कर्बला में कियामते सुग़रा
दस्वीं मुहर्रम के दिल- दोज़ वाकिआत
आशूरा की रात ख़त्म हुई और दस्वीं मुहर्रम की क़ियामत नुमा सुबह नमूदार हुई | हज़रत इमाम अला जद्दिही व अलैहिस्सलाम ने अहले बैत और अपने तमाम साथियों के हमराह फज्र की नमाज़ निहायत खुशूअ व खुजूअ के साथ अदा फरमाई, पेशानियों ने सज्दे में खूब मज़े लिये और जबानों ने तस्बीह व किराअंत के खूब लुत्फ उठाए । अब दस्वीं मुहर्रम का सूरज अन्करीब निकलने वाला है। हज़रत इमाम, उन ऐ अहले बैत और तमाम साथी तीन दिन के भूके प्यासे हैं, एक लुक्मा किसी की हलक से नीचे नहीं उतरा और न एक कतरा पानी किसी को मयस्सर हुआ, ऐसे लोगों पर जुल्म व जफा के पहाड़ तोड़ने के लिये 22 हज़ार का ताज़ा दम लश्कर मौजूद है, जंग का नक्कारा बजा दिया गया।
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ज़मीने करबला का खूनी मंज़र | 2 मोहर्रम जब इमाम हुसैन करबला पहुंचे
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आकाए दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम के लाल और अली व फातिमा के नौ निहाल को मेहमान बना कर बुलाने वाली कौम ने जानों पर खेलने की दवत दी। हज़रत इमाम मैदाने कारज़ार ( जंग) में तशरीफ ले गए और एक तक़रीर फरमाई। हम्दो - सलात के बाद आप ने फरमायाः ऐ लोगो ! मेरे नसब पर गौर करो, कि मैं कौन हूं? फिर अपने गिरेबानों में मुंह डाल कर सोचो कि तुम्हारे लिये क्या मेरा ख़ून बहाना जाइज़ है? क्या मैं तुम्हारे नबी का नवासा नहीं हूं?. क्या मैं उन के चचा ज़ाद भाई अली का फर्ज़न्द नहीं हूं? जो आठ दस साल की उम्र में ईमान लाए। क्या सैय्यिदुश शुहदा हज़रत हमज़ा मेरे बाप के चचा और जाफर तैय्यार खुद मेरे ही चचा नहीं थे। क्या तुम में से किसी ने यह नहीं सुना है कि रसूले अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने मेरे और मेरे भाई के बारे में फरमाया है कि यह दोनों जन्नती जवानों के सरदार हैं । अगर तुम मेरी बात को सच समझते हो और हकीकत में वह सच ही है, इस लिये कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता । और अगर तुम मेरी बात झूठी समझते हो तो अब भी इस्लामी दुनिया में जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी, अबू सईद खुदरी और - अनस बिन मालिक वगैरा मौजूद हैं उन से पूछ लो क्या यह हदीसें तुम्हें मेरा खून बहाने से रोकने के लिये काफी नहीं हैं?
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शिमर बंद बख़्त ने आप की तक़रीर में मुदाखलत करते हुए कुछ बद तमीजी की तो हबीब बिन मज़ाहिर ने उसे सख़्त जवाब देते हुए कहा कि अल्लाह तआला ने तेरे दिल पर मोहर लगा दी है इस लिये तू नहीं समझ पा रहा है कि हज़रत इमाम क्या फरमा रहे हैं शिमर और हबीब की गुफ्तगू के बाद इमाम आली मकाम ने फिर फरमाया ऐ लोगो ! अगर तुम्हें इस हदीस में शक है तो क्या इस में शुबहा है कि मैं तुम्हारे रसूल का नवासा हूं। ख़ुदा की कसम पूरब से लेकर पंच्छिम तक पूरी दुनिया में मेरे सिवा कोई भी नबी का नवासा मौजूद नहीं है, न तुम में और न तुम्हारे सिवा दूसरी कौमों में। और मैं तो खुद तुम्हारे ही नबी का नवासा हूं, जरा गौर तो करो कि मेरे कत्ल पर तुम कैसे आमादा हो गए? क्या मैंने किसी को कत्ल किया है? किसी का माल हलाक किया है? या किसी को जख्मी किया है? जिस का बदला तुम मुझ से चाहते हो । जब मुखालिफीन की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला तो आप ने पुकार कर कहा ऐ शिब्बस बिन रुबई ! ऐ हजार बिन अबजर! ऐ कैस बिन अश्अस! ऐ यज़ीद बिन हारिस ! क्या तुम लोगों ने ख़त लिख कर मुझे नहीं बुलाया था? उन्हों ने कहा हम ने कोई ख़त आप को नहीं लिखा था।
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आप ने फरमाया तुम लोगों ने लिखा था और ज़रूर लिखा था। अच्छा फर्ज़ कर लो तुम ने नहीं लिखा था और तुम नहीं चाहते थे कि मैं इधर आऊं तो मुझे छोड़ दो ताकि मैं किसी ऐसी जगह चला जाऊं जहां अम्नो-अमान की जिंदगी बसर कर सकूं। कैस बिन अश्अस ने कहा आप अपने कुराबत दार यांनी इब्ने ज़ियाद के सामने सर झुका दें फिर आप के साथ कोई ना पसंदीदा सुलूक नहीं होगा। आप ने फरमाया तुम ऐसा क्यों नहीं कहोगे, तुम मुहम्मद बिन अश्अस ही के भाई तो हो, क्या तुम्हारे लिये यह काफी नहीं कि मुस्लिम बिन अकील के खून की ज़िम्मेदारी तुम पर है। खुदा की कसम मैं जिल्लत के साथ तुम्हारे हाथ में अपना हाथ हरगिज़ नहीं दूंगा और न गुलामों की तरह इताअत का इकरार करूंगा मुखालिफीन के मानने की पहले ही से उम्मीद न थी मगर इमाम आली मकाम को अपना फर्ज पूरा करना था वह हो गया, फिर आप ऊंटनी बिठा कर उतर पड़े और उक्बा बिन समआन को हुक्म दिया कि इसे बांध दें।
(तबरी: 2/257)
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हुर का शौके शहादत | हूर बिन यजीद

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