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Muharram Me Khichda Kyu Banaya Jata Hai? Ashura Ka Itihas Aur Niyam

क्या आपने कभी सोचा है कि मुहर्रम के महीने में, खासकर आशूरा के दिन, हमारे घरों में खिचड़ा क्यों बनाया जाता है? मुहर्रम का महीना आते ही हर तरफ इस खास पकवान की खुशबू आने लगती है। बहुत से लोग इसे हलीम भी कहते हैं। लोग बड़े बड़े बर्तनों में इसे बनाते हैं और अपने पड़ोसियों तथा गरीबों में बांटते हैं।

Muharram Me Khichda Kyu Banaya Jata Hai? Ashura Ka Itihas Aur Niyam

लेकिन क्या यह सिर्फ एक रिवाज है या इसके पीछे कोई बहुत पुरानी कहानी भी है? आज हम इसी बारे में विस्तार से बात करेंगे। हम जानेंगे कि इस परंपरा की शुरुआत कहां से हुई और मुहर्रम के इस पाक महीने में हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। यह लेख आपको इस परंपरा के पीछे छिपे असली संदेश को समझने में मदद करेगा।

हज़रत नूह की कश्ती और खिचड़े का इतिहास क्या है?

मुहर्रम का महीना इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है। इस महीने की दसवीं तारीख को आशूरा कहा जाता है। आशूरा का दिन इतिहास में बहुत बड़ा महत्व रखता है। इस दिन कई बड़ी ऐतिहासिक घटनाएं घटी थीं। उन्हीं में से एक बहुत मशहूर घटना हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती से जुड़ी है।

जब दुनिया में बहुत बड़ा तूफान आया था, तब हज़रत नूह की कश्ती में उनके मानने वाले और कई तरह के जानवर सवार थे। वह तूफान कई दिनों तक चला था। कश्ती पर मौजूद सभी लोग डरे हुए थे और अल्लाह से प्रार्थना कर रहे थे। जब तूफान शांत हुआ और हज़रत नूह की कश्ती जूदी नाम के पहाड़ पर रुकी, तो वह आशूरा का ही दिन था।

कश्ती पर मौजूद लोगों के पास खाने पीने का सामान लगभग खत्म हो चुका था। कश्ती में जो कुछ भी अनाज बचा था, वह बहुत कम मात्रा में था। किसी के पास थोड़ा गेहूं था, किसी के पास थोड़ी दाल थी, तो किसी के पास थोड़े चावल थे। हज़रत नूह ने उन सभी बचे हुए अनाजों को एक साथ मिलाने के लिए कहा।

उन्होंने उन सभी चीजों को एक बड़े बर्तन में डालकर पकाया। इस तरह एक नया पकवान तैयार हुआ जिसे सबने मिलकर खाया। इस पकवान को अरबी में आशूरा कहा जाता है और हमारे देश में इसे खिचड़ा या हलीम के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि आज भी लोग आशूरा के दिन इस घटना की याद में खिचड़ा बनाते हैं।

यह पकवान हमें सिखाता है कि मुश्किल समय में जो कुछ भी हमारे पास हो, उसे आपस में बांटकर खाना चाहिए। यह एकता और भाईचारे का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि जब हम मिलकर काम करते हैं, तो बड़ी से बड़ी मुश्किल भी आसान हो जाती है।

हज़रत मूसा और आशूरा के दिन का गहरा संबंध

आशूरा के दिन का संबंध केवल हज़रत नूह की कश्ती से ही नहीं है। इस दिन का एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक संबंध हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से भी है। जब मिस्र का जालिम राजा फिरौन हज़रत मूसा और उनके मानने वालों का पीछा कर रहा था, तब अल्लाह ने हज़रत मूसा की मदद की थी।

हज़रत मूसा ने अल्लाह के हुक्म से दरिया पर अपना डंडा मारा, जिससे दरिया के बीच में रास्ता बन गया। हज़रत मूसा और उनके साथी सुरक्षित तरीके से दरिया पार कर गए। जब फिरौन और उसकी सेना ने उस रास्ते पर चलने की कोशिश की, तो दरिया का पानी फिर से मिल गया और वे सब डूब गए।

