर है, हम यह भी कर देंगे। लेकिन हमारे देवी-देवताओं को बुरा न कहो।"

    आप सुनते रहे, जब वह चुप हुआ तो आपने कुरआन पाक की एक सूर: हा-मीम-सज्दा की आयतें पढ़नी शुरू की। उसने अपने दोनों हाथ पीठ के पीछे ज़मीन पर टेक दिये और ख़ामोशी से सुनता रहा। आप सज्दे की जगह पर पहुँचे, सज्दा किया। फिर उसकी ओर देखा और बोले, "तुमने सुना ? यह तुम्हारी बात का जवाब है।" उत्बा वहाँ से उठा और साथियों की ओर चला, उसके चेहरे का रंग बदला हुआ था। काफ़िरों ने देखा, आपस में कहने लगे, “वह आ तो रहा है लेकिन उसका चेहरा कुछ और कह रहा है!' क़रीब आया तो चारों तरफ़ से लोग चिल्लाए, “कहो, क्या ख़बर लाये।” जवाब मिला, "ख़बर यह है कि आज जो कलाम मैंने सुना है, ऐसा कलाम मैंने कभी नहीं सुना है। न वह शायरी है, न जादू, न काहिनों की बड़। मेरी मानो तो इस शख्स को इसके हाल पर छोड़ दो। उसकी जीत हुई तो तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, आख़िर तुम ही में से एक वह भी है, उसकी इज़्ज़त तुम्हारी इज़्ज़त है, हारा तो तुम्हारी मुराद पूरी हुई, यही तो तुम चाहते ही हो। मेरी तो यही राय है, वैसे तुम्हारी मर्जी, जो जी में आये करो।' बातिल सफ़ों में दरारें पड़ रही थीं। पांव तले से ज़मीन खिसक रही थी।

    प्यारे नबी ने अपना काम जारी रखा। हक़ की पुकार मक्का की पहाड़ियों में गूंजती रही, कोई उसे दबा न सका। दीन फैलता रहा। 

    वतन भी छूटा

     अरब से मिला हुआ हब्शा एक देश है। वहाँ के राजा को नज्जाशी कहते थे। वह बहुत भला आदमी था। किसी पर जुल्म नहीं होने देता था। अपने-पराये के साथ अच्छा व्यवहार करता। प्यारे नबी ने साथियों से कहा,

    "चचा की वजह से और बनी हाशिम के डर से ये लोग मुझ पर हाथ उठाने की हिम्मत नहीं करते। तुम लोगों को बड़ी तक्लीफ़ देते हैं, तुम हब्शा चले जाओ। अमन होगा तो फिर चले आना। वहाँ अल्लाह की इबादत कर सकोगे। उसके बताये हुए रास्ते पर ज़िंदगी तो गुज़रेगी।”

      सन् 615 ई. में आपके नबी होने के पांचवें साल, रजब का महीना था। ये थोड़े से लोग छिपते-छिपाते हब्शा पहुँचे। उनके चले जाने की ख़बर फैली। काफ़िरों को बड़ा अचंभा हुआ। “दीन के लिए घरबार छोड़ दिया! ये कैसे लोग हैं! इनका दीन कैसा है?' काफ़िरों ने समुद्र के किनारे तक पीछा किया, ये लोग जा चुके थे। खिसिया कर लौट आए। हब्शा में मुसलमानों को हर क़िस्म की आज़ादी थी।

    जो लोग हब्शा गये थे, कुछ दिनों बाद लौट आये। उनको ख़बर मिली कि अब मक्का में अमन है। हज़रत उमर (रज़ियल्लाह अन्हु) मुसलमान हो गए। लोग खुल्लम-खुल्ला नमाज़ पढ़ते हैं। कोई रोक-टोक नहीं। यहां आए तो पहले से ज़्यादा सताया। प्यारे नबी ने समझाया, “जाओ, फिर हब्श चले जाओ, दीन फैलाओ। दीन पर चलो। मक्का अब रहने की जगह नहीं।" फिर चले। यह सफ़र बड़ा मुश्किल था। क़दम-क़दम पर काफ़िरों के जुल्म व सितम का सामना था। काफ़िरों को नज्जाशी पर भी बड़ा गुस्सा आया। कुछ लोग पीछे-पीछे गये। नज्जाशी से मिले। मुसलमानों की बुराई की। उसने काफ़िरों और मुसलमानों को दरबार में बुलाया।

     हज़रत अली के भाई हज़रत जाफ़र ने दरबार में ख़ुत्बा दिया। खुत्बा बड़ा ज़ोरदार और असरवाला था। उन्होंने अपने ख़ुत्बे में बताया कि “इस्लामी तहरीक (आन्दोलन) से पहले अरब की क्या हालत थी। कैसी गन्दगियों और किन बुराइयों में वहाँ के लोग फंसे हुए थे, फिर अल्लाह ने उनके बीच रसूल भेजा। इस पाक नबी ने उनको अल्लाह की राह दिखाई, मूर्तिपूजा छुड़ाई, आपस में मेल-जोल से रहना सिखाया। सच बोलना, दूसरों का माल बेईमानी से न खाना, मज़लूमों की मदद करना, जुल्म का मज़बूती से मुक़ाबला करना, अल्लाह के भेजे हुए दीन पर चलना और ऐसी ही बहुत-सी अच्छी बातें बतायीं। हमारी काया पलट गई। हम अंधेरे से उजाले में आ गये। सच्चाई को हमने दोपहर के सूरज की तरह देख लिया, जान लिया। हमारा यही जुर्म है जिसकी वजह से हमारे मुल्क और शहरवालों ने, ख़ानदान और घरवालों ने हमको सताना शुरू कर दिया। अपने दीन के लिए जिस राह को हमने अपने लिए ठीक समझा है, हम उस पर चलने के लिए घरबार छोड़ने के लिए तैयार हो गए। यहां चले आये। तो, अब ये हमको यहां भी पनाह नहीं लेने देते।

