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करबला में हज़रत इमाम हुसैन की करामतें | Karbla me imam Hussain ki karamat

 करबला में हज़रत इमाम हुसैन की करामतें

 बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

प्यारे दोस्तों क्लिप पोस्ट में हमने पढ़ा था कि कर्बला के मैदान में जंग की शुरुआत कैसे हुई थी। और आज की पोस्ट में हम बात करेंगे कर्बला के मैदान में नबी ﷺ के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन رضي الله عنه की करामात के बारे में। ,

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मैदान ए करबला में दुश्मनों के गिरोह में एक शख्स घोड़ा कूदाता हुआ सामने आया जिस का नाम मालिक बिन उर्वा था, जब उस ने देखा कि लश्करे इमाम के गिर्द खुन्दक में आग जल रही है और शोले बुलंद हो रहे हैं और इस तदबीर से अहले खेमा की हिफाज़त की जा रही है तो उस गुस्ताख़ बद बातिन ने हज़रत इमाम से कहा ऐ हुसैन ! तुम ने वहां की आग से पहले यहीं आग लगा ली है । इमाम आली मकाम अला जद्दिही व अलैहिस्सलाम ने फरमायाः ऐ खुदा का दुश्मन ! तू झूठा है, तुझे गुमान है कि मैं दोजख में जाऊंगा। हज़रत मुस्लिम बिन औसजा को उस बद बख़्त का यह जुम्ला बहुत नागवार हुआ और उन्होंने हज़रत इमाम से उस बद ज़बान के मुंह पर मीर मारने की इजाज़त चाही, आप ने उन्हें इजाज़त नहीं दी, मगर खुदाए तआला की बारगाह में हाथ उठा कर दुआ की या इलाहल आलमीन! अज़ाबे नार से पहले इस गुस्ताख़ को दुनिया के अन्दर आग के अज़ाब में मुब्तला फरमा । इमाम का हाथ उठाना था कि उसके घोड़े का पांव एक सुराख़ में गया और वह घोड़े से गिरा, उस का पांव रकाब में उलझा, घोड़ा उसे लेकर भागा और आग की खन्दक़ में डाल दिया । ,

हज़रत इमाम ने सज्दए शुक किया, अपने परवरदिगार की हम्दो - सना की और अर्ज़ किया ऐ परवरदिगार ! तेरा शुक्र है कि तू ने अहले बैते रिसालत के बद ख़्वाह को सज़ा दी, हज़रत इमाम की जबान से यह जुम्ला सुन कर दुश्मनों की सफ में से एक और बेबाक ने कहा आप को पैगम्बरे ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम से क्या निस्बत ? यह कलिमा तो हज़रत के लिये इन्तिहाई तक्लीफदेह था, आप ने बारगाहे खुदावन्दी में अर्ज किया ऐ अल्लाह ! इस बद जबान को फौरन जिल्लत में गिरिफ्तार कर, इमाम ने यह दुआ फरमाई और उस को कज़ाए हाजत की ज़रूरत पेश आई, वह घोड़े से उतर कर एक तरफ भागा और किसी जगह कजाए हाजत के लिये बरहना होकर बैठा, एक सियाह बिच्छू ने डंक मारा तो नजासत आलूदा तड़पता फिरता था, इस रुस्वाई के साथ पूरे लश्कर के सामने उस नापाक की जान निकली मगर सख़्त दिलाने बेहमिय्यत ( बेशर्मो) को ग़ैरत न हुई । ,

और एक मुज़नी ने इमाम के सामने आ कर कहा ऐ इमाम ! देखों तो दरियाए फुरात कैसा मौजें मार रहा है, ख़ुदा की कसम खा कर कहता हूं, तुम्हें इसका एक क़तरा न मिलेगा और तुम प्यासे हलाक हो जाओगे | हज़रत इमाम ने उस के हक में फरमाया: रब ! इस को प्यासा मार। इमाम का यह फरमाना था कि मुज़नी का घोड़ा चमका, मुज़नी गिरा, घोड़ा भागा और मुज़नी पकड़ने के लिये उस के पीछे दौड़ा और प्यास उस पर ऐसी शिद्दत की गालिब हुई कि अल्-अतश-अल्-अतश पुकारता था और जब पानी उस के मुंह से लगाते थे तो एक कुतरा नहीं पी सकता था यहां तक कि उसी प्यास की शिद्दत में मर गया ।

( सवाने करबला : 106)

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ऐ दिल बगीर दामने सुल्ताने औलिया
यानी हुसैन बिन अली जाने औलिया

फर्ज़न्दे रसूल को यह बात भी दिखानी थी कि उन की मकबूलियत बारगाहे हक पर और उन के कुर्ब व मंज़िलत पर जैसे कि नूसूसे कसीरा और अहादीसे शहीरा शाहिद हैं ऐसे ही उन के ख़वारिक व करामात भी गवाह हैं। अपने इस फजल का अमली इज़हार भी इतमामे हुज्जत के सिलसिले की एक कड़ी थी कि अगर तुम आंख रखते हो तो देख लो जो ऐसा मुस्तजाबुद दवात है उस के मुकाबले में आना ख़ुदा से जंग करना हैं, इस का अंजाम सोच लो और बाज़ रहो मगर शरारत के मुजसमें इस से भी सबक न ले सके ।

आज आपने कर्बला के मैदान में नबी ﷺ के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन رضي الله عنه की करामात के बारे में पढा। अगर आपको हमारी पोस्ट थोड़ी भी जरूरी लगे तो इसे अपने फॅमिली और दोस्तों के साथ भी शेयर करे ताकि उन्हे भी कर्बला के मैदान में नबी ﷺ के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन رضي الله عنه की करामात के बारे में जानकारी मिले।

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