इस महान जीत और आजादी की खुशी में हज़रत मूसा आशूरा के दिन अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के लिए रोजा रखते थे। जब हमारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना आए, तो उन्होंने देखा कि यहूदी भी इस दिन रोजा रख रहे हैं। जब उन्होंने इसका कारण पूछा, तो उन्हें हज़रत मूसा की इस घटना के बारे में पता चला।

इसके बाद हमारे नबी ने फरमाया कि हमारा हज़रत मूसा पर यहूदियों से ज्यादा हक है। उन्होंने खुद भी इस दिन रोजा रखा और अपने साथियों को भी रोजा रखने का हुक्म दिया। उन्होंने यह भी कहा कि हमें यहूदियों से अलग दिखने के लिए आशूरा के दिन के साथ एक और दिन का रोजा जोड़ना चाहिए, यानी नौ और दस मुहर्रम का रोजा।

आशूरा के दिन गरीबों को खाना खिलाने का महत्व

इस्लाम में गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने पर बहुत जोर दिया गया है। आशूरा के दिन खिचड़ा बनाने का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि कोई भी मजलूम इंसान उस दिन भूखा न रहे। जब हम बड़े पैमाने पर खिचड़ा बनाते हैं, तो हमारा मकसद सिर्फ अपने परिवार का पेट भरना नहीं होता।

बल्कि हमारा मकसद उन लोगों तक खाना पहुंचाना होता है जो रोज अच्छा खाना नहीं खा पाते। अपने आसपास के गरीबों को खाना खिलाना एक बहुत ही नेक काम है। अल्लाह के रसूल ने हमेशा दूसरों की मदद करने की सीख दी है। जब हम अपने हाथ से किसी गरीब को खाना देते हैं, तो हमारे दिल में उनके प्रति हमदर्दी पैदा होती है।

मुहर्रम का महीना हमें यही हमदर्दी सिखाता है। इस महीने में हमें अपनी कमाई का एक हिस्सा गरीबों की मदद में लगाना चाहिए। अगर आप धार्मिक विषयों और अच्छी आदतों के बारे में अधिक पढ़ना चाहते हैं, तो आप इस्लामिक क्रिएशन की वेबसाइट पर जाकर बहुत सी अच्छी बातें सीख सकते हैं। वहां आपको जीवन को सही दिशा में ले जाने के कई तरीके मिलेंगे।

गरीबों को खाना खिलाने के साथ साथ हमें उनके बच्चों की पढ़ाई और दवाइयों का खर्च उठाने की भी कोशिश करनी चाहिए। सिर्फ एक दिन खाना खिलाकर हमें अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। हमें पूरे साल उनकी मदद करने की आदत डालनी चाहिए। जब हम दूसरों के काम आते हैं, तभी हमारा जीवन सफल होता है।

खिचड़ा या हलीम बनाने का सही तरीका और सादगी

आजकल देखने में आता है कि लोग खिचड़ा बनाने में बहुत ज्यादा दिखावा करने लगे हैं। लोग बहुत महंगा और बहुत ज्यादा मसालों वाला खिचड़ा बनाते हैं। कई बार लोग सिर्फ नाम कमाने के लिए बड़े बड़े आयोजन करते हैं। लेकिन हमें यह समझना होगा कि इस परंपरा का असली मकसद सादगी था।

हज़रत नूह के समय जो खिचड़ा बना था, वह बहुत ही सादा था। उसमें केवल वही अनाज थे जो बच गए थे। इसलिए हमें भी खिचड़ा बनाते समय सादगी का ध्यान रखना चाहिए। हमें इसमें बहुत ज्यादा फिजूलखर्ची नहीं करनी चाहिए। जो पैसा हम दिखावे में खर्च करते हैं, उसी पैसे से हम कई गरीब परिवारों की राशन की जरूरतें पूरी कर सकते हैं।

खिचड़ा बनाते समय हमारी नीयत साफ होनी चाहिए। हमारी नीयत सिर्फ अल्लाह को राजी करने और लोगों की भूख मिटाने की होनी चाहिए। खिचड़ा बनाने की विधि भी बहुत आसान है। इसमें गेहूं, जौ, विभिन्न प्रकार की दालें, चावल और मांस का उपयोग किया जाता है।