    ” नज्जाशी पर इस खुत्बे का बड़ा असर पड़ा। वह रोने लगा, उसने मुसलमानों से कहा, “आप मेरे देश में चैन से रहिए। आपको कोई न सतायेगा।" काफ़िर अपना-सा मुंह लेकर लौट आए।

    बाईकाट

    दुश्मनों को इस पर बड़ा गुस्सा था। कमज़ोर और बे-सहारा लोग नज्जाशी के दरबार में पहुँच गये। नया दीन फैलता जा रहा था। हमज़ा' और 'उमर' तक मुसलमान हो गये। मुसलमानों की तादाद बराबर बढ़ रही है। उनके गिरोह से निकल कर लोग अल्लाह के दीन में आते जा रहे थे।

    'बनी हाशिम' में जो मुसलमान हो गये हैं और जो अभी मुसलमान नहीं हुए हैं वे भी खुल्लम-खुल्ला मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का साथ दे रहे थे। उनकी एक नहीं चलती। चचा, बाप-दादा के धर्म पर हैं, फिर भी भतीजे के लिए सब कुछ सहने को तैयार हैं। उनका गुस्सा इन्तिहा को पहुँच गया।

     ‘बनी हाशिम' का बाईकाट कर दिया जाये – पूरा बाईकाट - न उनको लड़कियां दी जायें न उनकी लड़कियां ली जायें। उनके साथ लेन-देन, मेल-जोल, उठना-बैठना, खाना-पानी सब एकदम बन्द। एक अहदनामा लिखा गया। काबा के दरवाज़े पर लटका दिया गया। 

    'बनीं हाशिम' एक घाटी में कैद थे, उसका नाम 'शेबे अबी तालिब' (अबूतालिब की घाटी) है। अनाज बन्द, पानी बन्द, ज़रूरत की तमाम चीजें बन्द। छोटे-छोटे बच्चे भूख से बिलखते, पत्तियां तथा जड़ी-बूटियां खाकर दिन काटते। हफ़्ते-महीने इसी हाल में बिताते रहे। प्यारे रसूल ने इस हालत में भी अपना काम न छोड़ा। कड़ी आज़माइश थी जिसमें पूरा ख़ानदान पड़ा हुआ था, लेकिन वे अपनी जगह पर अटल थे, उनकी एक ही धुन थी। घाटी से बाहर आते, दीन फैलाते, लोगों से कहते-फिरते कि

     “इन बेबस मूर्तियों के आगे सिर न झुकाओ, इबादत के क़ाबिल तो सिर्फ अल्लाह है। उसका कोई साझी नहीं। मैं उसका बन्दा और रसूल हूँ। दो साल से ज़्यादा इसी हालत में बीत गये। इतने दिन औरतों और बच्चों ने, बूढ़ों और जवानों ने वह तक्लीफें सहीं कि ख़ुदा की पनाह ! 

    काफ़िर समझते थे इस बाईकाट से बनी हाशिम' का हौसला पस्त हो जाएगा, वे प्यारे रसूल का साथ छोड़ देंगे। फिर आप उनका साथ छूटने के डर से मूर्तियों की बुराई छोड़ देंगे, वह पुकार जिससे उनके दिल कांपते थे, मक्का की पहाड़ियों में न गूंजेगी। लेकिन यह कुछ न हुआ। आपने अपना काम धीमा न किया, बल्कि रफ़्तार तेज़ ही होती गई। काम आगे बढ़ता ही रहा। दीन फैलता ही रहा।

    मुखालिफ़ों में कुछ लोग ऐसे भी थे जिनका दिल अन्दर से पुकारता था, “यह जुल्म सही नहीं, यह बच्चों का बिलखना, बूढ़े मर्दो और औरतों का एक चूंट पानी और एक सूखी खजूर के लिए तरसना और उस पर ठट्ठा लगाना बड़ा जुल्म है, इसे ख़त्म होना चाहिए, इसकी मुखालफ़त में आवाज़ न उठाना निकम्मापन है।" वे इकट्ठे हुए। पांच आदमी थे। रात को उन्होंने तै किया, 

    “कल बातचीत हो। उस ज़ालिमाना अह्दनामा के टुकड़े उड़ा दिये जायें, जो काबा के द्वार पर लटक रहा है, बाईकाट ख़त्म हो।” सवेरा हुआ।

    काबा में काफ़िर इकट्ठे थे। उनमें से एक ने बातचीत शुरू की-“हम खाते-पीते हैं और ‘बनी हाशिम' भूखे मर रहे हैं।” अबू जहल बीच में बोल उठा-“तुम ही ‘बनी हाशिम' की हिमायत करने आए हो।" दूसरे ने कहा,

    “ये ठीक कहते हैं। यह जुल्म अब नहीं सहा जाएगा।" तीसरे, चौथे और पांचवें ने भी साथ दिया। इसी गिरोह में और भी लोग थे जिनका दिल अन्दर से कहता था कि यह अन्धेर है, इसे ख़त्म होना चाहिए। प्यारे रसूल की सच्चाई, नेकी और अल्लाह की राह में दुख झेलना, आपकी इन खूबियों से दुश्मन भी असर लिए बिना नहीं रह सकते थे। अब चारों ओर से लोग पुकारने लगे, “अहदनामे को फाड़ डालो। बाईकाट ख़त्म हो। अल्लाह का करना, काबा के दरवाज़े की तरफ़ लोग बढ़े, तो क्या देखते हैं कि सादा काग़ज़ दीमक चाट गई, सिर्फ़ अल्लाह का नाम बाक़ी है, जो झूठ था मिट गया, जो सच था बाक़ी रहा।बाईकाट ख़त्म हो गया। 

    लेकिन अभी प्यारे नबी को दीन की राह में बड़ी-बड़ी मुसीबतें उठानी थीं। हिजरत से तीन साल पहले शव्वाल के महीने सन् 620 ईसवी में चचा अबू तालिब भी इस दुनिया से चल बसे। वह जब तक जिंदा रहे, काफ़िरों की हिम्मत न हुई कि आप पर हाथ डालें। उनके मरते ही पापियों के रास्ते की यह रुकावट भी जाती रही। उन्होंने मरते वक़्त ख़ानदान वालों को बुलाया। उनसे कहा, “तुम लोग जब तक इनका कहा मानोगे, भले रहोगे। तुम्हारी भलाई इसी में है कि इनके बताए हुए रास्ते पर चलो। इनका कहना मानो।" यह इशारा था प्यारे रसूल की तरफ़। मरते वक़्त चचा अबू तालिब की उम्र 50 साल थी। 

