हज़रत नूह अलैहिस्सलाम
जब हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम ने आसमान पर क़ियाम किया तो दुनिया में फिर गुमराही और ना-फ़रमानी भर गयी, गुनाह के काम ख़ूब होने लगे। लोगों को सीधे-सच्चे रास्ते पर लाने के लिए अल्लाह तआला ने हज़रत नूह अलै. को नबी बनाकर भेजा।
हज़रत नूह ने नौ सौ पचास वर्ष की उम्र पायी। अस्सी वर्ष की उम्र में अल्लाह की वह्य आने लगी।
हज़रत नूह बराबर भलाई की बात फैलाने और बुराई को मिटाने की कोशिशें करने लगे, लेकिन उनकी क़ौम के सरदार तो ऐश में लगे हुए थे, उन्हें इन बातों से क्या लेना-देना। हज़रत नूह अल्लाह तआला से उनकी हिदायत की दुआ भी करते, लेकिन उन ज़ालिमों ने कुछ मान कर न दिया, कुफ़ और इंकार की रीति पर डटे रहे। हज़रत नूह ने बहुत समझाने की कोशिश की, काफ़ी मेहनत की, लेकिन पूरी उम्र की मेहनतों के नतीजे में अस्सी आदमियों के अलावा किसी ने इस्लाम क़बूल न किया ।
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हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है, फ़रमाया कि किसी पैग़म्बर ने अपनी क़ौम की तरफ़ से इतनी तक्लीफ़े न उठायीं, जितनी हज़रत नूह अलै. को उठानी पड़ीं। वे तो हज़रत नूह को हमेशा धमकी देते रहे कि तुम इन बातों से बाज़ आ जाओ और हमारे बुतों को बुरा-भला कहने से बचो, वरना हम तुम्हें परेशान कर डालेंगे। चुनांचे वे उन्हें अच्छी बातें सुनाने पर भरी मज्लिस में मारते, यहां तक कि वे बेहोश हो जाते और उनके लड़के उनको वहाँ से उठाकर ले आते । उनके दुश्मन मरते वक़्त अपने बेटों को वसीयत किया करते और कुफ़ पर जमे रहने की हिदायत देते हुए कहते थे-“बेटो ! हरगिज़ अपने बाप-दादा के दीन से फिरना नहीं, नूह की बात तो कभी न मानना। जहां तक हो सके उन्हें दुख और तक्लीफ़ ही देते रहना, चाहे ठिकाना जहन्नम ही में क्यों न बने।" जब ऐसे ही संगीन हालात में सात सदियां गुज़र गयीं और हज़रत नूह अलै. तंग आकर ना उम्मीद हो गये तो अल्लासह ने वह्य नाज़िल की हज़रत नूह अलै. को इससे बड़ी ढाढ़स हुई। अल्लाह ने उनसे फ़रमाया था, ऐ नूह ! तुम दिल तंग मत होना, न इन ज़ालिमों से अब कोई उम्मीद रखो। जो ईमान ले आये, ले आये; बाक़ी ईमान नहीं लायेंगे। इनके मुक़द्दर ही में जहन्नम लिख गयी है।
हज़रत नूह अलै. ने अर्ज़ किया, ख़ुदावंद! इनकी नस्ल में से कोई ईमान लायेगा या नहीं। हुक्म हुआ, ये तो ईमान न लायेंगे, इनका दिल तो पत्थर हो चुका है।
फिर भी हज़रत नूह को अपनी क़ौम से जो लगाव था, उसकी बुनियाद पर उनको एक ओर समझाया और कहा, लोगो, ईमान न लाओगे तो अब यह समझो कि अब अज़ाबे इलाही आया ही चाहता है। लेकिन इस बार भी क़ौम के सरदारों ने उसी तरह जवाब दिया और कहा, हम तो वुद्द, सुवाअ, यग्रूस और यअस (जो हमारे बुत हैं) की पूजा कभी न छोड़ेंगे और अगर तू सच्चा ही है तो अज़ाब ले आ, हमें उसका कोई डर नहीं। हज़रत नूह यह जवाब सुनकर मायूस हो गये, बड़े ही ग़म के साथ अल्लाह से गिड़गिड़ाकर अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह ! जब मैं अपनी क़ौमवालों को इस्लाम की तरफ़ बुलाता हूँ, ताकि वे अपनी ज़िंदगियां बना-संवार सकें, तो वे मुझे सुनकर नहीं देते, कानों में उंगलियां ठूंस लेते हैं, बे-तवज्जोही के लिए अपने ऊपर कपड़े डाल लेते हैं, अपने