मर्तबए शहादत
الخمدلله الذي اكرام الشهداء بالحياة، بقوله ولاتقولوالممن يقتل في سبيل الله
آوات. والصلوة والسلام على صاحب الشفاعات وعلى اله واصحابة الذين فازوا
بالشهادات۔ اما بعد فاعوذ بالله من الشيطن الرجیم بسم الله الرحمن الرحيم - ولا
تحسين الذين لوا في سبيل الله أمواتا بل أحياء عند ربهم يرزقون (پ:4 ع ۸)
صدق الله العلي العظيم وصدق رسوله النبي الكريم ونحن على ذلك لمن
الشاهدين والشاکرین والحمدلله
زب الغلمین۔
एक मर्तबा हम और आप सब लोग मिल कर मक्का के सरकार मदीना के ताजदार दोनों आलम के मालिक व मुख्तार जनाब अहमदे मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के दरबार में बुलंद आवाज़ से दुरूद व सलाम का नजाना और हदिया पेश करें।
अल्लाहुम्मा् स़ल्लि अ़ला सय्यिदिना मुह़म्मदिवॅं व अ़ला आलि सय्येदिना मुहम्मदिन कमा स़ल्लेता् अ़ला सय्यिदिना इब्राहिमा् व अ़ला आलि सय्यिदिना इब्राहिमा् इन्नका् हमीदुम मजीद
अल्लाहुम्मा् बारिक अ़ला सय्येदिना मुहम्मदिवॅं व अ़ला सय्यिदिना मुह़म्मदिन कमा बारक-ता् अ़ला सय्यिदिना इब्राहिमा् व अ़ला आलि सय्यिदिना इब्राहिमा् इन्नका् हमीदुम मजीद
शहादत आख़िरी मंज़िल है इंसानी सआदत की
वो खुश किस्मत हैं मिल जाए जिन्हें दौलत शहादत की
शहादत पा के हस्ती जिंदए जावेद होती है
ये रंगीं शाम सुब्हे ईद की तम्हीद होती है
दुनिया के लिहाज़ से इंसान के मुख़्तलिफ दर्जे हैं, कोई चौकीदार है तो कोई कानेस्टबल, कोई सब-इंक्सपेक्टर है तो कोई एस0 पी0 यहां तक कि कोई वज़ीरे आज़म है तो कोई सदर जमहूरिया। और बाज़ इंतिहाई जिल्लत व पस्ती में हैं जैसे कोढ़ी वगैरा कि इन के घर वाले भी इन से नफरत और घिन करते हैं।
इसी तरह इस्लामी एतबार से भी इंसान की दो किस्में हैं, एक मुस्लिम दूसरे काफिर । काफिरों में भी मुख़्तलिफ दर्जे हैं, उन में मुर्तद सब से बदतर काफिर है कि उसे जीने का भी हक नहीं है। और मुसलमानों में सब से ऊंचा दर्जा सैय्यिदुर रुसुल नबिय्युल अंबिया जनाब अहमदे मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम का है। फिर रुसुले इज़ाम का फिर दीगर अंबियाए किराम अलैहिमुस सलातु वस्सलाम का, फिर सिद्दीकीन फिर शुहदा और फिर सालिहीन यानी औलियाए किराम का रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम। फिर औलियाए किराम में भी गौस, कुतुब और अब्दाल व औताद वगैरा मुख़्तलिफ दर्जात हैं और फिर उलमाए इस्लाम हैं वह भी मुख्तलिफ दर्जे वाले हैं, फिर मोमिन मुत्तकी हैं, फिर फासिक और
मुसलमानों में सब से कम दर्जा गुमराह व बद मज़हब का है जिस की बद मज़हबी हद्दे कुफ को नहीं पहुंची है।
नबी उस मोहतरम हस्ती को कहते हैं जिस पर अल्लाह तआला की जानिब से वही नाज़िल की गई हो, इबादत व रियाज़त से कोई नबी नहीं हो सकता बल्कि अल्लाह तआला अपने फल से जिसे चाहता है नुबुव्वत से सरफराज़ फरमाता है। मगर हमारे नबीए अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के बाद अब कोई नबी नहीं हो सकता कि वह ख़ातिमुल अंबिया हैं और सिद्दीक़ या वली बनना भी बड़ा मुश्किल काम है, और शहीद बनना आसान भी है और मुश्किल भी। मुश्किल तो इस लिहाज़ से है कि इंसान को अपनी जान बहुत ज्यादा प्यारी होती है और आसान इस एतबार से है कि थोड़ी ही देर में दर्जए शहादत हासिल हो जाता है यानी शहीद एक ही जस्त में ज़मीन की पस्ती से आसमान की बुलंदी पर पहुंच जाता है।
