हिंदी
300 सहाबा और बहुत बड़ी मछली
हज़रते सय्यिदुना अबू अब्दुल्लाह जाबिर बिन अब्दुल्लाह رضي الله عنه फ़रमाते हैं, "इमामुल मुबल्लिगीन, सरवरे दुन्या-व-दीन महबूबे रब्बुल आलमीन ﷺ ने हम तीन सौ अफ़राद को कुरैश के मुक़ाबले पर भेजा और हज़रते सय्यदुना अबू उवैदह رضي الله عنه को हमारा सिपहसालार मुकर्रर फ़रमाया और हमें खजूरों की एक बोरी बतौरे जादे राह इनायत फ़रमाई। हज़रते सय्यदुना अबू उबैदा رضي الله عنه, हमें (रोज़ाना) एक एक खजूर अता फरमाते ।
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पूछा गया, “आप हज़रात एक खजूर से कैसे गुज़ारा करते थे ?" तो फ़रमाया, "हम उस को चूसते जिस तरह बच्चा चूसता है और ऊपर से पानी पी लेते । तो वोह उस रोज़ रात तक हमें काफी हो जाती। हम अपने नेज़ों से दरख़्त के पत्ते (जिन्हें ऊंट खाया करते हैं) गिराते और उन्हें पानी में भिगो कर खा लेते फ़रमाते हैं, "हम साहिले समुन्दर से गुज़र रहे थे कि दूर से साहिल पर रेत के बड़े टीले की तरह की कोई चीज़ नज़र आई। हम क़रीब पहोंचे तो देखा कि वोह जानदार (का मुर्दा) है जिसे अंबर (मछली) कहा जाता है
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हज़रते सय्यिदुना अबू उबैदह رضي الله عنه ने फ़रमाया, “येह मुरदार है।" फिर खुद ही फ़रमाया, "नहीं बल्कि हम रसूलुल्लाह ﷺ के भेजे हुए हैं ओर हम राहे खुदा में घरो से निकले हैं। और आप हज़रात इतिरारी हालत में हैं इस लिये इसे खा लीजिये। हमने एक महीने इस पर गुज़ारह किया और हम तीन सौ आदमी थे हत्ता कि हम फ़रबा हो गए। मुझे याद है कि हम उस की आंख के गढ़े से मटके भर भर कर चरबी निकालते और हम उस मछली से बैल जितने बड़े बड़े टुकड़े काटते उस मछली की आंख का हल्का इतना बडा था कि हज़रते सय्यदुना अबू उबैदह ने हम में से 13 आदमियों को उस की आंख के गढ़े में बिठा दिया तो सब समा गए
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उस की एक पस्ली को पकड़ कर कमान की तरह खड़ा किया फिर एक बड़े ऊंट पर कजावा कसा और वोह उस पस्ली की कमान के नीचे से गुज़र गया। और हमने उस के खुश्क गोश्त के टुकड़े बतौरे ज़ादे राह साथ रख लिये। जब हम मदीनए मुनव्वरा पहोंचे तो सरकारे मदीना ﷺ की खिदमत में हाज़िर हुए और आप ﷺ से इस का ज़िक्र किया। तो आप ने फ़रमाया, “वोह रिज़्क था जो अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिये पैदा फ़रमाया, क्या तुम्हारे पास उस गोश्त में से कुछ है? अगर हो तो हमें भी ख़िलाओ । हमने हुजूरे पाक ﷺ की खिदमत में उस मछली का गोश्त भेजा तो आपने तनावुल फ़रमाया ।
(सहीह मुस्लिम जिल्द : 2 सफ़्हा : 147 हदीस नंबर : 1935)
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أربي
قصة 300 من الصحابة والسمكة الكبيرة جدًا
يروي حضرة سيدنا أبو عبد الله جابر بن عبد الله ، "أرسلنا الإمام المبليجين ، سروار دنيا ودين محبوب ربه العلمين ، ثلاثمائة منا ضد قريش وحضرة سيدنا أبو عويضة بصفتنا شرطيًا وشرطيًا لدينا. كما قال جايد راح عناية. حضرة سيدنا أبو عبيدة ، كنا نحصل على موعد كل يوم ، وسئلنا كيف جنيت المال من نخيل التمر؟ كان يكفينا حتى تلك الليلة. كنا نترك أوراق الشجرة التي تأكلها الإبل من أعيننا ونأكلها بعد نقعها في الماء ونقول ، "كنا نمر عبر البحر من بعيد." شيء مثل كبير ظهر الكثبان الرملية في الساحل. عندما اقتربنا ، رأينا أنها جثة كائن حي يسمى العنبر.
