ज़मीने करबला का खूनी मंज़र
इमाम हुसैन की करबला में आमद
आप हज़रत इमाम हुसैन رضي الله عنه थोड़ा सा चले थे कि हुर के सिपाहियों ने आ कर रोक दिया और कहा बस यहीं उतर पड़िये, फुरात यहां से दूर नहीं है, आप ने पूछा इस जगह का नाम क्या है? लोगों ने कहा इस का नाम कर्बला है, इस लफ्ज़ को सुनते ही आप घोड़े से उतर पड़े और फरमायाः यह कर्बला है जो कामे कर्ब व बला है, यही हमारे ऊंटों के बैठने की जगह है, यहीं हमारे माल व अस्बाब उतरेंगे और इसी मकाम पर हमारे साथ कत्ल किये जाएंगे। यह मोहर्रम 61 हिजरी की दूसरी तारीख पंज शंबा (जुमेरात) का दिन था । ( नूरुल अब्सारः 117)
अब हुर ने हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को कर्बला में उतरने पर मजबूर कर दिया तो उस ने इब्ने ज़ियाद को इस बात की इत्तिला दी, यह वक्त वह था जबकि ईरान में बगावत हो गई थी जिस को फरव करने (दबाने के लिये अम्र बिन सअद को चार हज़ार फौज का सरदार बनाया गया था और रैय की हुकूमत का परवाना लिख कर दिया गया था, इब्ने सअद अपनी फौज के साथ निकल कर अभी थोड़ी ही दूर पहुंचा था कि इब्ने ज़ियाद ने उसे वापस बुला कर हुक्म दिया कि पहले हुसैन की मोहिम सर करो, उस के बाद ईरान की तरफ रवाना हो । अम्र हज़रत सअद बिन वक्कास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जो सहाबिए रसूल और अशरए मुबश्शरा में से हैं उनका बेटा था, वह नवासए रसूल हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला. अन्हु की फजीलत से खूब वाकिफ था, इस लिये उस ने इब्ने ज़ियाद से कहा मुझे इस अम्र के लिये न भेजें, इब्ने ज़ियाद ने कहा अगर हुसैन के मुकाबले के लिये नहीं जाते हो तो रैय की हुकूमत से दस्तबरदार हो जाओ, इब्ने सअद ने इस मामले पर गौर करने के लिये एक दिन की मोहलत ली। फिर आखिर दुनियवी हुकूमत के लालच में आ कर इमाम आली मकाम से मुकाबले के लिये तैयार हो गया और वही चार हज़ार की फौज जो मुल्के ईरान जाने के लिये तैयार थी, उन्हें साथ लेकर तीसरी मुहर्रम को कर्बला पहुंच गया और फिर बराबर कुमक ( मदद ) पहुंचती रही यहां तक कि इब्ने सअद के पास 22 हज़ार का लश्कर जमा हो गया।
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कितनी हैरत की बात है कि हज़रत इमाम अला जद्दिही व अलैहिस्सलाम के साथ कुल 82 आदमी हैं जिन में बीबियां और बच्चे भी हैं और फिर जंग के इरादे से भी नहीं आए थे, इसी लिये लड़ाई के सामान भी नहीं रखते थे, मगर अहले बैते नुबुव्वत की शुजाअत और दुरी का इब्ने ज़ियाद के दिल पर इतना असर था कि उन के मुकाबले के लिये 22 हज़ार का लश्करे जर्रार भेज दिया। दो गुनी, चौ गुनी, दस गुनी तो क्या सौ गुनी तादाद को भी काफी नहीं समझा। कूफा के तमाम काबिले जंग अपराद को कर्बला में भेज दिया, इस के बा वजूद लोगें के दिल ख़ौफ ज़दा हैं और जंग आज़मा दिलावरों के हौसले पस्त हैं, आखिर मजबूरन उन को यह फैसला करना पड़ा कि लश्करे इमाम पर पानी बन्द कर दिया जाए, तब उन का मुकाबला किया जा सकेगा। चुनांचे इब्ने सअद ने अम्र बिन हज्जाज को पांच सौ सवारों के एक दस्ते के साथ दरियाए फुरात पर मुकर्रर कर दिया ताकि इमाम और उन के साथी पानी की एक बूंद न ले सकें। यह वाकिज़ा हज़रत इमाम अला जद्दिही अलैहिस्सलाम के शहीद होने से तीन दिन पहले का है । (तबरी: 2/241)