इन सभी चीजों को धीमी आंच पर लंबे समय तक पकाया जाता है। जब सभी चीजें अच्छी तरह गल जाती हैं, तो उन्हें आपस में अच्छी तरह मिलाया जाता है। इसके बाद इसमें प्याज और मसालों का तड़का लगाया जाता है। यह पकवान न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन और फाइबर होता है।

Muharram Me Khichda Kyu Banaya Jata Hai? Ashura Ka Itihas Aur Niyam

खिचड़ा बांटने के सही तौर तरीके और आदाब

जब हम आशूरा के दिन खिचड़ा बांटते हैं, तो हमें कुछ जरूरी आदाब का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहली बात यह है कि खाना बांटते समय हमारे चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए। हमें किसी पर अहसान जताने की भावना से खाना नहीं देना चाहिए। देने वाले हाथ को हमेशा विनम्र होना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि हमें सबसे पहले अपने करीब के पड़ोसियों का ख्याल रखना चाहिए। चाहे वे अमीर हों या गरीब, अपने पड़ोसियों को खाना देना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है। कई बार हम दूर दूर जाकर खाना बांटते हैं लेकिन हमारे बगल वाले घर में रहने वाला इंसान भूखा रह जाता है। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

तीसरी बात यह है कि हमें खाने की बर्बादी से बचना चाहिए। कई बार लोग बहुत ज्यादा मात्रा में खिचड़ा ले लेते हैं और फिर उसे फेंक देते हैं। हमें उतना ही खाना परोसना चाहिए जितना कोई खा सके। अन्न का हर दाना बहुत कीमती होता है और हमें इसकी कद्र करनी चाहिए।

मुहर्रम में क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

मुहर्रम का महीना बहुत ही आदरणीय महीना है। इस महीने में लड़ाई झगड़ा करना पूरी तरह से मना है। हमें इस पूरे महीने में अपने व्यवहार को बहुत अच्छा रखना चाहिए। आशूरा के दिन रोजा रखना बहुत बड़ी सुन्नत है। अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि आशूरा के दिन रोजा रखने से पिछले एक साल के गुनाह माफ हो जाते हैं।

इसलिए हमें नौ और दस मुहर्रम को या फिर दस और ग्यारह मुहर्रम को रोजा जरूर रखना चाहिए। इसके साथ ही हमें अपनी कमाई के तरीकों पर भी ध्यान देना चाहिए। हमें हमेशा हलाल तरीके से पैसे कमाने चाहिए। आज के समय में लोग पैसे कमाने के नए नए तरीके ढूंढ रहे हैं।

कुछ लोग शेयर बाजार में भी रुचि रखते हैं। अगर आप भी इस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, तो आपको हलाल तरीकों की जानकारी होनी चाहिए। आप इस बारे में अधिक जानने के लिए हलाल तरीके से शेयर मार्केट में इन्वेस्ट करने के नियमों को पढ़ सकते हैं। इससे आप गलत रास्तों पर चलने से बच जाएंगे।

मुहर्रम में हमें किसी भी तरह के अंधविश्वास से बचना चाहिए। बहुत से लोग इस महीने में नए काम शुरू करने से बचते हैं या शादी ब्याह नहीं करते। वे इसे एक मनहूस महीना मानते हैं। लेकिन इस्लाम में कोई भी महीना या दिन मनहूस नहीं होता। मुहर्रम तो बहुत ही बरकत वाला महीना है। इसलिए हमें इन गलत धारणाओं से दूर रहना चाहिए और अपना ध्यान सिर्फ इबादत में लगाना चाहिए.

क्या मुहर्रम सिर्फ गम मनाने का महीना है?

