हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और क़ौमे आद का वाकया || Hazrat Hood Alaihissalam
शद्दाद का हाल
तारीख़ लिखने वालों ने शद्दाद का ज़िक्र हज़रत हूद के बयान के बादकि या है, इसलिए कि उसका ताल्लुक़ भी आद क़ौम ही से था, ताकि ईमानवा ले उससे नसीहत हासिल करें ।। आद क़ौम में शद्दाद और शदीद दो भाई थे, जो बड़े दौलतमंद बादशाह थे। शाम (सीरिया) मुल्क में इनकी बादशाही मानी हुई बादशाही थी । शदीद और उसके लोग, अगरचे शिर्क़ में मुब्तला थे और ख़राब अक़ीदा रखते थे, लेकिन उसके इंसाफ़ से शेर और बकरी एक जगह पानी पीते थे।
कहा जाता है कि उसकी अदालत में दो आदमी आये। इन दोनों में एक ने बताया कि मैंने इस आदमी से ज़मीन का क़ितआ ख़रीदा और क़ीमत देकर उसपर क़ब्ज़ा कर लिया। फिर मैंने उस ज़मीन में एक ख़ज़ाना पाया जो मैं इसको देना चाहता हूँ। इसलिए कि मैंने सिर्फ़ ज़मीन ख़रीदी है, ख़ज़ाना नहीं ख़रीदा है, लेकिन यह लेता नहीं। दूसरे ने कहा, मैंने तो ज़मीन बेच दी, अब ज़मीन और जो कुछ इसमें है, सब इसका है। इसलिए ख़ज़ाना भी इसी का है, मैं उसे क्यों लूं ? लेकिन इसकी समझ में यह छोटी-सी बात नहीं आती। कैसा था यह अजीब व ग़रीब मुक़द्दमा! अदालत ने पूछा, यह बताओ, तुम दोनों के पास कोई औलाद है ? एक ने कहा, एक लड़का है, दूसरे ने कहा, एक लड़की है। ख़जाना इन दोनों के हवाले कर दो। अदालत ने फ़ैसला सुनाया, तुम दोनों को आपस में ब्याह दो और यह ऐसा था वह इंसाफ़ पसंद राजा! ईमान न लाया और अपने बाप-दादा के धर्म शिर्क पर ही मरा।
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हज़रत हूद अलै. ने उससे भी ईमान लाने की बात कही थी, पर वह शदीद के बाद शद्दाद गद्दी पर बैठा। हज़रत हूद अलै. ने उससे भी ईमान लाने की बात कही। बोला, अगर मैंने तुम्हारा दीन क़बूल कर लिया तो उसका फ़ायदा क्या है हज़रत हूद ने फ़रमाया, अल्लाह तुम्हें इसके अज्र के तौर पर जन्नत अता फ़रमायेगा, उसकी रहमतें तुम पर नाज़िल होंगी। शद्दाद बोला, यह सब कुछ नहीं। मैं तो ख़ुद अपनी जन्नत बनाऊंगा और दिन-रात वहाँ ऐश मनाऊंगा। फिर शद्दाद ने जन्नत बनाने का प्रोग्राम बना लिया। पूरे मुल्क से सोना-चांदी, हीरे-जवाहर, मुश्क-अंबर और मरवारीद के ढेर लग गये। एक ख़ूबसूरत जगह भी तलाश कर ली गयी।
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माहिर कारीगर जमा किये गये और एक मज़बूत इमारत की नींव डल दी गयी। एक ग़रीब की उम्मीदों से भी बड़ी लम्बाई, करीमों की हिम्मत से भी ज़्यादा बुलंदी वाली दीवारें तैयार होने लगीं-ब-इंतिहा ख़ूबसूरत और साफ़-सुथरी इमारत तैयार होने लगी कि आज तक ऐसी इमारत कभी तैयार न हुई। दीवारों में सोने-चांदी की ईंटें चुनी गयी थीं, छत उस की सोने के पत्तों से सजायी गयी थी, स्तून उसके बिल्लौरी थे और हर जगह बड़े सुन्दर ढंग से जोड़े गये थे। उनकी नहरों में रेत के बजाय अनमोल मोती बिछाये गये थे, उसके पेड़ों में मुश्क और अंबर भरवा दिया था। जिस वक़्त ख़ुश्क हवा इन पेड़ों से होकर गुज़रती थी, तो रहने वालों के दिमाग़ ख़ुश्बू से भर जाते थे। उसकी ज़मीन को मिट्टी से पाटने के बजाय मुश्क व अबर से बिछवाया था । बारह हज़ार कंगूरे उसके महलों के चारों तरफ़ बनवाये गए थे।
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कंगूरों को सुर्ख सोनों से सजाया गया था। महल में ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत लड़कियों को लाकर ठहराया। यह मनमोहक बाग़ पांच सौ वर्ष में तैयार हुआ, पूरे मुल्क के जवाहरात इसमें लग गये। जब महल बनकर तैयार हो गया, तब शद्दाद को इसकी ख़बर दी गयी। शद्दाद एक भारी फ़ौज ले कर चला कि वह उस जन्नत को देखे और वहाँ क़ियाम करे। अभी वह एक फ़र्लांग ही चला था कि वहीं डेरा डाल दिया। इरादा था कि अब अगले दिन सफ़र शुरू होगा। इसी बीच उसे एक हिरन नज़र आया। उसके पांव सोने के थे, सींग सोने के और आखें याकूत की थीं। शद्दाद उसे देख कर हैरान रह गया, अकेला ही घोड़ा दौड़ा कर उसके पीछे चल पड़ा। जब लश्कर से बहुत दूर निकल गया तो उसे एक भयानक क़िस्म का सवार नज़र आया उसने पूछा-
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'क्या इस इमारत बनाने से तुझे अमान मिल जायेगी या तू इसमें रहकर हमेशा-हमेशा के लिए ऐश कर करना चाहता है ?