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इब्ने सअद ने हज़रत इमाम के आदमी भेजा कि इन से पूछो वह यहां क्यों आए हैं और क्या चाहते हैं? आप ने जवाब दिया कि तुम्हारे शहर कूफा के लोगों ने खुतूत लिख कर मुझे बुलाया है, अब अगर मेरा आना पसंद नहीं है तो मैं वापस चला जाऊंगा। इब्ने सअद ने अपना सवाल और हज़रत का जवाब लिख कर इब्ने ज़ियाद को भेज दिया, उस ने इब्ने सज़द को जवाब में लिखा कि तुम हुसैन और उन के तमाम साथियों से कहो कि वह यज़ीद की बैअत करें, अगर यह बैअत कर लेंगे तो उस के बाद हम जो मुनासिब समझेंगे करेंगे, इब्ने सज़द का जब यह खत मिला तो उस ने कहा कि मैं समझ गया इब्ने ज़ियाद का अम्न व आफियत मनज़ूर नहीं ।
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इमाम और इब्ने सअद की मुलाकात
हज़रत इमाम अला जद्दिही व अलैहिस्सलाम ने इब्ने सअद को पैगाम भेजा कि आज रात में हम तुम से मिलना चाहते हैं, इब्ने सअद ने यह बात मान ली और रात के वक्त बीस सवारों के साथ दोनों लश्करों के दरमियान आया, आप भी बीस सवारों के साथ तशरीफ ले गए, फिर दोनों ने अपने-अपने साथियों को अलाहेदा कर दिया और तन्हाई में देर तक गुफ्लुगू करते रहे, आखिर में हज़रत इमाम ने फरमाया कि मैं तीन बातें पेश करता हूं, इन में से जिसे चाहो मेरे लिए मनज़र कर लो।
1- जहां से मैं आया हूं वहीं मुझे वापस चले जाने दो।
2- मुझे किसी सरहदी मकाम पर ले चलो, मैं वहीं रह कर वक्त गुज़ार लूंगा ।
3- मुझ को सीधा यज़ीद के पास दमिश्क की तरफ जाने दो,इत्मीनान के लिये तुम भी मेरे पीछे-पीछे चल सकते हो, मैं यज़ीद के पास जा कर उस से बराहे रास्त अपना मामला तय कर लूंगा जैसे कि मेरे हज़रते हसन ने अमीरे मुआविया से तय किया था।
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हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का रवैया इतना नर्म और सुलझा हुआ था कि इब्ने सज़द ने इकरार किया आप सुलह के रास्ते पर हैं, उस ने बहुत खुश होकर इब्ने ज़ियाद को लिखा कि खुदाए तआला ने आग का शोला बुझा दिया और इत्तिफाक की सूरत पैदा फरमा दी और उम्मत के मामले को सुलझा दिया। फिर हज़रत इमाम की पेश की हुई तीनों बातें तहरीर कीं और आखिर में अपनी राय भी लिखी कि अब इख़्तिलाफ की कोई वजह नहीं है और अब इस मामले को खत्म होना चाहिये। इब्ने ज़ियाद ने खत पढ़ कर कहा कि यह तहरीर ऐसे शख़्स की है जो अपने अमीर का ख़ैरख्वाह और अपनी कीम का शफीक है अच्छा मैं ने मनजूर कर लिया। यह सुन कर बदबख़्त शिमर ज़िल जोशन उठ खड़ा हुआ और कहा क्या आप यह बात उनकी कबूल करते हैं जबकि वह आप की जमीन पर उतरे हुए हैं और आप के पहलू में हैं। वल्लाह अगर वह आप की इताअत के बगैर यहां से चले गए तो बुब्बत व गुलबा उन के लिये होगा और आजिज़ी और कमजोरी आप के लिये मेरी राय में उन की ख्वाहिश कभी नहीं मनजूर करनी चाहिये इस लिये कि यह बहुत बड़ी जिल्लत और कमज़ोरी की निशानी है । होना यह चाहिये कि वह और उन के तमाम साथी आप के हुक्म पर सर झुका दें, फिर अगर आप उन्हें सजा दें तो आप को इसका हक है। और अगर माफ कर दें तो इस का भी इख़्तियार है ।
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रही इब्ने सअद की बात तो खुदा की कसम मुझे तो यह मालूम हुआ है कि हुसैन और वह रात-रात भर बैठे बातें किया करते हैं । शिमर खबीस की इस फिला परवर तक़रीर से इब्ने ज़ियाद की राय बदल गई, कहा तुम ने बेहतरीन मशवरा दिया है और फिर इब्ने सअद को लिखा कि मैं ने तुम्हें इस लिये नहीं भेजा है कि तुम हुसैन के बचाने की फिक् करो और सिफारिशी बन कर उन की सलामती चाहो । देखो अगर हुसैन और उन के तमाम साथी मेरे हुक्म पर सर झुका दें तो उन को मेरे पास पहुंचा दो और अगर न मानें तो सब के सर काट कर मेरे पास भेज दो और हुसैन की लाश पर घोड़े दौड़ा कर रौन्द डालो इस लिये कि वह इसी के मुस्तहिक हैं अगर तुम्हें यह मनज़ूर न हो तो हमारा लश्कर शिमर के हवाले कर दो, वह हमारे हुक्म पर पूरा-पूरा अमल करेगा। यह ख़त उस ने शिमर के सुपुर्द किया और ज़बानी कह दिया कि अगर इब्ने सअद मेरे हुक्म पर अमल न करे तो पहले तुम उस का सर काट कर मेरे पास भेज देना ।