    चचा अबू तालिब के इंतिक़ाल के कुछ ही दिन बाद बीबी ख़दीजा का भी इंतिक़ाल हो गया। इंतिक़ाल के वक़्त उनकी उम्र 65 साल थी। प्यारे ढाढ़स देती, दीन की तब्लीग़ में अपनी अक़्ल के मुताबिक़ राय देतीं। रसूल से शादी के बाद वह 24 साल 6 महीने जिंदा रहीं। बीबी ख़दीजा जब तक जिंदा रहीं, हर मुसीबत में वह प्यारे रसूल को जी-जान से अल्लाह का हुक्म बजा लाने और उसकी मरज़ी दूसरों को बताने में आपके साथ थीं।

    इन दोनों के इंतिक़ाल के बाद तो आप पर मुसीबतों की बारिश शुरू हो गई। नौबत यहां तक पहुँची कि आप जब नमाज़ पढ़ते तो ज़ालिम आपके सिर पर मिट्टी डाल देते, या जानवर की ओझ और इस तरह अपने लिए दोज़ख़ की आग का इंतिज़ाम करते, और कम-अक़्ल ऐसे कि इन हरकतों पर खुश होते

    ताइफ़ में

    अल्लाह का सन्देश आपको पहुँचाना ही था। भटके हुओं को राह पर लाने और इन्सानों की जिंदगी संवारने के लिए भेजे ही गये थे। अब मक्का की एक-एक चीज़ आपकी दुश्मन हो रही थी। आपको अपनी जान की भी फ़िक्र न थी। उसकी हिफ़ाज़त करनेवाला तो अल्लाह था। मुसीबतों और खतरों से आप डरनेवाले न थे। आपको इस बात की फ़िक्र थी कि कुछ लोग साथ देने वाले मिल जायें तो मैं अपना काम करूं, लोगों तक अल्लाह का सन्देश पहुँचाऊं, बात कहने की आसानी हो, बुरा-भला कहने और परेशान करने से काफ़िरों को कोई रोक सके, तो ये लोग देखें और समझें और सीधा रास्ता इनको दिखाई दे।

    मक्का के दक्खिन-पूरब में कोई पचास मील दूरी पर एक शहर है। उसका नाम 'ताइफ़' है। गर्मियों में लोग यहां सैर को जाया करते थे। जैसे हमारे यहाँ नैनीताल और मसूरी जाते हैं। बड़ी रौनक़दार जगह है, अमीरों की बस्ती थी। प्यारे रसूल ने सोचा, वहाँ जाऊं, कोई भला आदमी मेरी बात सुन ले और साथ देने पर तैयार हो जाए, तो अल्लाह का सन्देश पहुँचाने में आसानी होगी। ताइफ़ को मर्कज़ बनाकर काम जारी रखा जाएगा। आप वहाँ गये। उन्होंने आपकी बात पर कान धरने के बदले आपका मज़ाक़ उड़ाया।

    बुरे बच्चों और दुष्ट लोगों को आपके पीछे लगा दिया। उन पापियों ने आपको बहुत सताया। एक दीवार से टेक लगाकर खड़े हो गए। यह दो आदमियों के घर की दीवार थी जो हक़ीक़त में मक्का के रहने वाले थे। वे काफ़िर थे, आपकी बात न मानते थे, लेकिन आपकी नेकी का सिक्का उनके दिलों पर जमा हुआ था। उन्होंने पापियों के उस गिरोह से आपका पीछा छुड़ाया। 

    ताइफ़ के लोगों का यह व्यवहार देखा तो आप फिर मक्का लौट आए, लेकिन अब वहाँ काफ़िरों की बन आई थी। चचा अबू तालिब और बीबी ख़दीजा इस दुनिया से जा चुके थे। कौन था जो आपका साथ देता, दुश्मनों के मुक़ाबले में आपको बचाने के लिए सब कुछ सहता। लेकिन आपने हिम्मत न छोड़ी। अल्लाह का सन्देश तो हरहाल में पहुँचाना ही था। दो-चार आदमियों के पास आपने कहला भेजा,

     “अगर आप मक्का आएँ तो वे आपको पनाह दें, ताकि आप अपने रब का सन्देश लोगों तक पहुँचायें, इसलिए कि बुरे लोगों में से कुछ ऐसे होते हैं कि नेकी का जज़बा उनके दिल में राख के ढेर में चिंगारी की तरह दबा रहता है। बुराइयों में घिरे रहे चिंगारी बुझ गई। अच्छाई की हवा चली, चिंगारी भड़क उठी।

    आपका सन्देश मुतइम बिन अदी' के पास पहुँचाया गया। उसने कहा,

    "मैं पनाह देने को तैयार हूँ।" और जिरह पहनकर बाहर आये। हाथ में तलवार थी। घर के दूसरे लोग भी साथ थे, सब हथियारबन्द थे। इन लोगों के साथ प्यारे रसूल मक्का में दाखिल हुए। अबू जहल बहुत गुस्सा हुआ, बिगड़कर मुतइम से पूछने लगा, “मुसलमान हो गये हो या इनको सिर्फ़ पनाह मुतइम ने कहा, “अरबों की रस्म के मुताबिक़ यह मेरी पनाह है।" यह वही मुतइम बिन अदी था जिसने बाइकाट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।

    प्यारे रसूल ने अपना काम जारी रखा। जो मिलता उससे फ़रमाते,

    "इबादत के लायक़ सिर्फ अल्लाह है। उसका कोई साझी नहीं। ये मूर्तियां और उसका रसूल हूँ।”