अब्दुल कैय्यूम का वाकिआ
1934 का वाकिआ अब्दुल कय्यूम का मशहूर है जो विक्टोरिया गाड़ी चलाता था, जो कोचवानी करके अपनी और अपने घर वालों की रोजी हासिल करता था, उस की रात झोंपड़े में बसर होती थी और दिन विक्टोरिया चलाने में। घोड़े की लगाम पकड़े पकड़े उसकी हथेलियों का
चमड़ा मोटा और खुरदुरा हो गया था। पूरे शहर कराची में जहां वह रहता था कोई उस का हमदर्द व गमगुसार नहीं था अगर कोई उस का दोस्त और शनासा था तो उसका प्यारा घोड़ा मोती था।
अब्दुल कय्यूम को मालूम हुआ कि एक शख्स ने अपनी किताब में सरकारे अक्दस सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम की शान में गुस्ताखी व बे अदबी की है जिस पर मुकद्दमा चल रहा है और आज उस की तारीख है, वह फौरन विक्टोरिया लेकर कचहरी की तरफ चल पड़ा, एक किनारे अपनी गाड़ी खड़ी की और फातिहाना शान की तरह चल कर जज के कमरे में पहुंच गया जो आदमियों से खछा ख़छ भरा हुआ था। दो अंग्रेज़ अभी कानूनी दफआत का चेहरा देखने में लगे हुए थे कि उस ने इस तरह चाकू मारा जो उसः की गर्दन में उतरता चला गया. लाश तड़प कर ठंडी हो गई और अब्दुल कय्यूम ने बगैर किसी मुज़ाहमत के अपने आप को पुलिस के हवाले कर दिया।
अब्दुल कय्यूम जो अपने ही शहर में अजनबी था और कोई उसे जानता पहचानता न था थोड़ी ही देर में सिर्फ कराची नहीं बल्कि पूरा हिन्दुस्तान उसे जान गया और सारे मुसलमानों की मुहब्बतों का मर्कज़ बन गया, उस जमानत पर छुड़ाया गया और मुकद्दमा शुरू हुआ, वक्त के माहिर कानून दानों, बड़े बड़े वकीलों और बैनल अक्वामी शोहरत रखने वाले बैरिस्टरों ने अब्दुल कैय्यूम के मुकद्दमे की पैरवी करनी चाही और उस से कहा बस अपना बयान ज़रा बदल दो हम तुम्हें बचा लेंगे।
कहने वालों ने बहुत कहा; मिन्नत समाजत करने वालों ने बहुत मिन्नत समाजत की मगर अब्दुल कैय्यूम के पास हर शख्स के लिये सिर्फ एक ही जवाब था कि मैं ने जान बूझ का मर्तबए शहादत ख़रीदा है, आप इस नेअमत से मुझ को महरूम करने की कोशिश न करें मैं इक्बाले बयान बदल कर अपनी आकिबत नहीं ख़राब करूंगा। अब्दुल कय्यूम की रिहाई के लिये मस्जिदों में दुआएं की गई, औरतों ने मिन्नतें मानी और बूढ़ों के लरज़ते हाथ, नौजवानों के दिल और बच्चों की उदासियों ने मालिके. हक़ीकी से उस की जिंदगी की भीक मांगी मगर अब्दुल कैय्यूम ही की तमन्ना पूरी हुई। कानून के मुहाफिज़ों ने उस की मौत का हुक्म सुना दिया, वह मौत कि जिस पर हर दिल गमज़दा और हर घर मातम कदा बना हुआ था जैसे कि यह उसी के घर का अलमिय्या हो। फिर जब अब्दुल कय्यूम का जनाज़ा उठा तो उस में 25 लाख से ज़्यादा आदमी शरीक हुए, छतों और बाला ख़ानों से औरतें आंचलों से आंसू पोछती जाती थीं और फूल निछावर करती जाती थीं। कराची की तारीख़ गवाह है इस से पहले किसी भी शख्स के जनाजे में इतने इंसान नहीं शरीक हुए। फिर यह तो इंसानों की तादाद थी जो 25 लाख से जाइद थी और फिरिश्ते कितने करोड़ थे फिर महबूबे काइनात सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने किस प्यार व मुहब्बत से अब्दुल कैय्यूम को खुश आमदेद कहा होगा? उसे कौन जान सकता है?