(तवरी: 2/244)
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इब्ने सअद ने जब यह ख़त पढ़ा तो शिमर से कहा कम बख़्त तुम ने यह क्या किया? खुदा तुझे गारत करे, तू मेरे पास वह क्या लाया है ? खुदा की कसम मैं समझता हूं कि तू ने ही इब्ने ज़ियाद को मेरे मशवरे पर अमल करने से रोक दिया और इस बात का बिगाड़ दिया जिस के बनने की उम्मीद थी। खुदा की कसम हुसैन कभी इब्ने ज़ियाद के सामने सर नहीं झुका सकते। शिमर ने कहा इन बातों को छोड़ो और यह बताओ कि दुश्मन को कत्ल करोगे या लश्कर मेरे सुपुर्द करोगे?
इब्ने सअद जो दुनिया पर जान देने वाला और बद बख़्ते अंजली था उस ने कहा मैं लश्कर तुम्हारे सुपुर्द नहीं करूंगा बल्कि यह मुहिम मैं खुद ही सर करूंगा। चुनांचे उस ने फौरन हम्ले का हुक्म दे दिया। यह मुहर्रम की नवीं तारीख जुमेरात का दिन और शाम का वक्त था। हज़रत इमाम असा जद्दिही व अलैहिस्सलाम नमाजे अम्र के बाद खेमा के दरवाज़े पर तलवार का सहारा लेकर घुटनों पर सर रखे बैठे थे कि आप की आंख लग गई थी, फौज के शोरो-गुल की आवाज़ सुनकर आप की बहन हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु तआला अन्हा पर्दे के पास आई और आप को जगा कर कहा देखिये दुश्मन के फौज की आवाज़ बहुत नज़दीक से आ रही है, आप ने सर उठाया और फरमाया मैं ने अभी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को ख़्वाब में देखा, हुज़ूर ने मुझ से फरमायाः तुम हमारे पास आने वाले हो। हज़रत ज़ैनब यह ख़्वाब सुनकर बेक़रार हो गईं और रोते हुए कहाः हाए मुसीबत! आप ने फरमाया सब्र करो, खामोश रहो, अल्लाह मालिक है।
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फिर इमाम ने हज़रत अब्बास से फरमाया पूछो इस वक्त हम्ला का सबब क्या है? हज़रत अब्बास फौज के सामने आए और पूछा, जवाब मिला इब्ने ज़ियाद का हुक्म है कि आप लोग उस की इताअत करें और या तो लड़ने मरने के लिये तैयार हो जायें। हज़रत अब्बास ने उन के जवाब से इमाम आली मकाम को आगाह किया, आप ने फरमाया इन से कहो कि एक रात की मोहलत दें ताकि आज रात भर हम अच्छी तरह नमाज़ पढ़ लें, दुआ मांग लें और तौबा व इस्तिग़फार कर लें । खुदाए तआला ख़ूब जानता है कि मैं नमाज़ और दुआ व इस्तिग़फार से कितनी मुहब्बत रखता हूं। जब हज़रत अब्बास ने फौज के दस्ते से कहा कि हमें एक रात की मोहलत दी जाए तो उन्होंने यह बात मान ली । ( तबरी: 2/248)
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साथियों में इमाम की तक़रीर
इसके बाद हज़रत इमाम अला जद्दिही व अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों को जमा किया और उन के सामने यह तक़रीर फरमाई : "सब तारीफें खुदाए तआला के लिये हैं, आराम व तकलीफ हर हाल में उसका शुक्र है । ऐ अल्लाह ! मैं तेरा शुक्र बजा लाता हूं, तू ने हमें (अहले बैते) नुबुव्वत की इज़्ज़त अता फरमाई, कुरआन का इल्म दिया, दीन की समझ अता फरमाई और सुनने वाले कान, देखने वाली आंखें और दिले आगाह से माला माल फरमाया । उस के बाद हज़रत ने फरमाया मैं दुनिया में किसी के साथियों को अपने साथियों से ज़्यादा वफादार व बेहतर नहीं जानता और न किसी के घर वालों को अपने घर वालों से ज्यादा नेकूंकार व सिला रहमी करने वाला देखता हूं। खुदाए तआला तुम सब को मेरी तरफ से जजाए खैर अता फरमाएं,