कुफ्र पर जमे रहते हैं, अब मैं क्या करूँ? बहुत मजबूर हो गया हूँ, अब तो तेरा अज़ाब आ ही जाना चाहिए, इन्हें तबाह कर दे, इनका सब कुछ ख़त्म कर दे। हज़रत नूह की दुआ से फिर उस क़ौम पर अकाल पड़ गया, यहां तक कि उनकी नस्ल की बढ़ोत्तरी का सिलसिला ही बंद हो गया इसके बाद अल्लाह के हुक्म से हज़रत जिबरील ने साज पेड़ बोने का हुक्म दिया और बीस वर्ष में उसे काफ़ी मज़बूत कर दिया। फिर अल्लाह ही के फ़रमान पर हज़रत नूह ने उसकी लकड़ी से कश्ती बनानी शुरू कर दी।
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काफ़िर पहले तो नूह अलै. को सताते रहे। जब कश्ती बनने लगी, ये मज़ाक़ बनाने लगे। कहते- 'ऐ नूह ! अब तुम नबी के दर्जे को पहुँचने के बाद, बढ़ई कब से हो गये ? क्या पैग़म्बरी के कामों से थक गए ? कश्ती तो बनाते हो, पर पानी कहां है जिसमें यह कश्ती चलेगी, क्या यह ख़ुश्की पर चलेगी! हज़रत नूह कहते- 'तुम अपने अमल के नतीजों से ग़ाफ़िल हो, आक़िबत में तुम पर क्या बीतेगी, इसे समझ नहीं रहे हो, इसलिए तुम क्या समझो इन बातों को ? फिर हज़रत नूह ने कश्ती तैयार कर ली, बहुत मज़बूत कश्ती। तख़्तों के हर जोड़ पर क़ीर का तेल लगा दिया। अल्लाह ही के हुक्म से शमशाद के तख़्तों का ताबूत हज़रत आदम की हड्डियों के लिए बानाया। फ़िर हज़रत जिब्रील ने हर जिंस के जानवर, जो ज़मीन पर थे, उनको हज़रत नूह के पास जमा किये। उन्होंने इन चरिंदों, परिदों और दरिंदों का एक-एक जोड़ा कश्ती में चढ़ाया, हज़रत नूह पर ईमान लाने वाले 82 मुसलमान भी कश्ती पर सवार हो गये। जब पूरी तैयारी हो गयी, तब अल्लाह का अज़ाब आना शुरू हुआ। भयानक अज़ाब, तनूर से फ़व्वारे की तरह पानी बहना शुरू हो गया,बारिश का पानी अलग।
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पूरी ज़मीन में पानी ही पानी भर उठा। हज़रत नूह की कश्ती समुद्र की तरह ठाठें मारते हुए उस पानी में तैरने लगी। काफ़िर भाग-भागकर इधर-उधर पनाह लेने लगे लेकिन उन्हें पनाह कहा। कश्ती पर न सवार हाने वालों में हज़रत नूह की बीवी और उका बेटा कनआन भी था। पूछा, अब क्या करोगे ? बोला, पहाड़ पर पनाह ले लूंगा। 'इसका भी कोई फ़ायदा न होगा' - हज़रत नूह ने साफ़-साफ़ बता दिया। इसी बीच पानी की एक ज़ोरदार मौज आयी और उसे डुबा दिया, वह बच न सका।
हज़रत नूह को रहम आ गया, दुआ मांगी, ख़ुदावंद ! यह बेटा मेरे अहल (घर वालों) में से है, तू अपना वादा पूरा कर ।
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हुक्म हुआ कि अहल वह है जिसके अमल भले हों, बद-अमल ना-अल है। चालीस दिन तक ज़ोरों की बारिश होती रही, ज़मीन के अंदर से भी पानी उबलता रहा। कश्ती पर सवार लोगों के अलावा इंसान, इमारतें, बाग़, पेड़ पौधे, सब डूब गये। कश्ती पर सवार लोग भी, गरचे अल्लाह पर ईमान रखते थे, उनकी रहमत की उम्मीदें रखते थे, फिर भी कभी परेशान हो जाते कि कश्ती डूब न जाए। उन्हें तस्कन देने के लिए हुक्म हुआ कि- बिस्मिल्लाहि पजरेहा व मुर्साहा. जो कोई पढ़ेगा, अल्लाह तआला उसकी तमाम मुश्किलों को हल करेगा। बहरहाल किश्ती पर सवार लोग बच गये, तूफ़ान रुक गया, पानी खिसक गया।