रहमतुल्लाहि तआला अलैह।
देखा आप ने वह अब्दुल कय्यूम कि जो विक्टोरिया चलाता था, कोचवान था, पूरे शहर में उसे कोई जानता पहचानता नहीं था, लोगों के लिये अजनबी था, समाज और मुआशरे के पस्त तबके का एक ना काबिले तवज्जोह आदमी था मगर एकी ही जस्त में रिफ्तों की सारी मंज़िलों को तैय कर लिया और थोड़ी ही देर में उस मकामे रफी को पा लिया कि जहां बरसहा बरस के मुजाहिदों और जिंदगी भर की रियाज़तों के बाद भी हर इंसान नहीं पहुंच पाता।
ये रुत्वए बुलंद मिला जिस को मिल गया हर शख़्स के नसीब में दारो-रसन कहां और जब अब्दुल कैय्यूम जैसा एक मामूली इंसान राहे हक में शहीद होकर लोगों के दिलों की धड़कन बन गया तो हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जो महबूब खुदा सैय्यिदुल अंबिया सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के नवासे हैं, अली मुर्तज़ा के लख्ने जिगर हैं और फातिमा ज़हरा के नूरे नज़र हैं और जो तमाम अज़ीज़ व अकारिब यहां तक कि जवान बेटे अली अक्बर और शीर-ख्वार साहिब ज़ादे की दर्दनाक शहादत के बावजूद हिम्मत नहीं हारे और राहे हक़ में कुर्बान हो गए वह शहीद हो कर हमेशा के लिये मुसलमानों की दिलों की धड़कन बन गए और उनकी मुहब्बतों के मर्कज़ बन गए।
यही वजह है कि हर साल जब उन की तारीखे शहादत करीब आती है और मुहर्रम का चांद नमूदार होता है तो पूरा माहौल सोगवार हो जाता है, उन की याद लोगों के दिलों को तड़पा देती है, जगह जगह उन के ज़िक की मज्लिसें काइम होती हैं, खाने खिलाए जाते हैं, खिचड़े पकाए जाते हैं, सबीलें काइम की जाती हैं और तरह तरह से उन की बारगाह में नन व नियाज़ पेश की जाती हैं और इंशा अल्लाह यह सिलसिला कियामत तक ऐसे ही जारी रहेगा, यज़ीदियों की हज़ार मुखालिफतों के बा वजूद कभी नहीं मिटेगा
रहेगा यूं ही उन का चर्चा रहेगा
पड़े ख़ाक हो जाएं जल जाने वाले
صلى الله على النبی الامی و اله صلى الله تعالى عليه وسلرصلاة وسلام عليك يارسول الله
सल्लल्लाहु अलन् नबिय्यिल् उम्मियी व आलिही सल्लल्लाह तआला
अलैहि व सल्लम, सलातंव् व सलामन् अलैक या रसूलल्लाह।
Eventually Martyrdom
المدلله الذي اكرام الشهداء الحياة، وله ولاتقولوالممن يقتل ي سبيل اللهوات. والصلوة والسلام لى احب الشفاعات وعلى اله واصحابة الذين ازوا
الشهادات۔ اما د اعوذ الله من الشيطن الرم سم الله الرحمن الرحيم - ولا
سين الذين لوا ي سبيل الله مواتا ل ياء ند ربهم يرزقون (پ:4 )
دق الله العلي اليم وصدق رسوله النبي الريم ونحن لى لك لمن
الاهدين والشاکرین والحمدلله
الغلمین۔
Once upon a time, we and all of you, together with the Government of Mecca, the Tajdar of Medina, both the owner of Alam and Mukhtar Janab Ahmade Mujtaba Muhammad Mustafa Sallallahu Ta'ala Alaihi Wa Sallam, should offer Nazana and Hadiya of Durood and Salam with a loud voice in the court.
ل الله لی النبی الامی واله لى الله الى ليه وسلرملاوسلام ليك يا رسول الله
sallallahu alnabiriyal ummiyi wa alalihi sallalla taala aleihi wa sallam salatam wa salam alaq ya Rasulullah.
Martyrdom is the last destination of human sacrifice
Those are the happy fortunes to be found, who have sacrificed their wealth.
The person of martyrdom is alive Javed
This colorful evening is the morning of Eid
From the point of view of the world, human beings have different status, some are watchmen, some are constables, some are sub-inspector, some are SP, even some are Wazire Azam and some are Sadar Jamhuria. And the eagles are in great disgrace and hatred, like lepers, etc., that even their family members hate and despise them.
Similarly, there are two types of human beings from Islamic tradition, one Muslim and the other Kafir. Even among the infidels, there are different statuses, the worst among them is the infidel, that he does not even have the right to live. And the highest rank among Muslims is that of Sayyidur Rusul Nabiyul Ambiya Janab Ahmade Mujtaba Muhammad Mustafa Sallallahu Taala Alaihi Wa Sallam. Then Rusule Izam, then Digar Ambiyae Kiram Alaihimus Salatu Wassalaam, then Siddiqin then Shuhada and then Saliheen i.e. Auliyaye Kiram's Raziallahu Taala Anhum. Then in Auliyah Kiram also Ghaus, Qutb and Abdal and Outad etc. are of different status and then there are Ulamay Islam, they are also of different status, then there are Momin Muttaki, then Fasik and
The lowest status among Muslims is that of misguided and bad religion, whose bad religion has not reached the limit of Kuf.
The prophet is called the most beloved person on whom the same has been revealed by the knowledge of Allah, no one can be a prophet by worship and mercy, but Allah Ta'ala with his fruit, whoever wishes to prophesy. But after our prophet Akram sallallahu alaihi wa sallam, there can be no prophet now that he is Khatimul Ambiya and becoming a Siddiq or Wali is a very difficult task, and becoming a martyr is both easy and difficult. The difficulty is in the sense that a person loves his life very much and it is easy because the recorded martyrdom is achieved in a short time, that is, the martyr reaches the height of the sky in a single zinc from the ground.


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