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हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और क़ौमे आद का वाकया पार्ट 1 || Hazrat Hood Alaihissalam

हज़रत हूद अलैहिस्सलाम 

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अल्लाह तआला ने हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को क़ौमे आद की तरफ़ भेजा। उस क़ौम के लोग लम्बे क़द और चौड़े जिस्म वाले थे। उनमें का सबसे लम्बा 100 गज़ का और ठेंगना 60 गज़ का आदमी था। बुतपरस्ती का चलन बहुत ज़ोरों पर था। ख़ुदा को भुला बैठे थे। पत्थर काट-काट कर पहाड़ों में ख़ूबसूरत-से-ख़ूबसूरत मकान बनाते थे, लेकिन l पत्थर के काम में ये जितने माहिर थे, उतने ही पत्थर दिल भी थे। फिर भी उनमें एक गिरोह भले लोगों का भी था, जो अल्लाह पर ईमान लाया था, लेकिन ज़ालिमों के डर से अपना ईमान छिपाये हुए था। जब हज़रत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम की वाज़ व नसीहत खुलकर होने लगीं, तो ये भले लोग हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का पूरा साथ देने लगे।

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 हज़रत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का पैग़ाम ज्यों-ज्यों फैलता गया, काफ़िरों की मुख़ालफ़त भी तेज़ हो गयी। इन भले लोगों ने इसकी इत्तिला हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को दे दी। के हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुज़ूर इन दुश्मनों के लिए बद-दुआ की। चुनांचे बरसात नहीं हुई, बाग़ और खेती सब सूखने लगी। यह अकाल सात वर्ष तक चलता रहा, लोगों का बुरा हाल हो गया। भूखे-प्यासे मरने लगे मौक़ा मुनासिब समझ कर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें समझाना शुरू किया और फ़रमाया कि ईमान लाओ, अपने आपको दुनिया की इन परेशानियों से बचाओ। ये सब परेशानियां तुम्हारे कुफ्र की वजह से तुम पर आयी है। लेकिन काफ़िरों ने हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की नसीहतों पर कान न धरा, अपने कुफ्र पर डटे रहे और यही कहते रहे, हम तेरे कहने से बुतों को न छोडेंगे और अपने बाप-दादाओं के दीन से मुंह न मोड़ेंगे।

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उस ज़माने का क़ायदा था, जिसे किसी बड़ी मुश्किल का सामना होता था तो वह मक्का में काबे में जाकर दुआ करता था जो क़बूल हो जाती। उन दिनों आद क़ौम के अलावा अमालक़ा की क़ौम मक्का में रहती थी, जो अपने को मक्का का सरदार कहती थी । जब आद क़ौम के लोग इन परेशानियों के शिकार हुए तो उनके सत्तर सरदार वहाँ जाने को तैयार हो गये कि वहाँ जाकर बारिश की दुआ करें।

ये लोग जब लम्बा सफ़र तै करके मक्का पहुँचे तो माविया बिन बक्र के घर में उतरे। उसने इन सबकी खाने और शराब की ऐसी ज़ोरदार दावत की और नाच-गाने की ऐसी महफ़िल जमायी कि ये अपने आने का मक़सद ही भूल गये। बहुत दिनों के बाद उन्हें अपनी क़ौम की याद आयी। और अपने आप पर रात-दिन लानत-मलामत करते हुए वे सब दुआ में लग गये और कुर्बानियां चढ़ानी शुरू कीं। 

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लेकिन फिर भी कोई नतीजा न निकला। इन सरदारों में मुर्सद बिन मादान छिपा हुआ मुसलमान था, हज़रत हूद अलैहिस्सलाम पर उसका पूरा ईमान था। उसने खुलकर कह दिया कि जब तक तुम सब हज़रत की बातों को नहीं मानोगे, अपने मक़सद को नहीं हासिल कर सकोगे। इन लोगों ने उसका भी बाईकाट कर दिया और अपने तौर पर दुआ करते रहे।

इतने में तीन टुकड़े बादल के दिखायी दिये- सफ़ेद, काला, लाल और उन बादलों में से आवाज़ आयी कि इनमें से कोई एक टुकड़ा इख़्तियार कर लो, इसके बाद ख़ुदा के हुक्म का इंतिज़ार करो। इन लोगों ने काला बादल, पानी के बादल का रूप समझकर अपना बना लिया कि आवाज़ आयी कि तुम्हें अब काली राख बाक़ी न छोड़ेगी, बल्कि अब आद क़ौम धूल-धूल उड़ जायेगी । अल्लाह के हुक्म से वह काला बादल आद की क़ौम की तरफ़ बढ़ा। लोग काला बादल देखकर बहुत खुश हुए, लेकिन उनके मन में यह विचार आ ही न सका कि यह अज़ाब का बादल है।

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 हज़रत हूद अलैहिस्सलाम के ये इंकारी हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का मज़ाक उड़ाने के लिए कहा करते थे- बड़ा सच्चा बनता है तो ले आ न अल्लाह का अज़ाब ! हम तेरी बात कहां मान रहे हैं। लेकिन उन्हें क्या ख़बर थी कि जिस हक़ीक़त को वे मज़ाक़ समझ रहे हैं, वह हक़ीक़त बनकर सामने आ गयी है। जब हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने देखा कि अज़ाब आ गया तो अल्लाह ही के हुक्म से अपने चार हज़ार ईमानवालों को साथ लिया और बाहर निकलकर उनसे कहा कि यह दायरा जो मैंने उंगली से तुम्हारे चारों तरफ़ खींच दिया है और तुम्हें ख़ुदा ही के हुक्म से उसमें बिठा रहा हूँ ताकि तुम इस अज़ाब से बचे रहो। देखते-देखते काला बादल आंधी-तूफ़ान में बदल गया। क़ौम के लोग घबरा गये। तुफ़ान इतना ज़बरदस्त था कि इंसान तक हवाओं में उड़-उड़कर काफ़ी दूरी पर पटक-पटक उठते, हड्डियां चूर-चूर हो जातीं। लोग घबराकर घरों की तरफ़ भागे, ताकि सर छिपा सकें और तूफ़ान की इस तेज़ी से अपने को बचा सकें। जब मकान और घर गिरने-ढहने लगे तो दब-दबकर लोग मरने लगे। सात दिन और रात आंधी-तूफ़ान का यह सिलसिला चला। 

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तबाही व बर्बादी का नंगा नाच होता रहा और आद क़ौम अल्लाह के अज़ाब का शिकार होकर रह गयी। हां, हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और उनके साथी इससे बचे रहे। जब अज़ाब का सिलसिला ख़त्म हुआ तो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने एक तरफ़ को अपने रहने को मकान तैयार किये और फिर से रहने-सहने लगे। हज़रत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम चार सौ चौंसठ साल के हुए तो उनका इंतिक़ाल हो गया- इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन.

हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और क़ौमे आद का वाकया पार्ट 2

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