    इस क़ाबिल नहीं कि इंसान का माथा इनके आगे झुके। मैं अल्लाह का बंदा

    अंसार मुसलमान होते हैं

    हज का दिन आता तो मक्का में बड़ी चहल-पहल और घमा-घमी हो जाती। पूरे अरब का मेला सा लग जाता। दूर-दूर से लोग आते। हर क़िस्म के खेल, तमाशे होते। हर क़बीले का अलग-अलग पड़ाव होता। लोग एक-दूसरे से मिलते, बातें करते, बाज़ियां लगाते, दिल बहलाव का सामान होता, हज के बाद भी मक्का के आस-पास की जगहों पर, जो क़ाफ़िलों की राह में पड़ते, कई मेले लगते थे।

    इस मौक़े पर आपकी कोशिश बढ़ जाती थी। आप हर गिरोह के पास जाते, हर क़बीले के लोगों से मिलते, अपनी बात कहते। सच्ची बात सबके कानों तक पहुँचाते। रसूल थे, अपना फ़र्ज़ पूरा करते। अल्लाह की बड़ाई बयान करते। वैसे भी जो बाहर से आता मक्का में एक ही नई बात मालूम होती।

     बनी हाशिम में एक नौजवान है। वह कहता है, 'मैं अल्लाह का बंदा हूँ। उसका रसूल हूँ। अल्लाह एक है। उसका कोई साझी नहीं। मूर्तिपूजा छोड़ दो। यह कोई बात नहीं कि बाप-दादा बुरी राह पर चलते रहे हों तो तुम भी उसी राह पर चलते रहो। मरने के बाद पूछ-गच्छ होगी। जो भलाई करेगा इनाम पायेगा, जो बुराई करेगा दोज़ख़ की आग में जलेगा।

     अबू जहल और अबू लहब कहते फिरते, “देखो, यारो! तुमसे एक इंसान की मुलाक़ात होगी, वह तुम्हारे पास ज़रूर आयेगा। मूर्तियों को बुरा कहता है। बाप-दादा जिस धर्म पर चलते आये हैं उसको मिटाना चाहता है। नया दीन फैलाने की धुन में है शायर या फिर पागल है। (तौबा-तौबा) तुम उसकी बात पर ध्यान न देना। इन बातों का उल्टा असर होता। लोगों को चिंता हो जाती कि देखें कौन शख़्स है, क्या कहता है। सच्चाई का यही हाल होता है। दोस्त तो खैर अपना हक़ अदा ही करते हैं, दुश्मन नुक्सान पहुँचाना चाहते हैं, उल्टा उससे फ़ायदा पहुँचता है।

    यसरिब जिसको अब हम मदीना कहते हैं, उस वक़्त वहाँ अरबों के दो बड़े क़बीले आबाद थे। एक का नाम 'औस' था और दूसरे का नाम 'खज़रज'। इस शहर में यहूदी भी आबाद थे। जैसा कि अरब के अन्य क़बीलों का हाल था, वे दोनों क़बीले भी आपस दोनों क़बीले भी आपस में लड़ा करते। अभी कुछ ही दिन हुए थे कि इन दोनों में बड़ी लड़ाई हुई थी और दोनों तरफ़ के बहुत-से आदमी मारे गये थे। 

    ये लोग मुसलमान हुए, उन्होंने अल्लाह का दीन फैलाने में जी-जान से मदद की। इसलिए उनको अंसार कहा जाने लगा।

    हज के मौक़े पर सारे अरब से लोग आया करते थे। मदीने से भी आते थे, आप उनके पास भी गए। अल्लाह ने उनको सच्चा रास्ता दिखाया, कुछ लोग मुसलमान हो गए। इन मुसलमान होनेवालों की तादाद कुल 6 थी। दूसरे साल यानी नुबूवत के बारहवें साल सन् 621 ई. से अंसार में से 12 आदमी आये। मुसलमान हुए। अह्द किया कि “किसी को ख़ुदा का साझी न बनायेंगे। चोरी और बुरे काम नहीं करेंगे। अपनी औलाद की हत्या से बचेंगे। किसी पर झूठा इल्ज़ाम न लगायेंगे। प्यारे रसूल की किसी भले काम में नाफ़रमानी न करेंगे।"

    आपने मुस्अब बिन उमैर को क़ुरआन की तालीम देने के लिए उनके साथ भेजा। उनको सब लोग वहाँ पढ़ाने वाला कहते थे। वह लोगों को कुरआन पढ़ाते, दीन की बातें सिखाते, अल्लाह के बताये हुए ढंग पर खुद चलते। लोग उनको देखकर अच्छी बातें सीखते। मुसअब बिन उमैर की बातें सुनकर साद बिन मुआज़ मुसलमान हुए। उनकी गिनती मदीने के बड़े लोगों में थी। उनके मुसलमान होते ही मदीने के घर-घर में दीन फैल गया। वहाँ न कोई मर्द बचा, न औरत, जवान, बुड्ढे, लड़के सब मुसलमान गए। दीन फैलाने में असअद बिन जुरार नाम के अंसारी ने बड़ा हिस्सा लिया। उनकी कोशिश से हर घर में रौशनी पहुँची, सबने सीधा रास्ता पाया।

    दूसरे साल हज के मौके पर मुसलमान मदीने से मक्का आये। उनके साथ वे लोग भी थे जो अभी मुसलमान नहीं हुए थे। मुसलमानों ने आपसे कहला भेजा कि हम तंहाई में आपसे मुलाक़ात करना चाहते हैं, कुछ बातें करनी हैं। इस मुलाक़ात के लिए वह जगह तै हुई जिसको ‘अक़बा' कहते थे। ईदुल-अज़हा (बक़रईद) के दूसरे दिन रात के सन्नाटे में, एक तिहाई पहर बीतने के बाद दबे पावं अंसार का गिरोह घाटी में इकट्टा हुआ। मर्द और औरतें सभी थे। प्यारे रसूल की राह देखी जाने लगी। वादे के मुताबिक़ आप तशरीफ़ लाये। आपके चचा अब्दुल मुत्तलिब के बेटे अब्बास भी थे। वह अभी तक मुसलमान नहीं हुए थे। फिर भी इसलिए आए थे कि अंसार से जो बात-चीत होती है वह भरोसे के क़ाबिल है या नहीं। उन्हीं ने सबसे पहले बात-चीत शुरू की। बोले,