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है जो अक्सर लोगों के मन में आता है। मुहर्रम के महीने में ही कर्बला की ऐतिहासिक जंग हुई थी। इस जंग में हज़रत इमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों को बहुत ही बेरहमी से शहीद कर दिया गया था। इमाम हुसैन का यह बलिदान इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

उन्होंने हक और सच के लिए अपनी जान दे दी लेकिन जुल्म के आगे सिर नहीं झुकाया। इमाम हुसैन की शहादत का गम हर मुसलमान के दिल में है। लेकिन मुहर्रम का महत्व सिर्फ इस घटना तक ही सीमित नहीं है। जैसा कि हमने पहले देखा, यह महीना हज़रत नूह और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के समय से ही बहुत पवित्र माना जाता रहा है।

हज़रत मूसा को भी इसी दिन फिरौन के जुल्म से निजात मिली थी। इसलिए मुहर्रम का महीना हमें बुराई पर अच्छाई की जीत की याद दिलाता है। हमें इमाम हुसैन के जीवन से सीख लेनी चाहिए। उन्होंने हमें सिखाया कि चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यों न आ जाए, हमें कभी भी सच का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

हमें हमेशा गरीबों और मजलूमों के हक के लिए खड़ा होना चाहिए। सिर्फ रोने या मातम करने से हम उनके सच्चे चाहने वाले नहीं बन सकते। हमें उनके बताए हुए रास्तों पर चलना होगा। हमें पांच वक्त की नमाज पढ़नी होगी और समाज में शांति और भाईचारा फैलाना होगा।

मुहर्रम के दिनों में आपसी भाईचारे को कैसे बढ़ावा दें?

मुहर्रम का यह समय आपसी मतभेदों को भुलाने का बहुत अच्छा अवसर होता है। हमें इस समय अपने पड़ोसियों, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, उनके साथ अच्छे संबंध बनाने चाहिए। जब हम खिचड़ा बनाते हैं, तो हमें उसे अपने गैर मुस्लिम भाइयों के साथ भी साझा करना चाहिए।

इससे उनके मन में हमारे प्रति सम्मान और प्यार बढ़ेगा। अक्सर देखा जाता है कि त्योहारों के समय लोग अपने ही लोगों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन असली खुशी तब मिलती है जब हम दूसरों को भी अपनी खुशियों में शामिल करते हैं। मुहर्रम का महीना हमें सब्र और संतोष सिखाता है।

जब हम दूसरों की भूख मिटाते हैं, तो हमें आत्मिक शांति मिलती है। यह शांति किसी भी भौतिक सुख से बहुत बड़ी होती है। हमें इस महीने में अपने गुस्से पर काबू रखना चाहिए। अगर किसी के साथ हमारा कोई पुराना विवाद चल रहा है, तो हमें उसे माफ कर देना चाहिए।

माफी मांगना और माफ करना दोनों ही बहुत बड़े गुण हैं। अल्लाह भी उन लोगों को पसंद करता है जो दूसरों के गुनाहों को माफ कर देते हैं। आइए हम सब मिलकर इस मुहर्रम को एक नई शुरुआत का जरिया बनाएं और अपने समाज को और बेहतर बनाने की कोशिश करें।

इस मुहर्रम हम क्या संकल्प ले सकते हैं?

हर नया साल और हर नया महीना हमारे लिए खुद को बेहतर बनाने का एक मौका लेकर आता है। मुहर्रम के इस पाक महीने में हमें कुछ अच्छे संकल्प लेने चाहिए। हमें यह तय करना चाहिए कि हम अपनी जुबान से कभी किसी का दिल नहीं दुखाएंगे। हम हमेशा सच बोलेंगे और अपनी कमाई को पूरी तरह से साफ और हलाल रखेंगे।

हमें अपने बच्चों को भी मुहर्रम के इतिहास के बारे में सही जानकारी देनी चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि खिचड़ा बनाने के पीछे क्या कहानी है और इमाम हुसैन ने कर्बला में क्या संदेश दिया था। जब हमारे बच्चे इन कहानियों को सुनेंगे, तो उनके अंदर भी अच्छे संस्कार पैदा होंगे। वे बड़े होकर एक अच्छे इंसान बनेंगे और समाज की सेवा करेंगे।

खिचड़ा खाने और खिलाने का यह सिलसिला हमेशा चलता रहेगा, लेकिन हमें इसके पीछे छिपे हुए संदेश को कभी नहीं भूलना चाहिए। आइए इस बार हम सिर्फ खिचड़ा ही न बांटें, बल्कि हर तरफ प्यार और इंसानियत भी बांटें। यही मुहर्रम का असली संदेश है और यही हमारे जीवन का असली उद्देश्य होना चाहिए।

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