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कर्बला में जंग की शुरुआत कैसे हुई || karbla mein Jung ki shuruaat - Islamic Creation

 जंग की इब्तिदा

इस पोस्ट को पढ़ने से पहले पिछली पोस्ट हुर का शौके शहादत जरूर पढ़ें 

कर्बला में जंग की शुरुआत

हुर के वापस आने के बाद अम्र बिन सअद ने फौज को आगे बढ़ाया और अपने गुलाम जुवैद को जो अलम्बरदारे लश्कर था आवाज़ दी कि झण्डा मेरे करीब लाओ, वह उस के पास आ कर खड़ा हो गया, इब्ने सज़द ने कमान में तीर जोड़ कर हुसैनी लश्कर की तरफ सर किया और अपनी फौज से पुकार कर कहा, गवाह रहना कि सब से पहला तीर में ने ही मारा है।

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सिंपह सालार के इन अल्फाज़ को सुनकर उस के लश्कर में जोश व ख़रोश पैदा हो गया तो वह भी तीर बरसाने लगे। इस तरह जंग शुरू हो गई और अब दोनों तरफ के सिपाही निकल-निकल कर अपनी बहादुरी का जौहर दिखाने लगे। सब से पहले यसार और सालिम जो ज़ियाद और इब्ने ज़ियाद के आज़ाद करदा गुलाम थे, कूफियों की तरफ से निकल कर मैदान में आए और मुकाबले के लिये बुलाया, इमाम आली मकाम के दो जां निसार साथी हबीब बिन मज़ाहिर और बुरैर बिन हुज़ैर उठ खड़े हुए मगर इमाम ने उन को रोक दिया। 

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यह देख कर अब्दुल्लाह बिन उमेर कलबी जो अपनी बीवी उम्मे यहब के साथ इमाम की मदद के लिये करबला में आ गए थे, खड़े हो गए और जंग की इजाज़त तलब की, हज़रत ने सर से पैर तक उन पर निगाह डाली, देखा जवान कवी हैकल है, फरमाया अंगर तुम्हारा दिल चाहता है तो जाओ, यह तन्हा दोनों के मुकाबिल गए, उन्हों ने पूछा तुम कौन हो? अब्दुल्लाह ने अपना नाम व नसब बयान किया, उन्हों ने कहा हम तुम्हें नहीं जानते, हमारे मुकाबले में जुहैर बिन कैन, हबीब विन मज़ाहिर या बुरेर बिन हुगेर को आना चाहिये था । यसार उस वक्त सालिम से आगे बढ़ा हुआ था, अब्दुल्लाह ने कहा ओ फाहिशा के बेटे ! तू मुझ से लड़ने में बेइज्ज़ती समझता है, यह कहते हुए यसार पर हमला किया और तलवार की ऐसी जर्ब लगाई कि वह एक ही वार में ठंडा हो गया। सालिम ने एक दम झपट कर हमला कर दिया, अब्दुल्लाह ने उस की तलवार को बाएं हाथ पर रोका, उंगलियां कट गईं मगर दाहिने हाथ से उस पर ऐसा वार किया कि उसे भी ढेर कर दिया और जोश में आ कर शेअर पढ़ने लगे जिस का मतलब यह है कि अगर मुझे नहीं पहचानते हो तो पहचान लो ।

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मैं खानदाने कलब का एक फर्ज़न्द हूं, मेरे हसब व नसब के लिये इतना काफी है कि कबीलए उलैम मेरा घराना है, में बड़ी कुव्वत वाला हूं और मुसीबत के वक्त पस्त हिम्मती से काम लेने वाला नहीं हूं। अब्दुल्लाह की बीवी को अपने शौहर की बहादुरी देख कर जोश आ गया, खेमा की एक चोब हाथ में ली और आगे बढ़ कर कहा मेरे मां बाप तुम पर कुर्बान, नवासए रसूल की तरफ से लड़ते जाओ, वह अपनी बीवी के पास आए और चाहा कि उन्हें खेमा में पहुंचा दें मगर वह मानने वाली नहीं थीं । अब्दुल्लाह के एक हाथ में तलवार थी, जिस सें दुश्मन का खून टपक रहा था और दूसरे हाथ की उंगलियां कट गई थीं जिन से लहू बह रहा था, फिर भी उन्हों ने पूरी कुव्वत के साथ बीवी को वापस करना चाहा मगर जोश में भरी हुई खातून ने अपना हाथ अब्दुल्लाह से छुड़ा लिया और कहा मैं तुम्हारा साथ हरगिज़ नहीं छोडूंगी, तुम्हारे साथ में भी जान दूंगी। इमाम आली मक़ाम ने आवाज़ दी, खुदाए तआला तुम दोनों को अहले बैते रिसालत की तरफ से जज़ाए खेर अता फरमाए, बीबी तुम वापस चली आओ कि औरतों पर किताल वाजिब नहीं। हज़रत के हुक्म को सुन कर वह वापस आ गई।

(सबरी: 2/262)

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