     “ऐ ख़ज़रज के लोगो ! तुम्हें मालूम है मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हमारे कौन हैं! हम उन लोगों के ख़िलाफ़ इनकी मदद के लिए सब कुछ सहते रहे हैं, जो हमारी ही क़ौम के लोग हैं, और मज़हब के मामले में हमारी उनकी राय भी एक है। हमने इनके लिए मुसलमान न होने पर भी, न अपनी क़ौम की परवाह की, न अपने ईमान की। हमारे नगर में यह इज़्ज़तदार ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, महफूज़ हैं, फिर भी यह अब तुम्हारे शहर जाना चाहते हैं। तुममें शामिल होने पर इन्हें इसरार है। मेरा कहना यह है कि अगर तुम अपना वादा पूरा करने का पक्का इरादा रखते हो, दूश्मनों के ख़िलाफ़ इनकी मदद की हिम्मत तुममें है, तो इनको ले जाओ। और अगर यह ख़्याल हो कि यह जब हमें छोड़कर, अपना शहर और अपने वतन से हिजरत करके, तुम्हारे यहां पहुंचे तो तुम कुरैश के दबाव में आकर इन्हें दुश्मनों को दे दो, तो इससे बेहतर यह है कि तुम अभी से साफ़ जवाब दे दो। ये हमारे बीच हर तरह अमन में हैं और इज़्ज़त के साथ हैं।"

    मदीने के लोगों ने आप की तरफ़ देखा। एक ने कहा, “ऐ रसूलल्लाह ! हम तो आप की ज़बान से सुनना चाहते हैं कि आप हम से क्या अह्द लेना चाहते हैं।" 

    आपने अपने उसूलों के मुताबिक़ कुरआन पाक की कुछ 'आयतें' पढ़ीं। अल्लाह की इबादत और उसकी इताअत पर उभारा, फिर बोले, “मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे अपने बाल-बच्चों और घरवालों की तरह अज़ीज़ समझो, जो उनके लिए करते हो, मेरे लिए करो, जितनी हिफ़ाज़त उनकी ज़रूरी समझते हो उतनी मेरी ज़रूरी समझो।

    " अंसार ने कहा, "हम इसका अह्द करते हैं। आप को मालूम है कि हमको लड़ने-मरने में तकल्लुफ़ नहीं होता। फिर आपके लिए दुश्मनों से झगड़ा करना, दीन के रास्ते में सर-धड़ की बाज़ी लगाना, हमारा फ़र्ज़ है, हम पीछे न रहेंगे।”

     एक ने कहा, “ऐ अल्लाह के रसूल, एक बात के लिए हम और इत्मीनान चाहते हैं। अब तक यहूदियों से हमारा ताल्लुक़ था, आपके लिए हम उनसे कट रहे हैं। कल अल्लाह आपके दीन को ग़ालिब कर दे और आप हमको छोड़कर अपने ख़ानदानवालों से आ मिलें?'' आपने जवाब दिया, “मैं तुम्हारा हूँ, तुम मेरे हो। जिससे तुम्हारी लड़ाई है, उससे मेरी लड़ाई। जिससे तुम्हारी सुलह, उससे मेरी सुलह है।" फिर आपने उनमें से बारह आदमियों को चुन लिया और उनके ज़िम्मे यह काम किया कि अपने क़बीले के लोगों को दीन की बातें बतलाएं, अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ चलना सिखायें। इसके बाद आपने उन लोगों को इजाज़त दी कि अपने डेरे पर वापस जायें और आराम करें।

    कुरैश को रात के वाक़िए की कुछ सुन-गुन मिल गई थी, उनमें खलबली मच गई। अन्सार के डेरे पर पहुँचे। पूछ-गच्छ की, लड़ाई की धमकी दी। कुछ पता न चला, लौट आये। जब अन्सार वहाँ से मदीना चले तो ठीक-ठीक बात का पता चला, अब क्या कहते।

    इसके बाद आपने मुसलमानों को खुली इजाज़त दे दी कि मदीना चले

    जायें। इन सब बातों ने कुरैश की नींद हराम कर दी । उन्होंने समझ लिया, अब मुसलमान मजबूरों और बे-सहारों का गिरोह नहीं, बल्कि अरब में एक भारी ताक़त बनते जा रहे हैं। और एक दिन आएगा जब ये हमसे मैदान लेंगे, इसलिए वे 'दारुन्नदवा' में जमा हुये। 'दारून्नदवा' उनका क्लब घर था, वहीं जमा होते। कोई ख़ास बात होती तो आपस में सलाह करते। वहाँ इस बार भी वे सब जमा हुए। सोचने लगे कि क्या किया जाये। अब तो ये दरिया की तरह बढ़ते जा रहे हैं। एक दिन था कि इनकी सुननेवाला कोई न था।

    सफ़ा पहाड़ की चोटी से पहली बार जब इस नये दीन की पुकार हमारे कान में पहुंची थी तो हम समझे थे कि यह आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर रह जायेगी और इसकी गूंज पहाड़ों तथा तराइयों में गुम हो जायेगी। लेकिन आज हम देखते हैं कि यह आवाज़ दिलों में उतरती जा रही है। हमें आज ही इसका फैसला करना है कि इस आवाज़ को कैसे बन्द किया जाये। यह पुकार किस तरह धीमी पड़े, (तौबा, तौबा) उनके सर पर एक बौखलाहट सवार थी।