जब कश्ती से उतरने का वक़्त आया तो हज़रत नूह ने कव्वे से फ़रमाया, जा और पानी की हालत मालूम करके जल्द आ । कव्वा गया लेकिन मुर्दार खाने के चक्कर में जल्दी लौट कर न आया, वह भूल गया कि अल्लाह के पैग़म्बर ने क्या कहा है। हज़रत नूह अलै. ने उसके लिए बददुआक र दी और वह हमेशा के लिए ज़लील व रुसवा होकर रह गया। मुर्दार ख़ाना उसका मुक़द्दर हो गया।
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इसके बाद कबूतर को भेजा गया, वह ज़ैतून के पत्तों को चोंच में लेकर वापस हुआ। तब हज़रत नूह ने समझा कि पेड़ों के सर पानी से बाहर आ चुके हैं। अब कबूतर को ही पानी की ख़बर लाने के लिए रोज़ भेजा जाने लगा। एक दिन कबूतर के पावं में कीचड़ लगी हुई पायी गयी, तो यक़ीन हो गया कि अब अज़ाब का दौर ख़त्म हो गया है। कबूतर के हक़ में दुआ की कि वह सबके लिए प्यारा हो जाए।
लिखा है कि अल्लाह तआला ने हुक्म किया कि मैं पहाड़ी पर कश्ती को क़रार दूंगा और सब कश्तीवालों को इस पहाड़ पर उतारूंगा। आख़िरकार जूदी पहाड़ पर कश्ती रुकी, वहीं सब उतरे और एक गांव आबाद कर दिया गया। बहुत दिनों के बाद यह गांव भी वबा का शिकार होकर ख़त्म हो गया। सिर्फ़ बचे हज़रत नूह और उनके तीन बेटे-हाम, साम और याफ़्स । फिर हज़रत नूह की नस्ल में अल्लाह तआला ने ऐसी बरकत रखी कि चालीस वर्ष की मुद्दत में हज़ारों शहर आबाद हो गये। फिर हज़रत नूह ने सीरिया, फ़ारस के ज़ज़ीरे, खुरासान और इराक़ के इलाक़े का निगरां साम को बनाया और पश्चिमी इलाक़े हब्श और सिध हाम के ज़िम्मे किये चीन, तुर्किस्तान वग़ैरह याफ़्स के हवाले किया।
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एक दिन जिब्रील और इज़राईल ने हज़रत नूह से पूछा, एक लम्बी उम्र पाने के बावजूद, तुमने इस दुनिया को कैसा पाया? कहा, धुएं जैसा, कि एक जगह से चलकर दूसरी जगह से निकल आया । जब हज़रत नूह बीमार हुए और उसी में इंतिक़ाल फ़रमाया। बेटों ने आपको बैतुल-मक़िदस में दफ़न किया। बाप के मरने का ग़म बेटों पर बहुत था।
हज़रत नूह को 'आदम सानी' (द्वितीय), 'शेखुल अंबिया' और 'नजीयुल्लाह' भी कहते हैं। वह सच्चे पैग़म्बर थे। अल्लाह का पैग़ाम दूसरों तक पहुँचाते और उसकी इबादत में हमेशा लगे रहते। वह दिन में तीन सौ रक्अत नमाज़ अदा करते थे। कहा जाता है कि तूफ़ान के मौक़े पर जब कश्ती में लोग सवार थे, तो कश्ती वाले को बदबू और गंदगी से बड़ी ज़बरदस्त तक्लीफ़ हो रही थी। कोई हल समझ में न आता था। हज़रत नूह अलै. ने अल्लाह से दुआ की कि इस मुसीबत को दूर फ़रमा । हुक्म हुआ कि तुम अपना हाथ हाथी के पेट पर रखो, फिर हमारा करिश्मा देखो। हज़रत नूह के हाथ फेरते ही एक सुअर पैदा हो गया और कश्ती की सब गंदगी को उसने खाकर दूर कर दी।
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इसी तरह वे लोग चूहों से भी परेशान थे। अल्लाह के हुक्म से हज़रत नूह ने ज्यों ही शेर के माथे पर हाथ रखा, ख़ुदा की शान कि बिल्ली ने निकल कर उन्हें खा लिया।
हज़रत नूह के बांद फिर धीरे-धीरे लोग असल रास्ते से हटते गये और गुमराह होते चले गये। फिर अल्लाह तआला ने हज़रत हूद को पैग़म्बर बना कर भेजा, ताकि क़ौम में सुधार लाया जा सके।
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आयतल कुर्सी हिंदी में तर्जुमा के साथ वह आयतल कुर्सी की फजीलत तफसीर और हदीस में बयान
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