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सुन लो ! मैं यकीन रखता हूं कि इन दुश्मनों के हाथों कल हमारी शहादत है, मैं तुम को बखुशी इजाज़त देता हूं कि रात का अंधेरा छाया हुआ है, इसी में जहां तुम लोगों का जी चाहे चले जाओ, मेरी तरफ से तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं । यह लोग मेरे कत्ल के दरपै हैं, जब मुझे कत्ल कर लेंगे तो फिर किसी दूसरे की तरफ मुतवज्जह नहीं होंगे।" इमाम आली मकाम की यह तक़रीर सुन कर सब से पहले हज़रत अब्बास फिर आप के दूसरे भाई, बेटे, भतीजे और भांजे सब ने यक ज़बान होकर कहा, क्या हम इस लिये चले जाएं कि आप के बाद जिंदा रहें? खुदा हमें ऐसा बुरा दिन न दिखाए।
इमाम ने पुकार कर कहा ऐ औलादे अकील ! मुस्लिम का कत्ल होना तुम्हारे लिये काफी है, तुम चले जाओ, मैं इजाज़त देता हूं। उन लोगों ने कहा खुदा की कसम यह हम से हरगिज़ नहीं होगा, बल्कि हम आप के साथ दुश्मन से मुकाबला करेंगे यहां तक कि अपनी जानें आप पर कुर्बान कर देंगे, खुदाए तआला हमें वह जिंदगी न दे जो आप के बाद हो । हज़रत मुस्लिम बिन औसजा असदी खड़े हुए और कहा हम आप को छोड़ कर चले जाएं, यह हम से हरगिज़ नहीं हो सकता। खुदा की कसम में इन दुश्मनों से नेजा के साथ जंग करूंगा यहां तक कि मेरा नेजा उन के सीनों में टूट जाए और तलवार चलाऊंगा जब तक कि उस का कब्ज़ा मेरे हाथ में रह सकेगा। खुदा की कसम अगर मेरे पास हथियार न होंगे तो मैं पत्थर मार-मार कर दुश्मनों से लडूंगा और इस तरह मैं अपनी जान आप पर निछावर कर दूंगा। हज़रत सअद बिन अब्दुल्लाह हनफी ने कहा खुदा की कसम आप का साथ छोड़ कर हम नहीं जायेंगे जब तक कि खुदा की बारगाह में यह साबित न कर दें कि हम ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के नवासे की कैसी हिफाज़त की है।
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ख़ुदा की कसम अगर मुझे यह मालूम हो कि मैं कत्ल हो जाऊंगा फिर जिंदा किया जाऊंगा और फिर जीते जी जला दिया जाऊंगा और मेरी राख हवा में उड़ा जाएगी और इसी तरह सत्तर मर्तबा मेरे साथ होगा फिर मैं आप का साथ न छोडूंगा और यह तो एक ही मर्तबा कत्ल होना है फिर इसके बाद दाइमी इज़्ज़त है जो कभी ख़त्म होने वाली नहीं है। हज़रत जुहैर बिन कैन ने कहा खुदा की कसम मैं तो यह चाहता हूं कि कत्ल किया जाऊं फिर जिंदा किया जाऊं और फिर कत्ल किया जाऊं ऐसे ही मेरे साथ हज़ार मर्तबा हो मगर खुदाए तआला आप को और आप के नौजवानों को बचा ले गरज कि इसी तरह आप के तमाम साथियों ने अपनी-अपनी अकीदत और जां निसारी जाहिर की. और सब का मतलब यही था कि यह हरगिज़ नहीं हो सकता है कि हम आप से जुदा हो जाएं बल्कि हम अपने हाथों अपनी गर्दनों और पेशानियों से आप को बचाएंगे यहां तक कि अपनी जानें आप पर कुर्बान कर देंगे । (तबरी: 2/250)
इस के बाद आप और आप के तमाम साथियों ने नमाज़ व दुआ और तौबा व इस्तिग़फार में सारी रात गुज़ार दी और इस के साथ ही खेमों की पुश्त पर खन्दक खोद कर लकड़ियां भर दीं ताकि जंग के वक्त उन में आग लगा दी जाए तो दुश्मन पीछे से हमला न कर सके।
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