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قال حضرة سيدنا أبو عبيدة: هو الفاني ، ثم قال هو نفسه: "لا ، لكننا أرسلنا رسول الله وخرجنا من بيوتنا في رحي الله. قضينا شهرًا عليه ، وكنا ثلاثمائة". لقد انفجرنا بعيدًا. أتذكر أننا اعتدنا على إخراج الدهون من فتحة عينه عن طريق ملء جرة مليئة بالدهون ونقطع السمكة إلى قطع بحجم الثور. كان ضوء عينه هكذا كبير أن حضرة سيدنا أبو عبيدة جعل 13 منا جالسًا في حفرة عينه ، ثم تمكنا جميعًا من إمساك أحد ضلوعه وجعله يقف كقوس ، ثم كاجاوة على جمل كبير كاسا ومر تحت ذراع ذلك الضلع. واحتفظنا بقطع لحمه الجافة على طول الطريق. وعندما وصلنا المدينة حضرت الحكومة المدينة المنورة وفعلت ذلك فقلت: هذا هو الرزق الذي خلقه الله تعالى لك. ، هل لديك أي من تلك اللحوم؟ إذا كان الأمر كذلك ، فأطعمنا أيضًا. أرسلنا لحم تلك السمكة لصالح حزور باك ، فأبدت التوتر. وهو مذكور من:
(صحيح مسلم المجلد: 2 الصفا: 147 حديث رقم 1935):
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ENGLISH
300 Sahaba and the Big Fish
Hazrat Sayyiduna Abu Abdullah Jabir bin Abdullah narrates, "Imamul Muballigeen, Sarwar Dunya-wa-Din Mehboob Rabbul 'Alameen sent three hundred of us against the Quraysh and Hazrat Sayyiduna Abu Uwaidah was our constable and our constable. As jade rah inayat said. Hazrat Sayyiduna Abu Ubaidah, we were given a date every day. We were asked, “How did you make money with a date palm?” Then he said, “We suck it like a child sucks and from above If we drank water, it would have been enough for us till that night. We would drop the leaves of the tree which camels eat from our eyes and eat them after soaking them in water and say, "We were passing through the sea from afar." Something like a big sand dune appeared on Sahil. When we got closer, we saw that it is the dead body of a living being called amber fish.
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Hazrat Sayyiduna Abu Ubaidah said, "He is the mortal." Then he himself said, "No, but we are sent by Rasulullah and we have come out of our homes in Rahe God. We spent a month on it and we were three hundred men that we were blown away. I remember that we used to take out the fat from the hole of his eye by filling a jar full of fat and we cut the fish into pieces as big as an ox. The light of his eye was so big that Hazrat Sayyduna Abu Ubaidah made 13 of us sit in the pit of his eye, then all of us were able to hold one of his ribs and make him stand like a bow, then kajawa on a big camel Kasa and he passed under the arm of that rib. And we kept the pieces of his dry meat along the way. When we reached Madinah, the government attended Medina Khidmat and you did. So you said, " That was the rizq that Allah Ta'ala has created for you, do you have any of that meat? If so, feed us too. We sent the meat of that fish in the favor of Huzoor Pak, so you expressed tension. It is mentioned from: (Sahih Muslim Volume: 2 Safa: 147 Hadith No. 1935):
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