     एक ने कहा-“हम उन्हें गिरफ़्तार कर लें। एक शख़्स हर वक़्त उनका पहरा देता रहे, तब फिर ये क्या कर पाएँगे।" एह बूढ़ा बोला- “मस्ख़रो ! अब तो उनके बहुत से साथी हो गये हैं, फिर उनके ख़ानदान वाले भी तो हैं। आयेंगे, तुम्हारी कोठरी के किवाड़ तोड़ डालेंगे और उनको निकाल ले जायेंगे। तुम मुंह देखते रह जाओगे।" दूसरा बोला- “तो फिर हम उनको देश-निकाला दे देंगे। उनका दीन फैले या कुछ भी हो, हमारे यहां से तो झंझट ख़त्म होगा।" 

    बूढ़े ने कहा-“तुम लोग बड़े मूर्ख हो। तुमको मालूम है कि उसकी बातों में जादू का असर है। उसका दीन जंगल की आग की तरह फैलता जा रहा है। तुम उन्हें देश निकाला करोगे और वे पूरे अरब को अपना हिमायती बनाकर इस शहर में दाख़िल होंगे। वह वक़्त हम सबके लिए बहुत बुरा होगा।”

     अब अबू जहल की बारी थी। वह दुष्ट प्यारे नबी को सताने और इस्लाम की मुख़ालफ़त में सदा आगे-आगे रहा करता था। उसने कहा-“मैं ऐसा उपाय बताऊं जो कभी नाकाम न हो। हर क़बीले से एक-एक नव-जवान नंगी तलवार हाथ में ले। सब इकट्ठा होकर उन पर हमला करें और (तौबा-तौबा) उनको क़त्ल कर डालें। फिर उनके ख़ानदान वालों की कैसे हिम्मत पड़ेगी कि बदला ले सकें। किस-किस से लड़ाई मोल ले सकेंगे।”  सबको यह राय पसन्द आयी, एक दिन तै हो गया।

    हिजरत

    आपको कुरैश की इस साज़िश का हाल मिला। हिजरत के लिए अल्लाह का हुक्म आ चुका था। आप हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ के पास गये। उनको बतलाया कि मक्का छोड़ने की इजाज़त मिल चुकी है। उन्होंने भी साथ चलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। आपने उनको इजाज़त दे दी। यह तै हुआ कि जिस रात को कुरैश के नव-जवानों ने अपनी साज़िश पूरी करने का इरादा किया है, उसी रात को सफ़र शुरू किया जाये। सच्चे दीन का चिराग़ बुझाने का नापाक इरादा दिलों में लिये काफ़िर मौके की ताक में दुबके खड़े थे। 

    प्यारे रसूल ने हज़रत अली को हुक्म दिया कि आपके बिस्तर पर आपकी चादर ओढ़ कर सो रहें। सवेरे उठ कर लोगों की अमानतें वापस करके तब मदीने आयें। मक्का के काफ़िर आपके दुश्मन थे, लेकिन आपकी ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि जिन चीज़ों को अपने हुए डरते थे, उनको आपके पास बे-फ़िक्र होकर रख जाते थे, और ज्यों-की-त्यों वापस पाते थे। आपको पसन्द न था कि उन लोगों की चीजें भी बर्बाद हों, या उनको ठीक से वापस न मिलें जो आपके खून के प्यासे थे। आपने लोगों को बतलाया कि अमानत को इधर-उधर करना बड़ा पाप है।

    घर से निकले और सीधे हज़रत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) के पास आए, थोड़ा-सा सफ़र का ख़र्च साथ लिया गया। हज़रत अबू बक्र ने ऊंटनी सफ़र के लिये देनी चाही। आपने कहा, "क़ीमत ले लो, लूंगा।" वह मजबूर होकर मान गये। वहाँ से चलकर सौर पहाड़ की एक गुफ़ा. में पहुँचे, उस गुफा में तीन दिन रहे। हज़रत अबू बक्र के लड़के अब्दुल्लाह दिन भर काफ़िरों की बातें सुनते और शाम के वक़्त आकर आप लोगों को हाल देते कि आपकी खोज और गिरफ़्तारी की यहाँ तैयारियां हो रही हैं।

     हुआ यह था कि रात भर काफ़िर नौजवान आप के घर का पहरा देते रहे। सवेरे क्या देखते हैं कि प्यारे रसूल के बिस्तर से उनके बदले हज़रत अली उठ रहे हैं। बहुत खिसियाए, “यह क्या? हम सबको बड़ा धोखा हुआ।" लोग ढूंढने निकल पड़े। सौ ऊंट इनाम का है। बड़ी खलबली मच गई, जो सोचा था कुछ न हो सका।

     आमिर बिन फुहैरा हज़रत अबू बक्र के गुलाम थे। दिन भर बकरियां चराते। शाम को उन्हें गुफा के मुंह पर ले आते।  दूध दुहकर आप दोनों को देते। बकरियों के आने-जाने से हज़रत अब्दुल्लाह और चरवाहों के अलावा कोई और आया था। के पैरों के निशान मिट जाते। किसी को पता न चलता कि यहां तक बकरियों तीन दिन के बाद गुफा से निकले। दो ऊंटनियां मौजूद थीं। उन पर सवार हुए। अब्दुल्लाह बिन उक़ित नाम का एक शख़्स, जो रास्ते को खूब अच्छी तरह जानता था, आगे-आगे था। आमिर बिन फुहैरा को हज़रत अबू बक ने अपने पीछे बिठलाया, रास्ते में मदद मिलेगी।

    आप रबीउल अव्वल को सोमवार के दिन 'जुहर' के वक़्त मदीना पहुँचे। उस समय आपकी उम्र 52 साल की थी। दीन का संदेश मक्का से मदीना पहुँचा। मदीने से सच्चे दीन की रौशनी अरब ही नहीं, दुनिया के दूर-दूर के हिस्सों में पहुँची। सैकड़ों कौमों और बहुत-से मुल्कों पर इस्लाम का असर पड़ा।

    आपके मक्का से मदीना जाने की तारीख़ से इस्लामी सन् का हिसाब शुरू हुआ। इसको हिजरी सन् कहते हैं।

    सोमवार, 8 रबीउल अव्वल (20 सितम्बर, सन् 620 ई.) को आप कुबा पहुँचे, सोमवार से जुमा तक चार दिन आप वहाँ ठहरे, एक मस्जिद की नींव रखी। 

