"मुहर्रम " कहने की वजह
प्यारे प्यारे इस्लामी भाइयो ! इस्लामी साल का पहला महीना मुहर्रम है इस माहे मुबारक की हुरमत (यानी ताज़ीम) की वजह से इसे "मुहर्रम" का नाम दिया गया है । अल्लाह पाक ने इस्लामी साल का आगाज़ मुहर्रमुल हराम के बा बरकत महीने से फ़रमाया और हमें इस में अज्रो सवाब और खैरो बरकत के कसीर मवाकेअ अता फरमाए। बन्दए मोमिन के लिये अपना पसन्दीदा (बन्दा) बनने की राहें खोल दीं ताकि साल के शुरूआत ही से बन्दा अपने रब के क़रीब हो जाए और तौबा करे तो उस के गुनाह बख़्श दिये जाएं ।
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नेकियों का असर बन्दे पर साल के इख़्तिताम तक रहे हुत्ता कि साल का आखिरी महीना जुल हिज्जतिल हराम भी इबादत में गुज़रे, उम्मीद है कि उस के लिये पूरे साल की इताअत लिखी जाए क्यूं कि जिस के अमल की इब्तिदा और इतिहा इबादत पर हो तो वोह उस के हुक्म में है जो दोनों वक्तों के दरमियान भी इबादत में ही लगा रहा हो ।
इबादत में गुज़रे मेरी ज़िन्दगानी
करम हो करम या ख़ुदा या इलाही
मुहर्रमुल हराम के 2 फ़ज़ाइल
(1) एक शख़्स हुज़ूर नबिय्ये अकरम ﷺ की बारगाह में हाज़िर हुवा और कर अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ﷺ रमज़ान के इलावा मैं किस महीने में रोज़े रखूं ? इर्शाद फ़रमाया : अगर तुम ने रमज़ान के बा'द किसी महीने के रोज़े रखने हों तो मुहर्रम के रोज़े रखो कि येह अल्लाह पाक का महीना है, इस महीने में एक दिन है जिस में अल्लाह पाक ने एक क़ौम की तौबा क़बूल फरमाई और दूसरों की तौबा भी क़बूल फ़रमाएगा।
(2) नबिय्ये करीम ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया : माहे रमज़ान बा'द सब से अफ़्ज़ल रोज़े अल्लाह पाक के महीने मुहर्रम के रोज़े हैं और फ़र्ज़ नमाज़ के बा'द सब से अफ्ज़ल नमाज़ रात की नमाज़ है।
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