शद्दाद कांप गया, पूछा तू कौन है ?
बोला, मैं मलकुल मौत (मौत का फ़रिश्ता) हूँ।
शद्दाद ने गिड़गिड़ाकर उससे अर्ज़ किया, मुझे एक नज़र अपनी उस जन्नत को देख लेने दे, फिर उसके तुरंत बाद ही मेरी जान निकाल लेना।
बताया, यह तो रब का हुक्म है, मैं तो एक लम्हा भी मुहलत देने से मजबूर हूँ। यह कह कर उसने उसकी जान निकाल ली, जिस्म बे-जान होकर रह गया, तमन्ना दिल की दिल में धरी रह गयी।
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तारीख़ की किताबों में लिखा है कि एक बार अल्लाह की ओर से इज़राईल से पूछा गया कि तू मुद्दतों से लोगों की रूह क़ब्ज़ करता है, बता क्या कभी तूने किसी पर रहम भी किया है और उसकी जान निकालते वक़्त तुझे दया भी आयी है ?
बोला, ख़ुदावंद! मैं तो सब पर दया करता हूँ।
फ़रमाया, किस पर ज़्यादा दया की।
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तब इज़्राईल ने बताया कि एक दिन एक कश्ती को मैंने आप ही के हुक्म से तोड़ दिया था और मौज़ों में घिरकर वह कश्ती हमेशा के लिए तबाह हो गयी, उसपर सवार तमाम लोग भी ख़त्म हो गये, हां सिर्फ़ एक औरत बचा ली गयी, जिसके पेट में बच्चा था। औरत को फ़रिश्तों ने एक जज़ीरे में पहुँचा दिया, वहीं उसने एक लड़का जन्म दिया। आपका हुक्म हुआ कि उस औरत की भी जान निकाल लो और लड़के को वहाँ उस औरत के पहलू में डाल दो। उस वक़्त मेरी आंखों से आंसू निकल आये कि इस लड़के का क्या होगा, यह तो तड़पकर मर जायेगा या इसे दरिंदे खा जायेंगे। ख़ुदावंदा ! यही सोचकर मैं रो दिया। मुझे एक तो उस बच्चे पर दया आयी थी और दूसरे अब आयी, जब शद्दाद की रूह क़ब्ज़ करने का हुक्म दिया गया कि उस बेचारे ने कई सौ साल में तो इमारत बनवायी थी, लेकिन वह उसे एक नज़र भी न देख सका और उसकी हसरते दिल की दिल ही में रह गयीं।
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अल्लाह ने फ़रमाया कि यह शद्दाद वही लड़का है जिसपर तूने दया की थी। मैंने उसकी मां के मरने के बाद सूरज और हवा को हुक्म कर दिया था कि इसे अपनी गर्मी और सर्दी से मत सताना, बल्कि फूलों के पत्ते उड़ाकर उसके वास्ते फ़र्श बनाओ। फिर उसके दोनों अंगूठों से दूध और शहद की नहर बहायी। इस तरह मैंने उसकी जान बचायी, पाला-पोसा, यहां तक कि उसे हुकूमत का मालिक बना दिया- इतना सब करने के बाद भी मेरी नाशुक्री नाज़िल करने लगा, बल्कि ख़ुद ख़ुदा बनने का दावा कर बैठा। उस पर तो ग़ज़ब होना ही चाहिए था।
नऊजुबिल्लाहि मिन ग़ज़बिल्लाह.
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