    अल्लाह ने क़ुरआन में इस मस्जिद का ज़िक्र किया है, और बताया है कि इसकी नींव नेकी और तक़वा पर रखी गयी थी। हर मुसलमान को दिल में कम-से-कम एक बार उसमें नमाज़ पढ़ने की तमन्ना करनी चाहिये।

    वहाँ से आगे बढ़े, रास्ते में एक तराई थी, कुबा और मदीना के ठीक बीचों बीच, यहां जुमा की नमाज़ पढ़ी। जुमा की यह पहली नमाज़ थी। इसमें सौ आदमी शामिल हुये। नमाज़ से पहले आपने ख़ुत्बा दिया।

    चौथे दिन आगे बढ़े। मदीना के औरत, मर्द, बूढ़े-जवान लड़के सब ही आपका इन्तिज़ार कर रहे थे। आंखें रास्ते पर लगी हुई थीं। आपको देखकर लोगों के चेहरे चमक उठे। पूरी बस्ती में खुशी की लहर दौड़ गई। मक्का से आप जुमेरात यानी पहली रबीउल अव्वल को चले, सोमवार, 12 रबीउल अव्वल को दिन में मदीना पहुँचे। (25 सितम्बर सन् 622 ई.) आप की उम्र उस वक़्त लगभग 53 साल की थी।

    हिजरत के बाद

    मदीना का पुराना नाम यरिब है। यहां अरबों के दो क़बीले रहते थे, एक का नाम था औस', दूसरे का ख़ज़रज'। उनमें सदा लड़ाई ठनी रहती थी। बहुत छोटी-छोटी बातों पर खून की नदियां बह जाती थीं। अन्सार ही नहीं, इस्लाम से पहले सब ही अरबों का यही हाल था। किसी ने अपने बाप-दादा की तारीफ़ कर दी, दूसरा झगड़ पड़ा। किसी का घोड़ा दूसरे के घोड़े से आगे निकल गया, लड़ाई छिड़ गई। किसी की ऊंटनी दूसरे के खेत में पड़ गई, तलवारें म्यान से बाहर निकल आयीं। ये दोनों क़बीले भी बहुत दिनों से लड़ते चले आ रहे थे, उनमें बहुत बड़ी लड़ाई हो चुकी थी। मदीना पहुँचे तो आपने उन लोगों को समझाया-

     “यह क़बीला-वबीला कुछ नहीं। तुम सब आपस में भाई-भाई हो। सब मिलकर अल्लाह के दीन की मदद करने वाले हो। दीन फैलाने में अपना और पूरी दुनिया के सुधार में मेरा साथ देनेवाले हो। अब सब झगड़े ख़त्म। अब तुम सब मिलकर एक गिरोह ‘अंसार' हो।"

    इस तरह अल्लाह के दीन ने इनको सदा के लिए जोड़ दिया। मदीना में यहूदी भी बसते थे, वे आमतौर से महाजनी का धन्धा करते थे, उस वक़्त भी उनका वही पेशा था। अंसारी खेती-बाड़ी करते, क़र्ज़ वगैरह की ज़रूरत होती तो यहूदियों के पास जाते। ये लोग बिना सूद के क़र्ज़ न देते।

    आपने यहूदियों और आस-पास के अरब क़बीलों से एक समझौता
    किया, सारी शर्ते लिखी गयीं। शर्ते ये थीं :-

    1. यहूदी अपने धर्म पर रहेंगे, मुसलमान अपने दीन पर।

    2. समझौते में जो लोग शामिल हैं उनमें से किसी पर जुल्म होगा तो दूसरे लोग उसकी मदद करेंगे।

    3. जुल्म व सितम के कामों में साथ नहीं दिया जायेगा चाहे किसी की तरफ़ से हो।

    4. यहूदी अपने ढंग से धन्धे करेंगे, मुसलमान अपने उसूल के मुताबिक़ रोज़ी

    5. किसी भी इख़्तिलाफ़ के बढ़ने पर आख़िरी फैसला अल्लाह और उसके रसूल का होगा, उसको सब मानेंगे।

    6. मक्का के मुश्रिकों तथा उनके हिमायतियों को पनाह नहीं दी जायेगी। मदीने पर हमला हो तो यहूदी मुसलमानों के साथ लड़ाई करेंगे। 

    7. समझौते में यहूदियों को भी शामिल रखा जायेगा। आप चाहते थे कि पड़ोसियों के साथ झगड़े-बखेड़े ख़त्म हो जायें।

    मुसलमान अल्लाह के दीन पर चलें। पड़ोसी भी अच्छी बातें सीखें। मदीने पर हमला हो तो बचाव अच्छी तरह हो सके।

    'मुआख़ात' या भाईचारा

    आपकी हिजरत से पहले मुसलमान मदीना आने लगे थे। आपके आने के बाद तो उनका तांता बंध गया। घर-बार छूटता, ज़िन्दगी भर की गृहस्ती और गाढ़े पसीने की कमाई भी छिन जाती। लेकिन इन अल्लाह के बन्दों को ईमान इतना प्यारा था कि उसके आगे हर चीज़ छोटी दीख पड़ती। उन्हें न खानदान की, न रिश्तेदारों की फ़िक्र, न घर-बार और वतन की फ़िक्र।

    अल्लाह के हुक्म पर चलने और उसी के मुताबिक़ पूरी ज़िन्दगी को ढालने का इरादा उन्हें खींचे लिए जा रहा था। ये न धन के लिए मदीने जा रहे थे, न इज्ज़त और शोहरत के लिए। उनको तो बस दीन की तब्लीग़ की धुन लिए जा रही थी।

    ऐसे भी थे जो मुश्रिकों के पंजे में फंसे हुए थे, हिजरत नहीं कर सकते थे। । उनका जुर्म सिर्फ़ यह था कि वे उस सच्चाई की गवाही देते थे जिस पर ज़मीन, आसमान और इस कायनात का एक-एक ज़र्रा गवाह है। हर घड़ी उनके दिल से यह सदा उठती-“ऐ मालिक! हमें इस बस्ती से निकाल, यहां के लोग बड़े ज़ालिम तथा बे-दर्द हैं।"

