बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़ने की फजीलत
(1) हज़रते सय्यदुना शेख अबुल अब्बास अहमद बिन अली बूनी رحمة الله عليه शम्सुल मआरिफ़ (मुतर्जम) के सफ़हा 37 पर लिखते हैं जो बिला नागा सात दिन तक
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم
786 बार ( अव्वल आखिर एक बार दुरूद शरीफ) पढ़े उस की हर हात पूरी हो । अब वोह हाजत ख़्वाह किसी भलाई के पाने की हो या बुराई दूर होने की या कारोबार चलने की ।
(شمس المعارف مترجم، ص۳۷)
(2) जो किसी ज़ालिम के सामने بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم
50 बार ( अव्वल आखिर एक बार दुरूद शरीफ) पढ़े उस ज़ालिम के दिल में पढ़ने वाले की हैबत पैदा हो और उस के शर से बचा रहे ।
(ऐज़न, स. 37 )
( 3 ) जो शख्स तुलूए आफ्ताब के वक्त सूरज की तरफ रुख कर के بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم
300 बार और दुरूद शरीफ़ 300 बार पढ़े अल्लाह عزوجل उस को ऐसी जगह से रिज़्क अता फरमाएगा जहां उस का गुमान भी न होगा। और रोजाना पढ़ने से إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ एक साल के अन्दर अन्दर अमीरो कबीर हो जाएगा।
(ऐज़न, स. 37 )
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(4) कुन्द ज़ेहन अगर "بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم " 786 बार (अव्वल आखिर एक बार दुरूद शरीफ) पढ़ कर पानी पर दम कर के पी ले तो إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ उस का हाफ़िज़ा मज़बूत हो जाए और जो बात सुने याद रहे।'
(ऐज़न, स. 37 )
( 5 ) अगर कहत साली हो तो بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم
61 बार अव्वल आखिर एक बार दुरूद शरीफ पढ़ें, (फिर दुआ करें) إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ 'बारिश होगी।
(ऐज़न, स. 37 )
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(6,7) بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم काग़ज़ पर 35 बार (अव्वल आखिर एक बार दुरूद शरीफ) लिख कर घर में लटका दें शैतान का गुज़र न हो और खूब बरकत हो । अगर दुकान में लटकाएं तो إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ कारोबार खूब चमके |
(ऐज़न, स. 38 )
(8) यकुम मुहर्रमुल हूराम को بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 130 बार लिख कर (या लिखवा कर) जो कोई अपने पास रखे (या प्लास्टिक कोटिंग करवा कर कपड़े, रेग्ज़ीन या चमड़े में सिलवा कर पहन ले) إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ उम्र भर उस को या उस के घर में किसी को कोई बुराई न' पहुंचे ।
(ऐज़न, स. 38)
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'मस्अला : सोने या चांदी या किसी भी धात की डिबिया में ता'वीज़ पहनना मर्द को जाइज़ नहीं । इसी तरह किसी भी धात की जन्जीर ख़्वाह उस में ता'वीज़ हो या न हो मर्द को पहनना ना जाइज़ व गुनाह है। इसी तरह सोने, चांदी और स्टील वग़ैरा किसी भी धातकी ती या कड़ा जिस पर कुछ लिखा हुवा हो या न लिखा हुवा हो अगर्चे अल्लाह का मुबारक नाम या कलिमए त्य्यिबा वग़ैरा खुदाई किया हुवा हो उस का पहनना मर्द के लिये ना जाइज़ है। औरत सोने चांदी की डिबिया में ता'वीज़ पहन सकती है।
(9) जिस औरत के बच्चे ज़िन्दा न रहते हों वोह بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم 61 बार लिख कर (या लिखवा कर) अपने पास रखे (चाहे तो मोमजामा या प्लास्टिक कोटिंग कर के कपड़े, रेग्ज़ीन या चमड़े में सी कर गले में पहन ले या बाजू में बांध ले। إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ बच्चे ज़िन्दा रहेंगे ।
(ऐज़न स. 38)
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(10) घर का दरवाजा बन्द करते वक्त याद कर के بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم पढ़ लीजिये शैतान (सरकश जिन्नात ) घर में दाखिल न हो सकेंगे I
(ماخوذاز صحیح البخاري ج۳ ص ٥٩١ حدیث ٥٦٢٣)
( 11 ) रात को खाने पीने के बरतन बिस्मिल्लाह शरीफ़ पढ़ कर ढक दीजिये, अगर ढकने केलिये कोई चीज़ न हो तो بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم
कह कर बरतन के मुंह पर तिन्का वग़ैरा रख दीजिये ।
(ऐज़न)
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मुस्लिम शरीफ़ की एक रिवायत में है, साल में एक रात ऐसी आती है कि उस में बबा उतरती है जो बरतन छुपा हुवा नहीं है या मश्क का मुंह बंधा हुवा नहीं है अगर वहां से वोह बबा गुज़रती है तो उस में उत्तर जाती है।
(12) सोने से कब्ल بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم पढ़ कर तीन बार बिस्तर झाड़ लीजिये إِنْ شَاءَ ٱللَّٰهُ मूज़िय्यात (यानी ईज़ा देने वाली चीजों ) से पनाह हासिल होगी।
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(13) कारोबार में जाइज़ लैन दैन के वक़्त यानी जब किसी से लें तो بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم पढ़ें और जब किसी को दें तो بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم कहें खूब बरकत होगी।
या रब्बे मुस्तफ़ा हमें की बरकतों से मालामाल फरमा और हर नेक व जाइज़ काम की इब्तिदा में بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيم पड़ने की तौफीक अता फरमा ।

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