    मदीना में पांच महीना रहने के बाद आपने ‘अंसार' और 'मुहाजिरीन' का भाईचारा करा दिया। आप एक मुहाजिर और अन्सारी का हाथ पकड़ते और मिलाते, साथ ही कहते जाते-“तुम दोनों भाई हो। सब मुसलमान भाई-भाई हैं।” इस भाई बनने को हमारी तारीख़ में मुआख़ात' कहते हैं।

    इस तरह जिन लोगों में भाईचारा कराया गया, उनकी तादाद सौ थी। आधे मुहाजिर और आधे अन्सार। अन्सारों ने अपने इन दीनी भाइयों को, जिनसे किसी क़िस्म का दुनिया का रिश्ता नहीं था, अपने घरबार जायदाद सब में बराबर का साझी बना लिया।

    हिज्जतुल विदाअ (अन्तिम हज)

    'ज़िलहिज्जा' सन् 10 हि. में आपने 'हिजरत' के बाद अपना पहला और आख़िरी हज किया। इसको हिज्जातुल विदाअ या रुखसती का हज इस वजह से कहते हैं कि इसमें जो तक़रीर आपने की थी उसके शुरू में इस तरफ़ इशारा भी था कि यह आपका आख़िरी हज है।

    25 ज़ी-क़ादा को आप मदीने से चले। 4 ज़िलहिज्जा को सुबह में इतवार के दिन आप मक्का में दाखिल हुए। आपके साथ लगभग 10 हज़ार मुसलमान हज के लिए आए थे। मक्के में और लोग भी शामिल हो गए। इस तरह यह तादाद बहुत ज़्यादा हो गई। इस मौके पर आपने एक ख़ुत्बा दिया।

    कुरैश और पूरे अरब में फैले हुए बहुत से चलन व रिवाज की बुराई करते हुए इस्लामी उसूलों का निचोड़ सबके सामने रख दिया। 

    आपने फ़रमाया :-

    (1) लोगो ! ध्यान से सुनो और याद रखो । एक मुसलमान की जात, जायदाद, इज़्ज़त, आबरू दूसरे के लिए उसी तरह मानने लायक़ है जिस तरह तुम आज के दिन, इस महीने और इस जगह की इज़्ज़त करते हो। अल्लाह तुम्हारे हर अमल का हिसाब लेगा। 

    (2) जिस तरह तुम्हारे लिए औरतों के कुछ फ़र्ज़ हैं, उसी तरह औरतों के बारे में तुम्हारे भी कुछ फ़र्ज़ हैं। उनके साथ नर्मी.का बर्ताव करना और उनके सिलसिले में अल्लाह से डरते रहना।

    (3) गुलामों के साथ भी अच्छा बर्ताव करना। जो ख़ुद खाओ वही उनको भी खिलाना। जो ख़ुद पहनो वही उनको भी पहनाना। उनसे कोई भूल-चूक हो तो माफ़ करना। या बहुत गुस्सा हो तो उनको अलग कर देना। वे भी अल्लाह के बन्दे हैं। उन पर जुल्म न करना।

    (4) न कोई अरबवाला किसी बाहरवाले से बढ़कर है, न कोई बाहरवाला किसी अरबवाले से बढ़कर है। सब मुसलमान आपस में एक-दूसरे के बराबर हैं। हाँ, तुम में से जो अल्लाह से ज़्यादा डरेगा उसका दर्जा अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा ऊंचा होगा।

    (5) मैं तुम्हारे बीच अल्लाह की पाक किताब कुरआन छोड़े जाता हूँ। अगर तुम इसको मज़बूती से थामे रहोगे तो मेरे पीछे कभी गुमराह न होगे।

    (6) लोगो ! नफ़्स की ख़्वाहिशों का छोड़ना, मुसलमानों का भला चाहना और आपस में मेल-जोल से रहना- ये तीन उसूल वे हैं जिनकी पाबन्दी से दिल साफ़ रहता है।

    (7) तुम्हारा फ़र्ज़ है कि यह सन्देश उन लोगों तक पहुँचा दो जो यहां मौजूद नहीं हैं। क्योंकि बहुत-से सुननेवाले, बोलनेवाले के मुक़ाबले में ज़्यादा याद रखनेवाले होते हैं। इसके बाद आपने लोगों से पूछा, “क़ियामत के दिन तुमसे अल्लाह पूछेगा, मैंने उसके हुक्म तुम तक पहुँचाये थे या नहीं ? तो तुम क्या जवाब दोगे?' सबने एक आवाज़ में कहा, 

    “ऐ अल्लाह के प्यारे रसूल ! हम लोग गवाह हैं कि आपने अल्लाह के हुक्म हम तक पहुँचा दिए और रसूल होने के नाते अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया।"

    यह सुनकर आपने आसमान की तरफ़ देखा, हाथ उठाए और तीन बार फ़रमाया, “ऐ अल्लाह ! तू भी गवाह रह।

    वफ़ात

    12 रबीउल अव्वल सन् 11 हि. (8 जून 632 ई.) सोमवार के दिन शाम को चाँद के हिसाब से 63 वर्ष की उम्र में आपने इस दुनिया को छोड़ दिया।  पहले मर्ज़ की हालत में एक दिन आप मिम्बर पर आये और फ़रमाया-

    “ऐ मुहाजिर लोगो! इन्सान के साथ भलाई का सुलूक करना। अब मुसलमानों की तादाद बढ़ रही है, लेकिन मेरे पहले मददगार यही लोग हैं। इन्हीं के घर मैंने पनाह लिया। इनमें से जो भले हैं उन पर एहसान करना और जिनसे कुछ भूल-चूक हो जाये उनको माफ़ करना। मेरे घरवालों की इज़्ज़त का भी ध्यान रखना, और सीधी हिदायत पर जमे रहन

    मुसलमानों के आम इज्लास से यह आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का आख़िरी ख़िताब था।












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